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'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस': क्या मायने हैं प्रेस की आजादी के...

प्रत्येक वर्ष 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। प्रेस किसी भी समाज का आइना होता है...

Last Modified:
Tuesday, 03 May, 2022
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प्रत्येक वर्ष 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। प्रेस किसी भी समाज का आइना होता है। प्रेस की आजादी से यह बात साबित होती है कि उस देश में अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक जरूरत है। आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां अपनी दुनिया से बाहर निकल कर आसपास घटित होने वाली घटनाओं के बारे में जानने का अधिक वक्त हमारे पास नहीं होता। ऐसे में प्रेस और मीडिया हमारे लिए एक खबर वाहक का काम करती हैं, जो हर सवेरे हमारी टेबल पर गरमा गर्म खबरें परोसती हैं। यही खबरें हमें दुनिया से जोड़े रखती हैं। आज प्रेस दुनिया में खबरें पहुंचाने का सबसे बेहतरीन माध्यम है।

शुरुआत-

'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस' मनाने का निर्णय वर्ष 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर किया था। इससे पहले नामीबिया में विंडहॉक में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था कि प्रेस की आजादी को मुख्य रूप से बहुवाद और जनसंचार की आजादी की जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। तब से हर साल '3 मई' को 'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

प्रेस की आजादी-

'संयुक्त राष्ट्र महासभा' ने भी '3 मई' को 'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता' की घोषणा की थी। यूनेस्को महासम्मेलन के 26वें सत्र में 1993 में इससे संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था। इस दिन के मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार के उल्लंघनों की गंभीरता के बारे में जानकारी देना है, जैसे- प्रकाशनों की कांट-छांट, उन पर जुर्माना लगाना, प्रकाशन को निलंबित कर‍ देना और बंद कर‍ देना आदि। इनके अलावा पत्रकारों, संपादकों और प्रकाशकों को परेशान किया जाता है और उन पर हमले भी किये जाते हैं। यह दिन प्रेस की आजादी को बढ़ावा देने और इसके लिए सार्थक पहल करने तथा दुनिया भर में प्रेस की आजादी की स्थिति का आंकलन करने का भी दिन है। अधिक व्यावहारिक तरीके से कहा जाए, तो प्रेस की आजादी या मीडिया की आजादी, विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और प्रकाशित सामग्री तथा फोटोग्राफ विडियो आदि के जरिए संचार और अभिव्यक्ति की आजादी है। प्रेस की आजादी का मुख्य रूप से यही मतलब है कि शासन की तरफ से इसमें कोई दखलंदाजी न हो, लेकिन संवैधानिक तौर पर और अन्य कानूनी प्रावधानों के जरिए भी प्रेस की आजादी की रक्षा जरूरी है।

मीडिया की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। इस आजादी में बिना किसी दखलंदाजी के अपनी राय कायम करने तथा किसी भी मीडिया के जरिए, चाहे वह देश की सीमाओं से बाहर का मीडिया हो, सूचना और विचार हासिल करने और सूचना देने की आजादी शामिल है। इसका उल्लेख मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के 'अनुछेद 19' में किया गया है।

'सूचना संचार प्रौद्योगिकी' तथा सोशल मीडिया के जरिए थोड़े समय के अंदर अधिक से अधिक लोगों तक सभी तरह की महत्वपूर्ण खबरें पहुंच जाती हैं। यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया की सक्रियता से इसका विरोध करने वालों को भी स्वयं को संगठित करने के लिए बढ़ावा मिला है और दुनियाभर के युवा लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए और व्यापक रूप से अपने समुदायों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष करने लगे हैं। इसके साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि मीडिया की आजादी बहुत कमजोर है।

यह भी जानना जरूरी है कि अभी यह सभी की पहुंच से बाहर है। हालांकि मीडिया की सच्ची आजादी के लिए माहौल बन रहा है, लेकिन यह भी ठोस वास्तविकता है कि दुनिया में कई लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच बुनियादी संचार प्रौद्योगिकी तक नहीं है। जैसे-जैसे इंटरनेट पर खबरों और रिपोर्टिंग का सिलसिला बढ़ रहा है, ब्लॉग लेखकों सहित और अधिक इंटरनेट पर पत्रकारों को परेशान किया जा रहा है और हमले किये जा रहे हैं।

(साभार: bharatdiscovery.org) 

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पत्रकारिता का विश्वविद्यालय थे एसपी सिंह: सुप्रिय प्रसाद

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल है, जिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला...

Last Modified:
Tuesday, 27 June, 2023
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सुप्रिय प्रसाद

न्यूज डायरेक्टर, ‘आजतक’, ‘इंडिया टुडे’ व ‘गुड न्यूज टुडे’ ।।

उन खुशनसीब पत्रकारों में मेरा नाम भी शामिल है, जिन्हें एसपी के साथ काम करने का मौका मिला। एसपी ने 1 जुलाई 1995 को 'आजतक' जॉइन किया था। लेकिन मैं उनसे ठीक बीस दिन पहले यानी 10 जून को ही ‘आजतक’ आ गया था। जॉइन करने के बाद एसपी ने कायदे से एंकरिंग का अभ्यास किया था। 17 जुलाई 1995 को दिल्ली दूरदर्शन पर 20 मिनट के न्यूज शो के रूप में ‘आजतक’ शुरू हुआ था। एसपी के साथ काम करने का तजुर्बा अपने आप में अनोखा था। खबरों के प्रति उनकी दीवानगी को देख हम लोग हैरान थे। वे रोज कई क्षेत्रीय अखबारों समेत 40 से 50 अखबार पढ़ते थे। कई बार तो खुद कई ब्यूरो चीफ को फोन कर बताते थे कि उनके शहर या इलाके में कौन सी खबर है और उसे कैसे कवर करना है।

‘आजतक’ में तब मुझे तीन महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर ट्रेनी रिपोर्टर के रूप में काम करने का मौका मिला था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तब तकनीकी रूप से इतना समृद्ध भी नहीं था। मेरा कॉन्ट्रैक्ट 10 सितंबर को पूरा होने वाला था, उससे पहले ही मैं एसपी के पास पहुंच गया और पूछ बैठा कि सर तीन महीने पूरे होने वाले हैं अब बता दीजिए कि 10 सितंबर के बाद आना है या नहीं। एसपी हंस पड़े और बोले कि आपके काम से मैं बहुत खुश हूं और आप मेरे साथ काम कर रहे हैं। तभी मुझे असिस्टेंट न्यूज को-ऑर्डिनेटर का पद दिया गया।

एसपी के साथ काम करने में सबसे बड़ी सुविधा थी उनकी सहज उपलब्धता। उनसे हर कोई सहज ही मिल सकता था और कुछ भी पूछ सकता था। खेल हो या बिजनेस, राजनीति हो या चुनाव, हर विषय पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। ‘आजतक’ के शुरुआती दौर में एसपी हर खबर की एक-एक लाइन पढ़ते थे और फिर उस पर अपनी राय देते थे। खबरों को लेकर उनसे सीधा जुड़ाव होने के कारण ही मुझे उनसे इंटरैक्शन का पूरा मौका भी मिला।

शो की शूटिंग के दौरान कई मजेदार घटनाएं भी घटती रहती थीं। मुझे याद है एक ऐसी ही मजेदार घटना तब घटी थी जब लालू प्रसाद यादव गेस्ट के रूप में स्टूडियो आए थे। लालू यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे। स्टूडियो में लालू यादव और एसपी के बीच सवाल-जवाब का दौर शुरू हो गया। इंटरव्यू रिकॉर्ड हो रहा था। उस समय किसी का भी इंटरव्यू चार मिनट से ज्यादा नहीं जा सकता था, क्योंकि शो ही 20 मिनट का था। अब लालू ने पहले सवाल के जवाब में बोलना शुरू किया तो बोलते ही चले जा रहे थे। दूसरा सवाल पूछने के लिए एसपी उन्हें रुकने का इशारा करने लगे, लेकिन लालू उस समय कहां किसी का इशारा समझते थे। इधर जब एसपी ने देखा कि लालू को इशारा करना समय गंवाना है तो अंत में उन्होंने लालू के पैर पर ही अपना पैर जोर से मार दिया। तब जाकर लालू के बोलने पर ब्रेक लगा।

एसपी सिंह अपने आप में पत्रकारिता के विश्वविद्यालय थे। खबरों को लेकर उनका जुनून था तो विजन भी था। जो भी उनके साथ रहा, बहुत कुछ सीख गया। एसपी के साथ काम करके ही मेरी बुनियाद मजबूत हो पाई, जिस पर आज मैं खड़ा हूं। 

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शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था, पर ये है उनकी 'असली कहानी'

उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था...

Last Modified:
Tuesday, 27 June, 2023
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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

हिन्दुस्तान में जो स्थान संगीत में केएल सहगल, मोहम्मद रफी या लता का है, क्रिकेट में सुनील गावस्कर या सचिन तेंदुलकर का है, हॉकी में मेजर ध्यानचंद का है, फिल्म अभिनय में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन का है, वही स्थान हिंदी पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर और हिंदी टीवी पत्रकारिता में एसपी का है। जब चैनल नहीं थे तो उस दौर में एसपी ने टीवी पत्रकारिता के जो कीर्तिमान या मानक तय किए, वे आज भी मिसाल हैं। इन्हीं महानायक एसपी की पुण्यतिथि सत्ताइस जून को है। मेरा उनके साथ करीब सत्रह साल तक करीबी संपर्क रहा। उन दिनों सारे हिन्दुस्तान में खुशी की लहर ने लोगों के दिलों को भिगोना शुरू कर दिया था। आजादी की आहट सुनाई देने लगी थी। ये तय हो गया था कि दो-चार महीने में अंग्रेज हिन्दुस्तान से दफा हो जाएंगे। इसलिए मोहल्लों में मिठाइयां बंटा करती थीं, दिन रात लोग झूमते, नाचते, गाते नजर आते। ऐसे ही माहौल में बनारस के पड़ोसी जिले गाजीपुर से आधे घंटे के फासले पर बसे पातेपुर गांव में जगन्नाथ सिंह के आंगन से मिठाइयों के टोकरे निकले और बच्चों से लेकर बूढों तक सबने छक कर मिठाई खाई।

जगन्नाथसिंह के घर बेटा आया था। नाम रखा गया सुरेन्द्र। आगे चलकर इसी सुरेन्द्र ने भारतीय हिंदी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी। प्राइमरी की पढ़ाई पातेपुर स्कूल में हुई। ठेठ गांव के माहौल में देसी संस्कार दिल और दिमाग में गहरे उतर गए। पिता जगन्नाथ सिंह रौबीले और शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे। वैसे तो कारोबारी थे, लेकिन पढ़ाई लिखाई के शौकीन थे। कारोबार के सिलसिले में बंगाल के गारोलिया कस्बे में जा बसे। पातेपुर के बाद गारोलिया स्कूल में सुरेन्द्र की पढ़ाई शुरू हो गई। पढ़ने का जुनून यहां तक था कि जेब खर्च के लिए जो भी पैसे मिलते, किताबें खरीदने में खर्च हो जाते। फिर अपने पर पूरे महीने एक पैसा खर्च न होता। बड़े भाई नरेन्द्र को भी पढ़ने का शौक था। मुश्किल यह थी कि गारोलिया में किताबों की एक भी दुकान नहीं थी। दोनों भाई करीब तीन किलोमीटर दूर श्यामनगर कस्बे तक पैदल जाते। किताबें खरीदते और लौट आते।

सुरेन्द्र ने कोलकाता विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में और सुरेन्द्रनाथ कॉलेज से कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद वो नौकरी की खोज में जुटे। दरअसल सुरेन्द्र के दोस्तों को यकीन था कि वो जहां भी अर्जी लगाएंगे तो वो नौकरी उन्हें मिल जाएगी। इसलिए जैसे ही कोई विज्ञापन निकलता, दोस्त सुरेन्द्र को घेर लेते और कहते कि वो आवेदन न करें क्योंकि इस नौकरी की ज्यादा जरूरत अमुक दोस्त को है। उसके घर की हालत अच्छी नहीं है। बेचारे सुरेन्द्र ने दोस्तों पर दया दिखाते हुए चार पांच नौकरियां छोड़ीं। एक दो बार तो ऐसा हुआ कि नौकरी के लिए आवेदन सुरेन्द्र ने दिया और दोस्तों ने सिफारिश लगवाई सुरेन्द्र के पिताजी से। उनसे प्रार्थना की कि वो सुरेन्द्र से साक्षात्कार में न जाने के लिए कहें। सुरेन्द्र भला पिताजी की बात कैसे टाल सकते थे। क्या आज के जमाने में आप किसी नौजवान या उसके पिता से ऐसा आग्रह कर सकते हैं? बहरहाल, इतनी दया दिखाने के बाद भी सुरेन्द्र बैरकपुर के नेशनल कॉलेज में हिंदी के व्याख्याता बन गए।

उन दिनों दिनमान देश की सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पत्रिका थी। सुरेन्द्र को इसका नया अंक आने का बेसब्री से इंतजार रहता। आते ही एक बैठक में पूरा अंक पढ़ जाते। इन्ही दिनों दिनमान में प्रशिक्षु पत्रकारों के लिए विज्ञापन छपा। सुरेन्द्र ने आवेदन कर दिया। बुलावा आ गया। इन्टरव्यू लेने के लिए रौबीले संपादक डॉक्टर धर्मवीर भारती बैठे थे। उनका खौफ ऐसा था कि दफ्तर में आ जाएं तो कर्फ्यू लग जाता। सुरेन्द्र पहुंचे तो उन्होंने सवाल दागा-

आप नौकरी में हैं तो यहां क्यों आना चाहते हैं?

सुरेन्द्र का उत्तर भी उसी अंदाज में।

बोले, "ये नौकरी उससे बेहतर लगी"।

डॉक्टर भारती का अगला सवाल तोप के गोले जैसा, "इसका मतलब कि अगली नौकरी इससे बेहतर मिलेगी तो ये भी छोड़ देंगे?

सुरेन्द्र का उत्तर भी तमतमाया सा। बोले, "बेशक छोड़ दूंगा, क्योंकि मुझे पता नहीं था कि यहां नौकरी नहीं गुलामी करनी होगी"।

धर्मवीर भारती ने उन्हें दस मिनट इंतजार कराया और नियुक्ति पत्र थमा दिया। ये अंदाज था सुरेन्द्र प्रताप सिंह का। प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर धर्मयुग में नौकरी शुरू कर दी। जाते ही धर्मयुग के माहौल में क्रांतिकारी बदलाव। कड़क और फौजी अंदाज गायब। जिन्दा और धड़कता माहौल। डॉक्टर भारती परेशान। उन्होंने सुरेन्द्र का तबादला जानी मानी फिल्म पत्रिका ‘माधुरी’ में कर दिया। माधुरी में सुरेन्द्र क्या गए, धर्मयुग में धमाल बंद। सन्नाटा पसर गया।

इन्हीं दिनों सुरेन्द्र का लेख प्रकाशित हुआ- खाते हैं हिंदी का, गाते हैं अंग्रेजी का। छपते ही सुरेन्द्र प्रताप सिंह की धूम मच गई। डॉक्टर भारती ने सुरेन्द्र को वापस धर्मयुग में बुला लिया। सुरेन्द्र सबके चहेते बन चुके थे। मित्र मंडली ने नाम रखा एसपी। इसके बाद सारी उमर वो सिर्फ एसपी के नाम से जाने जाते रहे। उन दिनों एसपी को हर महीने चार सौ सड़सठ रुपए मिलते थे। किताबों के कीड़े तो बचपन से ही थे इसलिए आधा वेतन किताबों पर खर्च हो जाता और आधा शुरू के पंद्रह दिनों में। बाद के पन्द्रह दिन कड़की रहती। एक-एक जोड़ी कपड़े पन्द्रह से बीस दिन तक चलाते। छुट्टी होती तो दिन भर सोते। एक दोस्त ने वजह पूछी तो बोले, ‘जागूंगा तो भूख लगेगी और खाने के लिए पैसे मेरे पास नहीं हैं।

पत्रकारिता धुआंधार; पत्रकारिता में पच्चीस बरस की पारी बहुत लंबी नहीं होती, लेकिन इस पारी में एसपी ने वो कीर्तिमान कायम किए, जो आइन्दा किसी के लिए हासिल करना मुमकिन नहीं। इन पच्चीस वर्षों में करीब सत्रह साल तक मैंने भी उनके साथ काम किया। प्रिंट में एसपी ने रविवार के जरिए पत्रकारिता का अद्भुत रूप इस देश को दिखाया तो बाद में टेलिविजन पत्रकारिता के महानायक बन बैठे। सिर्फ बाइस महीने की टेलिविजन पारी ने एसपी को इस मुल्क की पत्रकारिता में अमर कर दिया।

जब आनंद बाजार पत्रिका से रविवार निकालने का प्रस्ताव मिला तो एसपी ने शर्त रखी- पूरी आजादी चाहिए और उन्नीस सौ सतहत्तर में देश ने साप्ताहिक रविवार की वो चमक देखी कि सारी पत्रिकाएं धूमिल पड़ गईं। शानदार, धारदार और असरदार पत्रकारिता। मैं भी इस दौर में लगातार रविवार में एसपी की टीम का सदस्य था। करीब सात साल तक समूचे हिन्दुस्तान ने हिंदी पत्रकारिता का एक नया चेहरा देखा।

रविवार के पहले अंक की कवर स्टोरी थी- रेणु का हिन्दुस्तान। उस दौर की राजनीति, भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों और सरोकारों पर फोकस रविवार के अंक एक के बाद एक धूम मचाते रहे। ये मैगजीन अवाम की आवाज बन गई थी। बोलचाल में लोग कहा करते थे कि रविवार नेताओं और अफसरों को करंट मारती है। पक्ष हो या प्रतिपक्ष- एसपी ने किसी को नहीं बख्शा। खोजी पत्रकारिता का आलम यह था कि अनेक मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की बलि रविवार की समाचार कथाओं ने ली। कई बार तो ऐसा हुआ कि जैसे ही नेताओं को भनक लगती कि इस बार का अंक उनके भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ कर रहा है तो सभी बुक स्टाल्स से मैगजीन गायब करा दी जाती और तब एसपी दुबारा मैगजीन छपाते और खुफिया तौर पर वो अंक घर घर पहुंच जाता। जी हां हम बात कर रहे हैं आजादी के तीस-पैंतीस साल बाद के भारत की। एक बार मेरी कवर स्टोरी छपी- अर्जुन सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप और हमारी निष्पक्ष जांच। अर्जुन सिंह उन दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जैसे ही रविवार का वो अंक बाजार में आया, चौबीस घंटे के भीतर सारी प्रतियां प्रदेश के सभी जिलों से गायब करा दी गईं। एसपी को पता चला तो दुबारा अंक छपा और गुपचुप बाजार में बंटवा दिया। अर्जुन सिंह सरकार देखती रह गई।

यूं तो एसपी भाषण देने से परहेज करते थे, लेकिन जब उन्हें बोलना ही पड़ जाता तो पेशे की पवित्रता हमेशा उनके जेहन में होती। पत्रकारों की प्रामाणिकता उनकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर थी। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, ‘आज पत्रकारों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। छोटे शहरों में चले जाइए तो पाएंगे कि पत्रकार की इमेज अब पुलिस वाले की होती जा रही है। लोग उनसे डरते हैं। इस इमेज को तोड़ना पड़ेगा… आज पत्रकारिता के जरिए कुछ लोग अन्य सुविधाएं हासिल करने में लगे हैं इसलिए पत्रकारों में चारित्रिक गिरावट आई है। पर यह गिरावट समाज के हर अंग में आई है… ऐसे बहुत से लोग हैं जो पत्रकार रहते हुए नेतागीरी करते हैं और नेता बनने के बाद पत्रकारिता… दरअसल पत्रकार कोई देवदूत नहीं होता उनमें भी बहुत सारे दलाल घुसे हुए हैं और ये भी सच है कि समाज के बाहर रहकर पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह कैसे हो सकता है कि समाज तो भारत का हो और पत्रकारिता फ्रांस की हो।’

एसपी के तेवर और अंदाज ने नौजवान पत्रकारों को दीवाना बना दिया था। उन दिनों हर युवा पत्रकार रविवार की पत्रकारिता करना चाहता था। इसी दौरान उन्नीस सौ बयासी में एसपी की मुलाकात राजेंद्र माथुर से हुई, जो उन दिनों नईदुनिया इंदौर के प्रधान संपादक थे। पत्रकारिता के दो शिखर पुरुषों की इस मुलाकात ने आगे जाकर भारतीय हिंदी पत्रकारिता में एक नया अध्याय लिखा। उन्नीस सौ पचासी में एसपी राजेन्द्र माथुर के सहयोगी बन गए। तब राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। वो एसपी को मुंबई संस्करण का स्थानीय संपादक बना कर मायानगरी ले आए। अगले ही साल एसपी राजेंद्र माथुर के साथ कार्यकारी संपादक के तौर पर दिल्ली में काम कर रहे थे, लेकिन मुंबई छोड़ने से पहले मायानगरी में बड़े परदे के लिए भी एसपी ने अदभुत काम किया।

जाने माने फिल्मकार मृणाल सेन की 'जेनेसिस' और 'तस्वीर अपनी अपनी' फिल्मों की पटकथा लिखी। विजुअल मीडिया के लिए एसपी की यह शुरुआत थी। गौतम घोष की फिल्म 'महायात्रा' और 'पार' फिल्में भी उन्होंने लिखीं लेकिन सराहना मिली 'पार' से। इस फिल्म को अनेक पुरस्कार मिले। पांच साल तक माथुर-एसपी की जोड़ी ने हिंदी पत्रकारिता में अनेक सुनहरे अध्याय लिखे। अखबार की भाषा, नीति और ले आउट में निखार आया।

एसपी की नई भूमिका और राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गज का मार्गदर्शन अखबार में क्रांतिकारी बदलाव की वजह बना। लखनऊ, जयपुर, पटना और मुंबई संस्करणों की पत्रकारिता से लोग हैरान थे। वो दिन देश के राजनीतिक इतिहास में उथल पुथल भरे थे। जाहिर है पत्रकारिता भी अछूती नहीं थी। दोनों संपादक मिलकर रीढ़वान पत्रकारिता का नमूना पेश कर रहे थे। यह मेरे जीवन का भी यादगार समय था क्योंकि मैं तब इन दोनों महापुरुषों के साथ नवभारत टाइम्स में काम कर रहा था।

इन्ही दिनों जाने माने पत्रकार और संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के जरिए एक नए किस्म की पत्रकारिता की मशाल जलाई थी। अखबार और पत्र पत्रिकाएं पढने वाले लोग नवभारत टाइम्स और जनसत्ता की ही चर्चाएं करते थे। उनके संपादकीय बहस छेड़ा करते थे। देश में संपादक के नाम पत्र लिखने वालों का आन्दोलन खड़ा हो गया था। तीन बड़े संपादक अपने अपने अंदाज में भारतीय हिंदी पत्रकारिता को आगे ले जा रहे थे। मेरी नजर में वैचारिक पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। सिंह और माथुर की जोड़ी लोकप्रियता के शिखर पर थी कि अचानक नौ अप्रैल उन्नीस सौ इक्यानवे को दिल का दौरा पड़ने से राजेंद्र माथुर का निधन हो गया। पत्रकारिता के लिए बड़ा झटका। इन दिनों पत्रकारिता पर तकनीक और बाजार के दबाव का असर साफ दिखने लगा था। एसपी ने इन दबावों से मुकाबला जारी रखा। वो पत्रकारिता में बाजार के दखल को समझते थे लेकिन पत्रकारिता के मूल्य और सरोकार उनके लिए सर्वोपरि थे। नतीजा कुछ समय बाद नवभारतटाइम्स से उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद एसपी ने स्वतंत्र पत्रकारिता का फैसला किया और फिर देश ने एसपी के गंभीर लेखन का नया रूप देखा। तमाम अखबारों में उनके स्तंभ छपते और चर्चा का विषय बन जाते। साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनके लेखों ने लोगों को झकझोर दिया।

सिलसिला चलता रहा। एसपी लेखन को एन्जॉय कर रहे थे। इसी बीच कपिलदेव ने उनसे देव फीचर्स को नया रूप देने का अनुरोध किया। हालांकि यह पूर्णकालिक काम नहीं था, मगर एसपी ने थोड़े ही समय में उसे शानदार न्यूज एंड फीचर एजेंसी में तब्दील कर दिया। बताना प्रासंगिक है कि देव फीचर्स में भी मैं उनका सहयोगी था। इसके बाद संक्षिप्त सी पारी टाइम्स टेलीविजन के साथ खेली। वहां उन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बुनियादी बातें जानने का मौका मिला। आलम यह था कि एसपी एक प्रस्ताव स्वीकार कर काम शुरू करते तो दूसरा प्रस्ताव आ जाता। इसी कड़ी में द टेलीग्राफ के राजनीतिक संपादक पद पर काम करने का न्यौता मिला। यहां भी एसपी ने निष्पक्ष पत्रकारिता की शर्त पर काम स्वीकार किया। आज के दौर में शायद ही कोई संपादक नौकरी से पहले इस तरह की शर्त रखता हो। वह अपने वेतन और अन्य सुविधाओं की शर्त रखता है, लेकिन निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की आजादी की बात नहीं करता। अपनी नीति और प्रतिभा के चलते ही एसपी को इंडिया टुडे के सभी क्षेत्रीय संस्करणों के संपादन का आफर मिला। हर बार की तरह यहां भी उनकी शर्तें मान लीं गईं। इंडिया टुडे में उनके- मतान्तर और विचारार्थ बेहद लोकप्रिय कॉलम थे। इसके अलावा बीबीसी पर भारतीय अखबारों में प्रकाशित खबरों की समीक्षा का कॉलम भी शुरू हुआ। यह कॉलम इतना लोकप्रिय हुआ कि अनेक अखबारों में उनकी समीक्षा को सुनकर खबरों की नीति तय की जाने लगी। यह भी अपने तरह का अनूठा उदाहरण है।

दिन अच्छे कट रहे थे। उन दिनों दूरदर्शन ही भारतीय टेलीविजन का चेहरा था। विनोद दुआ के लोकप्रिय समाचार साप्ताहिक 'परख' और सिद्धार्थ काक की सांस्कृतिक पत्रिका 'सुरभि' दर्शकों में अपनी पहचान बना चुकी थीं अलबत्ता निजी प्रस्तुतकर्ताओं को दैनिक समाचार पेश करने की अनुमति अभी नहीं मिली थी। चंद रोज बाद विनोद दुआ को शाम का दैनिक बुलेटिन न्यूज वेब पेश करने का अवसर मिला। भारतीय टीवी पत्रकारिता के इतिहास में यह ऐतिहासिक कदम था। कुछ दिनों बाद ये बुलेटिन बंद हो गया और इंडिया टुडे समूह को डी डी मेट्रो पर 'आजतक' शुरू करने का प्रस्ताव मिला। आजतक की टीम में भी मैं उनके साथ था। थोड़े ही दिनों में आजतक ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। शुरुआत में एसपी को टेलीविजन के लायक नहीं बताया जा रहा था, लेकिन बाद में जब कभी एसपी एक दिन के लिए भी अवकाश लेते तो दर्शक बेचैन हो जाते। पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण- चारों तरफ उनकी लोकप्रियता समान थी। एक दिन देश भर में ये खबर फैली कि सारे गणेश मंदिरों में गणेश जी दूध पी रहे हैं। फिर क्या था दफ्तरों में सन्नाटा छा गया। अंधविश्वास के कारण लाखों लीटर दूध बह गया। एसपी ने इसकी वैज्ञानिक व्याख्या की और पोल खोल कर रख दी। उन्होंने यह भी साफ किया कि आखिर गणेश जी के दूध पीने का प्रोपेगंडा करने की योजना कहां बनी थी। उन्नीस सौ छियानवे के लोकसभा चुनाव और उसके बाद केन्द्रीय बजट पर अपने खास सीधे प्रसारण के जरिए एसपी ने घर-घर में अपनी जगह बना ली थी। उनकी बेबाक टिप्पणियां लोगों का दिल खुश कर देतीं।

अंतिम विदाई: उस दिन की शक्ल बड़ी मनहूस थी। उपहार सिनेमा में लगी आग ने दिल्ली को झकझोर दिया था। मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही थी। कवरेज में लगे कैमरे एक के बाद एक दर्दनाक कहानियां उगल रहे थे। एसपी सहयोगियों को बुलेटिन के लिए निर्देश दे रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें इस हादसे ने हिला दिया था। सुरक्षा तंत्र की नाकामी से अनेक घरों में भरी दोपहरी अंधेरा छा गया था। हर मिनट खबर का आकार और विकराल हो रहा था। एसपी ने तय किया कि पूरा बुलेटिन इसी हादसे पर केन्द्रित होगा। बुलेटिन भी क्या था दर्द भरी दास्तानों का सिलसिला। एसपी अपने को संभाल न पाए। जिन्दगी की क्रूर रफ्तार पर व्यंग्य करते हुए जैसे तैसे बुलेटिन खत्म किया और फूट फूट कर रो पड़े। उनके चाहने वालों के लिए एसपी का ये नया रूप था। अब तक उनके दिमाग में एसपी की छवि सख्त और मजबूत संपादक पत्रकार की थी। वो सोच भी नहीं सकते थे कि एसपी अंदर से इतने नरम, भावुक और संवेदनशील होंगे। उस रात एसपी सो न पाए और सुबह होते होते उन्हें ब्रेन हेमरेज होने की खबर जंगल में आग की तरह देश भर में फैल गई। अस्पताल में चाहने वालों का तांता लग गया। उनके फोन अगले कई दिन तक दिन रात व्यस्त रहे। देश भर से एसपी के चाहने वाले उनकी तबियत का हाल जानना चाहते थे। सैकड़ों की तादाद में लोगों ने अस्पताल में ही डेरा डाल लिया था। हर पल उन्हें इंतजार रहता कि डॉक्टर अभी आएंगे और उनके अच्छे होने का समाचार देंगे। लेकिन ये न हुआ। एक के बाद एक दिन गुजरते रहे। एसपी होश में नहीं आए और आखिर वो दिन भी आ पहुंचा, जब एसपी अपने उस सफर पर चल दिए, जहां से लौटकर कोई नहीं आता।

उनके देहावसान की खबर सुनते ही हर मीडिया हाउस में सन्नाटा छा गया था। देश भर के पत्रकार, संपादक, राजनेता, अधिकारी, छात्र, प्राध्यापक, तमाम वर्गों के बुद्धिजीवी सदमे में थे। हर प्रसारण केंद्र ने एसपी के निधन की खबर को जिस तरह स्थान दिया, वो बेमिसाल है। राजेंद्र माथुर के अलावा किसी पत्रकार को समाज की तरफ से इस तरह की विदाई नहीं मिली। एसपी अब नहीं हैं, लेकिन अपनी पत्रकारिता की वजह से वो इस देश के करोड़ों दिलों में हमेशा धड़कते रहेंगे।

हिंदी टीवी न्यूज के पहले सुपर स्टार सुरेंद्र प्रताप सिंह की पुण्यतिथि पर वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी तैयार की है, जिसे आप यहां देख सकते हैं- 

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'राजेंद्र माथुर जी किसी अखबार की भाषा को नहीं, बल्कि उसके स्तर को महत्व देना पसंद करते थे'

राजेंद्र माथुर की केवल अंग्रेजी ही अच्छी नहीं थी, उनके पास नई भाषा को गढ़ने वाले मुहावरे थे। वे बातों को रूपक शैली में लिखते थे और वह शैली लोगों को बहुत पसंद आती थी...

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Saturday, 09 April, 2022
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डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार ।।

मैंने राजेंद्र माथुर जी के साथ दो पारियों में काम किया। पहले नईदुनिया और बाद में नवभारत टाइम्स में। आज उनके बिना हिंदी पत्रकारिता को 31 साल हो गए हैं।जब राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता के संसार से विदा हुए, तब इंटरनेट और मोबाइल चलन में नहीं थे। सोशल मीडिया और वाट्सएप मीडिया भी नहीं था। टीवी के इतने प्राइवेट चैनल भी नहीं थे। पत्रकारिता मूल रूप से प्रिंट तक ही सीमित थी और प्रिंट में भी पत्रकारिता की अलग-अलग शाखाएं थी।
 
राजेंद्र माथुर के दौर में पत्रकारिता में जिस तरह के बदलाव हो रहे थे, अब उससे अलग तरह के बदलाव हो रहे है। ये बदलाव तेज गति वाले है, किसी आंधी या तूफान की तरह। जिस बात को हम हिंदी पत्रकारिता में दस साल पहले सत्य मानते थे, अब वह कहीं नजर नहीं आती और आज हम जिस पत्रकारिता को देख रहे है, वह पांच साल बाद अलग होगी। अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे राजेन्द्र माथुर के लेख टाइम्स ऑफ इंडिया में भी प्रमुखता से छपते रहते थे और टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार मुझसे पूछते थे कि इतनी अच्छी अंग्रेजी लिखने वाले राजेन्द्र माथुर आखिर टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक क्यों नहीं बन जाते?
 
राजेंद्र माथुर की केवल अंग्रेजी ही अच्छी नहीं थी, उनके पास नई भाषा को गढ़ने वाले मुहावरे थे। वे बातों को रूपक शैली में लिखते थे और वह शैली लोगों को बहुत पसंद आती थी। इमरजेंसी के दिनों में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के बहाने भारत में घट रही घटनाओं को लेकर इस तरह लिखा कि कोई भी आदमी आसानी से समझ सकता था कि आखिर यह बात किस संदर्भ में कही जा रही है। वामपंथ और दक्षिणपंथ को समझने की उनकी विशेषता थी कि वे जब इन पंथों के बारे में लिखते, तब वह पठनीय और विचारणीय बात हो जाती। समाजवाद को लेकर उन्होंने जो कुछ लिखा, वह आज भी लोगों को याद है। हिंदी पत्रकारिता की शक्ति को उन्होंने आधी शताब्दी पहले ही समझ लिया था। वे कहते थे कि भारत के सभी हिंदी भाषी राज्यों की राजधानी से ऐसे हिंदी अखबार निकल सकते है, जिनका मुकाबला दुनिया के श्रेष्ठतम अखबार भी नहीं कर पाएंगे। अगर अभी (उस दौर में) हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जहां उसे होना चाहिए, तो इसका कारण यह है कि हिंदी पत्रकारिता में तकनीक और शिल्प को प्रमुखता नहीं मिल रही है।
 
वे बार-बार कहते थे कि हिंदी पत्रकारिता तभी शिखर पर होगी, जब हिंदी के पत्रकार और अखबार अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं से बेहतर काम करे। हिंदी के पाठकों के क्रयशक्ति बढ़ने के साथ ही हिंदी की शक्ति भी बढ़ने लगेगी। अंग्रेजी पत्रकारिता के प्रोफेशनलिज्म के आगे हिंदी पत्रकारिता में वह प्रोफेशनलिज्म नजर नहीं आता। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन हिंदी का ही बोलबाला होगा। कुछ मामलों में राजेंद्र माथुर के विचार बहुत स्पष्ट थे। किसी भी अखबार को पसंद करने के पीछे वे इसकी भाषा नहीं, बल्कि उस अखबार के स्तर को महत्व देते थे।
 
भाषा और देश में से किसी का चुनाव करना हो, तो उनका स्पष्ट कहना था कि देश है तो भाषा है। संपादक के रूप में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को संपन्न बनाने के लिए नए-नए प्रयोग किए। अखबार की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उसके वैचारिक पक्ष का भी पूरा ध्यान रखा। साथ ही पाठकों में लोकप्रिय तत्वों का भी समावेश करते चले गए। राजेंद्र माथुर ऐसे संपादक थे, जिनके नेतृत्व में हर विचारधारा के पत्रकार काम करते रहे। अपने साथी पत्रकारों की प्रतिभा का मूल्यांकन उन्होंने विचारधारा के आधार पर नहीं किया। सभी सहकर्मियों की विचारधारा का भी वे सम्मान करते रहे और मौका पड़ने पर उनसे चर्चा भी करते रहे। अलग-अलग भाषाएं जानने वाले और अलग-अलग धर्म और जाति के पत्रकार वे अपने अखबार से जोड़ते गए। नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में भी उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेषज्ञ पत्रकारों की नियुक्ति करवाई। गाहे बगाहे वे खुद भी ग्रामीण इलाकों में जाते और आम आदमी के चश्मे से वहां की जिंदगी और समस्याओं को देखने और समझने की कोशिश करते। उन्होंने प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों की राजधानी से हिंदी अखबार शुरू करने की पहल की थी। लखनऊ-पटना और जयपुर से अखबार के नए संस्करण शुरू किए गए थे। इससे अखबार का वितरण आसान हुआ।
 
जब चांद पर मानव के कदम पड़े, तब उन्होंने अपने अखबार में एक विशेष अंक प्रकाशित किया था, जिसमें मानव के चंद्र अभियान की संपूर्ण सचित्र और वैज्ञानिक यात्रा वर्णन था। इतने अच्छे विशेषांक उस दौर में अंग्रेजी के अखबार भी नहीं निकाल पाए थे। संपादकीय पृष्ठ पर समकालीन कविता प्रकाशित करने का प्रयोग भी उन्होंने किया था और प्रतिदिन व्यंग कॉलम भी उन्होंने प्रकाशित करना शुरू किया। राजेंद्र माथुर अखबार के संपादक थे, तो संपादक ही रहे, उन्होंने अखबार का प्रबंधक बनने की कोशिश नहीं की। उन्हें जब प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी जाने की बात होती, तब वे कन्नी काट जाते। उनकी अधिकांश चिंताएं समाचार पत्र की गुणवत्ता को लेकर ही रहती। समाचार पत्र किस तरह और धंधे करें, नेताओं से संपर्क करें, पेड न्यूज छापे, इवेंट आदि का आयोजन कर उगाही करें जैसे कामों में उनकी रूचि शायद ही होती। आज के दौर में प्रकाशन संस्थाओं को ऐसे चिंतनशील पत्रकारों की आवश्यकता कम ही होगी।
 
राजेंद्र माथुर के जाने के बाद इन 31 वर्षों में पत्रकारों की एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है। 1991 में जब उनका निधन हुआ था, तब वर्तमान के पत्रकारों की एक बड़ी संख्या पत्रकारिता का ककहरा सीख रही थी। अब ये सब लोग युवा हो चुके है और इनके लिए पत्रकारिता के मायने बदल चुके है। समाचार प्रकाशन संस्थानों के लिए भी अब पत्रकारिता का अर्थ कुछ और हो गया है। दौर कोई भी हो, राजेंद्र माथुर का महत्व कम नहीं होने वाला।

(श्री राजेंद्र माथुर का यह फोटो 1982 का है और यह उन्होंने नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बनने पर बैनेट, कोलमैन एंड कंपनी के एच आर विभाग के आग्रह पर दफ्तर में जमा करने के लिए खिंचवाया था.)  

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जरूर पढ़िए, सदी के संपादक राजेंद्र माथुर का दशकों पुराना लेख, ऐसे लिखा था समाज का सच

हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुषों में से एक, राजेंद्र माथुर (1935-1991) का निधन 9 अप्रैल को हुआ था। वह 1982 से लेकर 1991 तक नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक रहे।

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Saturday, 09 April, 2022
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हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुषों में से एक, राजेंद्र माथुर (1935-1991) का निधन 9 अप्रैल को हुआ था। वह 1982 से लेकर 1991 तक नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक रहे। उनकी पुण्यतिथि पर समाचर4मीडिया ने कुछ चुनिंदा लेखकों के लेखों के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी, जिसके जरिए आज की पीढ़ी ने माथुर साहब को जाना। आपने उन पर उनके सहयोगियों द्वारा लिखे कई लेख पढ़े, पर अब हम पेश कर रहे हैं माथुरजी की कलम से निकला एक बेहद शानदार लेख। हिंदी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ ने उस लेख को प्रकाशित किया था, जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं...

एक सफेदपोश स्वर्ग

राजेंद्र माथुर

प्रजातंत्रीय भारत में समाजवाद क्यों नहीं आ रहा है, इसका उत्तर तो स्पष्ट है। समाजवाद के रास्ते में सबसे बड़ा अड़ंगा स्वयं भारत की जनता है, वह जनता जिसके हाथ में वोट है। यदि जनता दूसरी होती, तो निश्चय ही समाजवाद तुरन्त आ जाता। हमने जिस खयाल का समाजवाद का नाम देकर दिमाग में ठूंस रखा है, उसे मार्क्स, लेनिन, माओ कोई समाजवाद नहीं कह सकते। इस शब्द का अर्थ ही हमारे लिए अलग है। समाजवाद का अर्थ इस देश के शब्दकोश में मजदूर किसानों का राज नहीं है, पार्टी की तानाशाही नहीं है, पुरानी व्यवस्था का विनाश नहीं है, नए मूल्यों का निर्माण नहीं है। हमारे लिए समाजवाद का अर्थ एक सफेदपोश स्वर्ग है, जिसमें इस देश का हर नागरिक 21 साल पूरे करते ही पहुंच जाएगा। यह ऐसा स्वर्ग है, जिसमें किसानी और मजदूरी की जरूरत ही नहीं होगी। ऐसा कोई वर्ग ही नहीं होगा, जिसे बदन से मेहनत करनी पड़े। रूस ने अपने संविधान में काम को बुनियादी अधिकार माना है, लेकिन भारत के सफेदपोश स्वर्ग में काम की कुप्रथा का हमेशा के लिए अन्त कर दिया जाएगा।

बेशक जो मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग हैं, वे कोई सफेदपोश स्वर्ग नहीं, बल्कि अपनी नारकीय गरीबी से जार-सी राहत चाहते हैं। वे करोड़ों हैं, शायद 80 प्रतिशत हैं। लेकिन वे बेजुबान हैं, असंगठित हैं और राजनीतिविहीन हैं। शायद वे इस तरह वोट देते हैं, जैसे रोटरी क्लब के अध्यक्ष पद के लिए सारे इन्दौर की जनता वोट देने लगे। राजनीति का क्लब थोड़े से लोगों का है, लेकिन वोट सबको हैं। शायद भारत के सबसे गरीब लोग अभी इतने असन्तुष्ट भी नहीं हुए हैं कि वर्तमान व्यवस्था को हर कीमत पर तहस-नहस कर डालें। इन्दिरा गांधी और जगजीवनराम गरीबी हाटाने की चाहे जितनी बात करें, लेकिन जो गरीबी राजनैतिक रूप से दुखद नहीं है, वह कभी नहीं हटेगी। जिस बच्चे ने चिल्लाना नहीं सीखा है, वह बिना दूध के भूखा ही मरेगा। वह यों भी हमेशा भूखों मरता आया है और तृप्ति को उसने कभी अपना अधिकार नहीं माना है। क्योंकि यह सर्वहारा वर्ग अभी राजनीति से विलग है, इसलिए रूस या चीन जैसा समाजवाद इस देश में नहीं आ सकता।

फिर भारत में कौन-सा वर्ग सबसे अधिक मुखर, और राजनीति में पगा हुआ है/ उत्तर स्पष्ट है—मध्यम वर्ग। इसमें क्लर्क, शिक्षक, व्यापारी, खाते-पीते, किसान, ट्रेड यूनियन के मजदूर और उनके लाखों बी. ए. पास बेटे आ जाते हैं। कोई बाबू नेता (और हमारे यहां सारे नेता बाबू ही हैं) क्या ऐसे समाजवाद की कल्पना करता है, जिसमें उसके बेटे को हंसिया लेकर खेत काटने पड़ें या एम. बी. बी. एस करने के बाद गांव-गांव साइकिल पर बैठकर दवाएं बांटनी पड़ें या गांव का गोबर खुद उठाना पड़े/ कितने क्लर्कों के बेटे आज तक ट्रक ड्राइवर बने हैं/ क्या डॉक्टर के बेटे ने कभी दवा की दुकान लगाई है/ ये सब लोग समाजवाद चाहते हैं क्योंकि उसका अर्थ है सरकारी दफ्तरों का एक अनन्त सिलसिला, जिसमें अनन्त बाबू-नौकरियां पैदा होती जाती हैं। नारा लगता है पढ़े-लिखों को काम दो। क्या काम दो/ जब सारे वयस्क रूस या अमेरिका की तरह पढ़-लिख जाएंगे, तब क्या वे सबके सब पैंट और बुशर्ट पहनकर कुर्सी टेबल पर डट जाएंगे/ भारत में समाजवाद का अर्थ यह है कि राजनैतिक रूप से कष्टप्रद वाले वर्ग को अधिक-से-अधिक मुफ्तखोर नौकरियां मुहैया कराई जाएं।

बेशक उन्नत देशों में यह स्थिति आ गई है कि मेहनत के कामों के बजाय अक्ल की सफेदपोश नौकरियां बढ़ गई हैं। मशीन का लक्ष्य ही आखिर काम का अन्त है। वह औद्योगीकरण की अंतिम स्थिति है। किन्तु भारत में हम पाते हैं। कि अमीरी की पहली सीढ़ी पर चढ़ने के पहले ही हम काम का अन्त चाहते हैं। इसलिए मैसूर सरकार ने सरकारी दफ्तरों का हफ्ता पांच दिन का कर दिया है और इंटक भी मांग कर रही है कि कारखानों में पांच दिन का हफ्ता कर दिया जाए। क्या लेनिन ने 1917 में राज संभालते ही 5 दिन का हफ्ता कर दिया था और वैसे सरकारी दफ्तरों में तीन दिन का हफ्ता कर दिया जाए, तो भी शायद कोई फर्क नहीं पड़े, क्योंकि प्रशासन का काफी काम जनता ही दृष्टि से अप्रासंगिक है। हमारे यहां शासन जनता का काम करने वाला यंत्रा नहीं है। वह एक राहत कार्य है और बेकारों को वेतन देने का जरिया है। काम का साइनबोर्ड लगाकर यदि किसी को बेकाम होने के मजे लूटने हों, तो वह सरकार में चला जाए।

इस प्रकार भारत में समाजवाद की कल्पना मूलतः सामन्तवादी है और हिन्दू परम्परावादी है। वह पंचायती धन को पढ़े-लिखे लोगों द्वारा बरबादी की होड़ है। कल्पना साम्राज्यवादी भी है, क्योंकि अंग्रेजों के जमाने की तरह हर साक्षर आदमी हाकिम बनना चाहता है और जनता से कटकर उस पर रौब गालिब करना चाहता है। कल्पना जातिवादी है, क्योंकि हर आदमी अपनी जातीय गरिमा के अनुरूप काम चाहता है, योग्यता के अनुरूप नहीं। हम सफेदपोश स्वर्ग के अलावा कुछ नहीं चाहते, इसका सबसे बड़ा सबूत हमारी शिक्षा प्रणाली है। यह कोई संयोग नहीं है कि 24 साल से सब उसे बुरा-बुरा कहते हैं, लेकिन कोई उसे बदलता नहीं। इसमें तुक है। यह शिक्षा पद्धति हमें पसन्द है। ज्ञान का श्रम किए बिना डिग्री लो, उसके बाद काम का श्रम बचाने वाली नौकरी मांगो। हमारी शिक्षा पद्धति आजकल नितान्त समाजवादी है। वह मेकाले ने बनाई थी और हम मेकाले के ही योग्य हैं।

लेकिन सफेदपोशी का सिलसिला सदा के लिए तो नहीं चल सकता। जिन लोगों के लिए स्वर्ग के द्वार बन्द हो चुके हैं, वे कलकत्ता की गलियों में बम फेंकते हैं या लंका में विद्रोह संगठित करते हैं। लेकिन ये लोग सत्ता प्राप्त करके भी क्या कर लेंगे। एक सफेदपोश व्यवस्था की समस्या दूसरी सफेदपोश व्यवस्था कायम करके हल नहीं की जा सकती।

प्रजातंत्रीय देशों में तो मध्यमवर्गीय वोटर के आग्रह के कारण समाजवाद एक मृग-मरीचिका है। तानाशाही देशों में स्थिति और भी विकट है। वहां समाजवाद किसी एक आदमी की सामन्तवादी सनक है। जहांपनाह खुश हए, और उन्होंने अवाम को समाजवाद का तोहफा भेंट दिया। जहांपनाह को नहीं मालूम कि राज कैसे चलाया जाता है और समाजवाद में कितनी युगों-युगों की मगजपच्ची है। माओ या कोसिगिन में कोई खामी हो, लेकिन इस तरह की मुगले आजम हरकतों को उन्होंने समाजवाद नहीं माना। इस तरह एक तानाशाह की मर्जी से कहीं दुनिया बदलती है, खासकर तब, जबकि तानाशाह सफेदपोश वर्ग का हो और उसकी सत्ता की नींव भी यही वर्ग हो। क्रांति के लिए तो खमीर नीचे से उठना चाहिए। क्रांति इसलिए नहीं होती कि वह बड़ी अच्छी चीज है, बल्कि इसलिए होती है कि उसका होना ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण लगभग अनिवार्य हो उठता है।

भारत में क्रांति अथवा परिवर्तन की उम्मीद उस वर्ग से कतई नहीं की जानी चाहिए, जो इन दिनों समाजवाद के भरपूर नारे लगा रहा है। इस वर्ग को तो वर्तमान व्यवस्था से टुकड़े मिल ही रहे हैं, और भ्रष्टाचार की सुविधाएं भी। यह वर्ग बहुत बड़ा है। यदि भारत की सबसे गरीब जनता को उन्नति के समान लाभांश नहीं मिल पाते, तो इसका कारण टाटा बिड़ला या गिने-चुने 44 परिवार नहीं हैं। कारण है 4-5 करोड़ लोगों का एक समूह, जो अधिक जबर्दस्त होने के कारण विकास के लाभ पहले ही लूट लेता है और सामाजिक न्याय को विकृत कर देता है। इसी वर्ग के कारण गांवों में प्राथमिक शिक्षा पर कम खर्च हो पाता है, और शहरों में फिजूल के विश्वविद्यालय खुलते जाते हैं। इसी वर्ग के कारण सारे डॉक्टर शहरों में एकत्रित हो जाते हैं, और विशेषज्ञ बनने का बहाना करते हैं, और गांव में कोई नहीं जीना चाहता। इसी वर्ग के कारण मंत्रियों का सारा समय सिफारिश, नियुक्ति और स्थानान्तरणों में जाता है। सफेदपोश स्वर्ग में काम ही क्या है, सिवाय इसके कि अपने कृपापात्रों को मनपसन्द कुर्सी पर बैठाया जाए। यही वर्ग अपने झूठे मानवमूल्यों के कारण सबसे असन्तुष्ट है, और इसी वर्ग को तुष्ट करने में नेताओं के दिन-रात खर्च होते हैं।

जाहिर है कि इस तरह के सफेदपोश वर्ग को न पूंजीवाद में कोई गुंजाइश है, न साम्यवाद में। पूंजीवाद में बाजार की ताकतें काम करती हैं, और जिस काम के लिए एक आदमी काफी है, उसके लिए चार कभी नहीं रखे जाते। साम्यवाद में भी आदमी की उत्पादक शक्ति का आखिरी औंस तक उपयोग होता है। गरीब देश में अनुत्पादक नौकरियां बांटने की ऐयाशी वह नहीं कर सकता। अतः हमें न तो पूंजीवाद चाहिए, न साम्यवाद। हमें प्रजातंत्रीय समाजवाद चाहिए, ताकि तरक्की की सारी कुर्बानियों से हम बच सकें, और नेताओं के मंत्राबल से स्वर्ग में पहुंच जाएं। लेकिन जादुई कालीन पर उठाकर ले जाने वाली वह सुबह कभी नहीं आएगी।

(वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित राजेंद्र माथुर संचयन से साभार)

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राजेंद्र माथुर- संभवत: पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष की मृत्यु का कारण भी यही था

राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं। मालवा के साधारण परिवार में जन्मे राजेंद्र बाबू...

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Saturday, 09 April, 2022
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राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं। मालवा के साधारण परिवार में जन्में राजेंद्र बाबू ने हिंदी पत्रकारिता जगत में असाधारण प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनका जन्म 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश  के धार जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा धार, मंदसौर एवं उज्जैन में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे इंदौर आए जहां उन्होंने अपने पत्रकार जीवन के महत्वपूर्ण समय को जिया।

राजेंद्र माथुर उन बिरले लोगों में से थे जो उद्देश्य के लिए जीते हैं। पत्रकार जीवन की शुरुआत उन्होंने स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही कर दी थी, जिस समय हिंदी पत्रकारिता मुख्य धारा में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी, उसी समय राजेंद्र बाबू भी पत्रकारिता में अपना स्थान बनाने के लिए आए थे। पत्रकारिता जगत में उन्होंने अपना स्थान ही नहीं बनाया बल्कि हिंदी पत्रकारिता को भी मुख्य धारा में लाए। अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकार राजेंद्र माथुर चाहते तो अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे। लेकिन तब शायद भारत के अंतर्मन को समझने का उचित  मौका न मिलता।

भारतीय भाषा में भारत के सरोकारों को समझने के लिए उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को अपने माध्यम के रूप में चुना। पत्रकारिता की दुनिया में उन्होंने 'नईदुनिया' दैनिक पत्र के माध्यम से दस्तक दी। नईदुनिया के संपादक राहुल बारपुते से उनकी मुलाकात शरद जोशी ने करवाई थी। बारपुते जी से अपनी पहली मुलाकात में उन्होंने पत्र के लिए कुछ लिखने की इच्छा जताई। राहुल जी ने उनकी लेखन प्रतिभा को जांचने-परखने के लिए उनसे उनके लिखे को देखने की बात कही। उसके बाद अगली मुलाकात में राजेंद्र माथुर अपने लेखों का बंडल लेकर ही बारपुते जी से मिले।

अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहन अध्ययन एवं जानकारी को देखकर राहुल जी बड़े प्रभावित हुए। उसके बाद समस्या थी कि राजेंद्र माथुर के लेखों को पत्र में किस स्थान पर समायोजित किया जाए। इसका समाधान भी राजेंद्र जी ने ही दिया। राहुल बारपुते जी का संपादकीय अग्रलेख प्रकाशित होता था, राजेंद्र जी ने अग्रलेख के बाद अनुलेख के रूप में लेख को प्रकाशित करने का सुझाव दिया। अग्रलेख के पश्चात अनुलेख लिखने का सिलसिला लंबे समय तक चला। सन 1955 में नई दुनिया की दुनिया में जुड़ने के बाद वह 27 वर्षों के लंबे अंतराल के दौरान वे नई दुनिया के महत्वपूर्ण सदस्य बने रहे।

राजेंद्र जी ने लगातार दस वर्षों तक अनुलेख लिखना जारी रखा। सन 1965 में बदलाव करते हुए उन्होंने पिछला सप्ताह नामक लेख लिखना प्रारंभ किया, जिसमें बीते सप्ताह के महत्वपूर्ण घटनाक्रम की जानकारी एवं विश्लेषण प्रकाशित होता था। सन 1969 में किसी मनुष्य ने चंद्रमा पर पहला कदम रखकर अप्रत्याशित कामयाबी पाई थी। मनुष्य के चंद्रमा तक के सफर पर नई दुनिया ने 16 पृष्ठों का परिशिष्ट प्रकाशित किया था। यह कार्य राजेंद्र माथुर के नेतृत्व में ही हुआ था। वे गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे, 1969 में वे अध्यापकी छोड़ पूरी तन्मयता के साथ नईदुनिया की दुनिया में रम गए।

'पिछला सप्ताह' स्तंभ लिखना उन्होंने आपातकाल तक जारी रखा। आपातकाल के दौरान सरकार ने जब प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। तब राजेंद्र जी ने ‘शीर्षक’ के नाम से सरकारी प्रतिक्रिया की परवाह किए बिना धारदार आलेख लिखे। सन 1980 से उन्होंने कल ‘आज और कल’ शीर्षक से स्तंभ लिखना शुरू किया। 14 जून, 1980 को वे प्रेस आयोग के सदस्य चुने गए। जिसके बाद सन 1981 में उन्होंने नई दुनिया के प्रधान संपादक के रूप में पदभार संभाला। प्रेस आयोग का सदस्य बनने के पश्चात वे टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन के संपर्क में आए।

गिरिलाल जैन ने राजेंद्र माथुर को दिल्ली आने का सुझाव दिया। उनका मानना था कि राजेंद्र जी जैसे मेधावान पत्रकार को दिल्ली में रहकर पत्रकारिता करनी चाहिए। लंबे अरसे तक सोच-विचार करने के पश्चात राजेंद्र जी ने दिल्ली का रुख किया। सन 1982 में नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन कर वे दिल्ली आए। नवभारत टाइम्स की ओर से अमेरिकी सरकार के आमंत्रण पर उन्हें अमेरिका जाने का अवसर प्राप्त हुआ। अमेरिका में गए हिंदी पत्रकार ने अपनी अंग्रेजी की विद्वता से परिचय कराया। उनकी अंग्रेजी सुनकर अंग्रेज पत्रकार भी हतप्रभ रह गए। ऐसे समय में जब अंग्रेजी प्रतिष्ठा का सवाल हो हिंदी पत्रकारिता में योगदान देना प्रेरणादायी है।

दिल्ली आने के पश्चात राजेंद्र माथुर ने 'नवभारत टाइम्स' को दिल्ली, मुंबई से निकालकर प्रादेशिक राजधानियों तक पहुंचाने का कार्य किया। 'नवभारत टाइम्स' को उन्होंने हिंदी पट्टी के पाठकों तक पहुंचाते हुए लखनऊ, पटना एवं जयपुर संस्करण प्रकाशित किए। यही समय था जब राजेंद्र माथुर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वे एडिटर्स गिल्ड के प्रधान सचिव भी रहे। उनके लेखन को संजोने का प्रयास करते हुए उनके लेखों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं- गांधी जी की जेल यात्रा, राजेंद्र माथुर संचयन- दो खण्डों में, नब्ज पर हाथ, भारत एक अंतहीन यात्रा, सपनों में बनता देश, राम नाम से प्रजातंत्र।

राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता निरपेक्ष पत्रकारिता थी। पूर्वाग्रह ग्रसित पत्रकारिता से तो वे कोसों दूर थे। उनके निरपेक्ष लेखन का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने अपनी किताब 'सपनों में बनता देश' में लिखा है-

‘1985-86 के दौरान भारत की एक महत्वपूर्ण गुप्तचर एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी ने मुलाकात के दौरान सवाल किया- ‘आखिर माथुर जी हैं क्या? लेखन से कभी वे कांग्रेसी लगते हैं, कभी हिंदूवादी संघी, तो कभी समाजवादी। आप तो इंदौर से उन्हें जानते हैं क्या रही उनकी पृष्ठभूमि?‘ मुझे जासूस की इस उलझन पर बड़ी प्रसन्नता हुई। मैंने कहा, ‘माथुर साहब हर विचारधारा में डुबकी लगाकर बहुत सहजता से ऊपर आ जाते हैं। उन्हें बहाकर ले जाने की ताकत किसी दल अथवा विचारधारा में नहीं है। वह किसी एक के साथ कभी नहीं जुड़े। वह सच्चे अर्थों में राष्ट्रभक्त हैं, उनके लिए भारत राष्ट्र ही सर्वोपरि है। राष्ट्र के लिए वे कितने ही बड़े बलिदान एवं त्याग के पक्षधर हैं‘‘ (सपनों में बनता देश, आलोक मेहता)

राजेंद्र माथुर ने कभी किसी विचारधारा का अंध समर्थन नहीं किया। उनकी पत्रकारिता विशुद्ध राष्ट्रवाद को समर्पित थी। जड़ता की स्थिति में पहुंचाने वाली विचारधाराओं से उन्होंने सदैव दूरी बनाए रखी। पत्रकार के रूप में विचारधारा एवं पार्टीवाद से ऊपर उठकर वे पत्रकारिता के मिशन में लगे रहे। वर्तमान समय में जब पत्रकार विचारधाराओं के खेमे तलाश रहे हैं, ऐसे वक्त में राजेंद्र माथुर की याद आना स्वाभाविक है।

राजेंद्र माथुर ने बड़े ही जीवट से मूल्यपरक पत्रकारिता की थी, परंतु एक वक्त ऐसा भी आया जब वे बाजार के झंझावतों से निराश हुए। उन्होंने नवभारत टाइम्स को पूर्ण अखबार बनाने का स्वप्न देखा था। उनका यह स्वप्न तब तक रूप लेता रहा जब तक प्रबंधन अशोक जैन के हाथ था, किंतु जब प्रबंधन का जिम्मा समीर जैन पर आया तो यह स्वप्न बिखरने लगा था। समीर जैन नवभारत टाइम्स को ब्रांड बनाना चाहते थे जो बाजार से पूंजी खींचने में सक्षम हो। माथुर साहब ने अखबार को मुकम्मल बनाया था, लेकिन बाजार की अपेक्षाएं शायद कुछ और ही थीं। यही उनकी निराशा का कारण था। संभवतः पत्रकारिता के शीर्ष पुरूष की मृत्यु का कारण भी यही था। इस घटना के बारे में अनेको वर्षों तक उनके सहयोगी रहे रामबहादुर राय जी बताते हैं-

‘जब उन्हें लगा कि संपादक को संपादकीय के अलावा प्रबंधन के क्षेत्र का काम भी करना होगा, तो वह द्वंद में पड़ गए। इससे उन्हें शारीरिक कष्ट हुआ। अपने सपने को टूटते बिखरते हुए वे नहीं देख पाए। मृत्यु के कुछ दिनों पहले मेरी उनसे लंबी बातचीत हुई थी। एक दिन उन्हें फोन कर मैं उनके घर गया। माथुर साहब अकेले ही थे। वह मेरे लिए चाय बनाने किचन की ओर गए तो मैं भी गया। मैंने महसूस किया था कि वे परेशान हैं। मैंने पूछा क्या अड़चन है? उन्होंने कहा- देखो,  अशोक जैन नवभारत टाइम्स पढ़ते थे। उनको मैं बता सकता हूं कि अखबार कैसे बेहतर बनाया जाए। समीर जैन अखबार पढ़ता ही नहीं है। वह टाइम्स आफ इंडिया और इकानामिक टाइम्स को प्रियारिटी पर रखता है। उससे संवाद नहीं होता। उसका हुकुम मानने की स्थिति हो गई है। यही माथुर साहब का द्वंद था।’ (मीडिया विमर्श, मार्च 2012)

राजेंद्र माथुर ने मानों शब्दों की सेवा का ही प्रण लिया था। यही कारण था कि अनेकों बार अवसर प्राप्त होने पर भी वे सत्ता शिखर से दूर ही रहे। श्री माथुर के सहयोगी रहे विष्णु खरे ने सन 1991 में उनके अवसान के पश्चात  नवभारत टाइम्स में प्रकाशित लेख ‘बुझना एक प्रकाश-स्तंभ का‘ में लिखा था-

‘नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन जाने के बाद वे भविष्य में क्या बनेंगे, इसको लेकर उनके मित्रों में दिलचस्प अटकलबाजियां होती थीं और बात राष्ट्रसंघ एवं केन्द्रीय मंत्रिमंडल तक पहुंचती थी। लेकिन अपने अंतिम दिनों तक राजेंद्र माथुर ‘एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया‘ जैसी पेशेवर संस्था के काम में ही स्वयं को होमते रहे। राजेंद्र माथुर जैसे प्रत्येक व्यक्ति के चले जाने के पश्चात ऐसा कहा जाता है कि अब ऐसा शख्स दुबारा दिखाई नहीं देगा। लेकिन आज जब हिंदी तथा भारतीय पत्रकारिता पर निगाह डालते हैं और इस देश के बुद्धिजीवियों के नाम गिनने बैठते हैं तो राजेंद्र माथुर का स्थान लेता कोई दूसरा नजर नहीं आता। बड़े और चर्चित पत्रकार बहुतेरे हैं, लेकिन राजेंद्र माथुर जैसी ईमानदारी, प्रतिभा, जानकारी और लेखन किसी और में दिखाई नहीं दी।’ (पत्रकारिता के युग निर्माता,शिव अनुराग पटैरया)

पत्रकारिता में स्थान बनाने के बाद पत्रकार सत्ता के केंद्रों से नजदीक आने को लालायित हैं। सत्ता केन्द्र से नजदीकी को कैरियर का शिखर मानने की वर्तमान समय में परिपाटी बन गई है। ऐसे में सत्ता केन्द्रों से समानांतर दूरी रखने वाले राजेंद्र माथुर का पत्रकार जीवन अनुकरणीय है।

(साभार: अवधभूमि)

 

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जयंती विशेष: मीडिया के क्षेत्र में पं. दीनदयाल उपाध्याय का योगदान

पं. दीनदयाल उपाध्याय स्वयं बहुत बड़े पत्रकार और संचारक थे। अपनी विचारधारा को पुष्ट करने के लिए पत्रों का संपादन, प्रकाशन, स्तंभ लेखन, पुस्तक लेखन उनकी रुचि का विषय था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 25 September, 2021
Last Modified:
Saturday, 25 September, 2021
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प्रो. संजय द्विवेदी,  महानिदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान ।।

पं. दीनदयाल उपाध्याय स्वयं बहुत बड़े पत्रकार और संचारक थे। अपनी विचारधारा को पुष्ट करने के लिए पत्रों का संपादन, प्रकाशन, स्तंभ लेखन, पुस्तक लेखन उनकी रुचि का विषय था। उन्होंने लिखने के साथ-साथ बोलकर भी एक प्रभावी संचारक की भूमिका का निर्वहन किया है। उनकी स्मृति को रेखांकित करते हुए क्या हम विचार कर सकते हैं कि समाज जीवन के हर पक्ष में एकात्म मानवदर्शन किस तरह प्रभावी हो सकता है। भरोसा करना कठिन है कि श्री दीनदयाल उपाध्याय जैसे साधारण कद-काठी और सामान्य से दिखने वाले मनुष्य ने भारतीय राजनीति और समाज को एक ऐसा वैकल्पिक विचार और दर्शन प्रदान किया कि जिससे प्रेरणा लेकर हजारों युवाओं की एक ऐसी मालिका तैयार हुयी, जिसने इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय राजसत्ता में अपनी गहरी पैठ बना ली। क्या विचार सच में इतने ताकतवर होते हैं या यह सिर्फ समय का खेल है?

किसी भी देश की राजनीतिक निष्ठाएं एकाएक नहीं बदलतीं। उसे बदलने में सालों लगते हैं। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर नरेंद्र मोदी तक पहुंची यह राजनीतिक विचार यात्रा साधारण नहीं है। इसमें इस विचार को समर्पित लाखों-लाखों अनाम सहयोगियों को भुलाया तो जा सकता है किंतु उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

राजनीति के लिए नहीं, विचार के साधकः 

पं. दीनदयाल उपाध्याय राजनीति के लिए नहीं बने थे, उन्हें तो एक नए बने राजनीतिक दल जनसंघ में उसके प्रथम अध्यक्ष डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मांग पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री मा.स.गोलवलकर (गुरूजी) ने राजनीति में भेजा था। यह एक संयोग ही था कि डॉ. मुखर्जी और दीनदयाल जी दोनों की मृत्यु सहज नहीं रही और दोनों की मौत और हत्या के कारण आज भी रहस्य में हैं। दीनदयाल जी तो संघ के प्रचारक थे। आरएसएस की परिपाटी में प्रचारक एक गृहत्यागी सन्यासी सरीखा व्यक्ति होता है, जो समाज के संगठन के लिए अलग-अलग संगठनों के माध्यम से विविध क्षेत्रों में काम करता है। देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन बन चुके आरएसएस के लिए वे बेहद कठिन दिन थे। राजसत्ता उन्हें गांधी का हत्यारा कहकर लांछित करती थी, तो समाज में उनके लिए जगह धीरे-धीरे बन रही थी। शुद्ध सात्विक प्रेम और संपर्कों के आधार पर जैसा स्वाभाविक विस्तार संघ का होना था, वह हो रहा था, किंतु निरंतर राजनीतिक हमलों ने उसे मजबूर किया कि वह एक राजनीतिक शक्ति के रूप में भी सामने आए। खासकर संघ पर प्रतिबंध के दौर में तो उसके पक्ष में दो बातें कहने वाले लोग भी संसद और विधानसभाओं में नहीं थे। यही पीड़ा भारतीय जनसंघ के गठन का आधार बनी। डॉ. मुखर्जी उसके वाहक बने और दीनदयाल जी के नाते उन्हें एक ऐसा महामंत्री मिला जिसने दल को न सिर्फ सांगठनिक आधार दिया बल्कि उसके वैचारिक अधिष्ठान को भी स्पष्ट करने का काम किया।

चुनावी सफलताओं के बिना बने राजनीति के दिशावाहकः

पं. दीनदयाल जी को गुरूजी ने जिस भी अपेक्षा से वहां भेजा वे उससे ज्यादा सफल रहे। अपने जीवन की प्रमाणिकता, कार्यकुशलता, सतत प्रवास, लेखन, संगठन कौशल और विचार के प्रति निरंतरता ने उन्हें जल्द ही संघ और जनसंघ के कार्यकर्ताओं का श्रद्धाभाजन बना दिया। बेहद साधारण परिवार और परिवेश से आए दीनदयालजी भारतीय राजनीति के मंच पर बिना बड़ी चमत्कारी सफलताओं के भी एक ऐसे नायक के रूप में स्थापित होते दिखे, जिसे आप आदर्श मान सकते हैं। उनके हिस्से चुनावी सफलताएं नहीं रहीं, एक चुनाव जो वे जौनपुर से लड़े वह भी हार गए, किंतु उनका सामाजिक कद बहुत बड़ा हो चुका था। उनकी बातें गौर से सुनी जाने लगी थीं। वे दिग्गज राजनेताओं की भीड़ में एक राष्ट्रऋषि सरीखे नजर आते थे। उदारता और सौजन्यता से लोगों के मनों में, संगठन कौशल से कार्यकर्ताओं के दिलों में जगह बना रहे थे तो वैचारिक विमर्श में हस्तक्षेप करते हुए देश के बौद्धिक जगत को वे आंदोलित-प्रभावित कर रहे थे। वामपंथी आंदोलन के मुखर बौद्धिक नेताओं की एक लंबी श्रृखंला, कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन से तपकर निकले तमाम नेताओं और समाजवादी आंदोलन के डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे प्रखर राजनीतिक चिंतकों के बीच अगर दीनदयाल उपाध्याय स्वीकृति पा रहे थे, तो यह साधारण घटना नहीं थी। यह बात बताती है गुरूजी का चयन कितना सही था। उनके साथ खड़ी हो रही सर्वश्री अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख, जेपी माथुर, सुंदर सिंह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे जैसे सैकड़ों कार्यकर्ताओं की पीढ़ी को याद करना होगा, जिनके आधार पर जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा परवान चढ़ी है। दीनदयाल जी इन सबके रोलमाडल थे। अपनी सादगी, सज्जनता, व्यक्तियों का निर्माण करने की उनकी शैली और उसके साथ वैचारिक स्पष्टता ने उन्हें बनाया और गढ़ा था।

भारतीय राजनीतिक विमर्श में सार्थक हस्तक्षेपः

एकात्म मानववाद के माध्यम से सर्वथा एक भारतीय विचार को प्रवर्तित कर उन्होंने हमारे राजनीतिक विमर्श को एक नया आकाश दिया। यह बहुत से प्रचलित राजनीतिक विचारों के समकक्ष एक भारतीय राजनीतिक दर्शन था, जिसे वे बौद्धिक विमर्श का हिस्सा बना रहे थे। अपने इस विचार को वे व्यापक आधार दे पाते इसके पूर्व उनकी हत्या ने तमाम सपनों पर पानी फेर दिया। जब वे अपना श्रेष्ठतम देने की ओर बढ़ रहे थे, तब हुयी उनकी हत्या ने पूरे देश को अवाक कर दिया। दीनदयाल जी ने अपने प्रलेखों और भाषणों में ‘एकात्म मानववाद’ शब्द पद का उपयोग किया है। भाजपा ने 1985 में इसे इसी नाम से स्वीकार किया, किंतु नानाजी देशमुख और संघ परिवार के बीच ‘एकात्म मानवदर्शन’ नामक शब्दपद स्वीकृति पा चुका है। यह एक सुखद संयोग ही है कि उनके द्वारा प्रवर्तित एकात्म मानवदर्शन की विचारयात्रा अपने पांच दशक पूर्ण कर चुकी है। यह उसकी स्वर्णजयंती का साल है। इसके साथ ही अगले साल दीनदयाल जी का शताब्दी वर्ष भी प्रारंभ होगा।

एकात्म मानवदर्शन के आधार पर कैसा मीडिया बनेगाः

ऐसे प्रसंग यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि आखिर एकात्म मानवदर्शन के आधार पर हमारी मीडिया का चेहरा बने तो वह कैसा होगा? एकात्म मानवदर्शन को लेकर समाज जीवन के विविध पक्षों में कैसे परिवर्तन होंगें, इस पर विद्वानों ने अलग-अलग विचार किया है। किंतु हमें यह जानना जरूरी है कि आज के सबसे प्रभावकारी माध्यम मीडिया में एकात्म भाव की उपस्थिति से क्या बदलाव आएंगें। एकात्म मानवदर्शन क्योंकि विभेद का दर्शन नहीं है, वह विषयों पर संपूर्णता में विचार करने वाला दर्शन है। एक ऐसी चिंतनधारा है जिसमें मनुष्यता के मूल्य और मनुष्य की मुक्ति संयुक्त है। दीनदयाल जी अपनी विचारधारा में मीडिया को अलग करके नहीं देखते। वे यही दृष्टि रखते किस तरह मीडिया समाज की एकता, उसकी बेहतरी और मनुष्यता की मुक्ति में सहायक हो। संवाद मनुष्य की आवश्यकता भी है और उसकी प्रेरणा भी। वह संवाद किए बिना रह नहीं सकता। उसका समूची सृष्टि से रिश्ता है और संवाद है, जिसे हम प्रकृति से संवाद की भी संज्ञा देते हैं। मनुष्य के लिए संवाद कैसा हो इस पर बहुत विचार हुआ है। सूचना की भी इसमें एक बड़ी भूमिका है। इस भूमिका का वास्तविक निर्वाह ही हमें मनुष्य बनाता है।

एक शायर शायद इसीलिए कहते हैं- “आदमी को मयस्सर नहीं इंसा होना।” यानि आदमी को इंसान या मनुष्य बनाने की यात्रा एक कठिन यात्रा है। कठिन संकल्प से ही व्यक्ति रूपांतरित होता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर व्यक्ति की सूचना का संचार कितना व्यापक हो। सवाल यह भी है कि क्या हर सूचना व्यक्ति के लिए जरूरी है। साथ ही ऐसा क्या किया जाए कि व्यक्ति को सूचना इस प्रकार दी जाए, जिससे उसके विकास में मदद मिले न कि वह भ्रमित हो।

मीडिया में लाइए शुभदृष्टिः

एकात्म मानवदर्शन के आधार बनने वाले मीडिया और सूचना की दुनिया में सबका हित निहित होना है। वह एकांगी मीडिया नहीं होगा, वह सूचना को जारी करने से पहले उसके प्रभाव का भी आकलन करेगा। मीडिया और शुभ दोनों विरोधी लगते हैं। पश्चिमी अवधारणा में खबर तभी बनेगी, जब कुछ अशोभन हो, चौंकानेवाला हो, दर्द का विस्तार करने वाला हो, तो इसमें शुभदृष्टि कहां है? एकात्म भाव से भरा मीडिया इसके विपरीत चलेगा। वह हर सूचना में शुभदृष्टि का विचार करेगा। सूचनाओं को विद्रूप करने, उसे खींचने के बजाए- वह शुभदृष्टि के चलते उसकी न्यूनतम नकारात्मकता का विचार करेगा।

जाहिर तौर पर यह मीडिया आज की मीडिया के लीक से अलग चलेगा। वह बाजार और व्यापार के लिए संवाद से सौदा नहीं करेगा। वह मनुष्यता और मनुष्य की मुक्ति को केंद्र में रखते हुए वही परोसेगा, जिससे समाज में जुड़ाव बढ़े और शुभदृष्टि का विचार हो। क्या ऐसा मीडिया संभव है? साथ ही यह सवाल भी है कि यदि समाज में शुभदृष्टि का विचार स्थापित हो जाता है तो क्या हमारा परंपरागत मीडिया अप्रासंगिक नहीं हो जाएगा?

सवाल यह भी मौजू है कि मीडिया में सकारात्मकता का प्रसार क्या मुख्यधारा के मीडिया को शक्ति दे सकता है? क्या विचारों और सुसंवाद पर आधारित ऐसे मीडिया की रचना संभव है जिसकी दृष्टि बाजारू न हो? आज दुनिया में 24 घंटे का कोलाहल करने वाला मीडिया उपलब्ध है, क्या इसका भी नियमन नहीं होना चाहिए कि आखिर चौबीस घंटें हमें मीडिया क्यों चाहिए? नकारात्मकता, बिजनेस मॉडल के आधार पर चलने वाला मीडिया आखिर किसकी जरूरत है? भारत में अभी मीडिया का बहुत व्याप न होने के बावजूद भी अब इसके कंटेट और इसकी जरूरतों पर बात शुरू हो गयी है। हमें यह विचार करने का समय आ गया है कि हमें सोचें कि आखिर हमें कितना और कैसा मीडिया चाहिए? हम कैसे इस मीडिया में वह एकात्म भाव भर सकते हैं जो हर मनुष्य में मौजूद है और नैसर्गिक है। मीडिया की परंपरागत संवाद शैली से अलग हमें इसे शुभदृष्टि की ओर ले जाने की जरूरत है।

मीडिया और समाज अलग-अलग नहीं चल सकतेः

जीवन मूल्यों की जितनी जरूरत मनुष्य को है, उतनी ही मीडिया को भी है। यह संभव नहीं है कि समाज तो मूल्यों के आधार पर चलने का आग्रही हो और उसका मीडिया, उसकी फिल्में, उसकी प्रदर्शन कलाएं, उसकी पत्रकारिता नकारात्मकता का प्रचार कर रही हों। समाज और मनुष्य को प्रभावित करने का सबसे प्रभावी माध्यम होने के नाते हम इन्हें ऐसे नहीं छोड़ सकते। इन्हें भी हमें अपने जीवन मूल्यों के साथ जोड़ना होगा, जो मनुष्यता और मानवता के विस्तार का ही रूप हैं। अगर हम ऐसा मीडिया खड़ा कर पाते हैं तो समाज के बहुत सारे संकट स्वयं दूर हो जाएंगें। फिर टीवी बहसों से निष्कर्ष निकलेगें, फिर फिल्में समाज में समरसता और ममता का भाव भरेंगीं, फिर खबरें डराने के बजाए जीने का हौसला देंगीं। फिर खबरों का संसार ज्यादा व्यापक होगा। वे जिंदगी के हर पक्ष का विचार करेंगीं। वे एकांगी नहीं होंगीं, पूर्ण होंगीं और शुभता के भाव से भरी-पूरी होंगीं। जाहिर है यहां किसी धार्मिक और आध्यात्मिक मीडिया की बात नहीं हो रही है। सिर्फ उस दृष्टि की बात हो रही है जो एकात्म मानवदर्शन हमें देता है। वह है सबको साथ लेकर चलने, सबका विकास करने और सबसे कमजोर का सबसे पहले विचार करने की बात है।

जहां दुनिया को बनाने वाले सारे अववय एक दूसरे से जुड़े हैं। जहां सब मिलकर संयुक्त होते हैं और वसुधा को परिवार समझने की दृष्टि देते हैं। दीनदयाल जी की स्मृतियां और उनके द्वारा प्रतिपादित विचारदर्शन एक सपना भी है तो भी इस जमीं को सुंदर बनाने की आकांक्षा से लबरेज है। उसकी अखंड मंडलाकार रचना का विचार करें तो मनुष्यता खुद अपने उत्कर्ष पर स्थापित होती हुयी दिखती है। इसके बाद उसका समाज और फिल्में, उसका समाज और उसका मीडया, उसका समाज और उसके मूल्य, उसका राह और उसका मन सब एक हो जाते हैं। एकात्म सृष्टि से, एकात्म व्यक्ति से, एकात्म परिवेश से जब हम हो जाते हैं तो प्रश्नों के बजाए सिर्फ उत्तर नजर आते हैं। समस्याओं के बजाए समाधान नजर आते हैं। संकटों के बजाए उत्थान नजर आने लगता है। दुनिया एकात्म मानवदर्शन की राह पर आ रही है, अपने भौतिक उत्थान के साथ आध्यात्मिकता को संयुक्त करने के लिए वह आगे बढ़ चुकी है। यह होगा और जल्दी होगा, हम चाहें तो भी होगा, नहीं चाहे तो भी होगा। क्या हम घरती पर स्वर्ग उतारने के सपने को अपनी ही जिंदगी में सच होते देखना चाहते हैं, तो आइए इस विचार दर्शन को पढ़कर, जीवन में उतारकर देखते हैं। यह हमें इसलिए करना है क्योंकि हमारा जन्म भारत की भूमि पर हुआ है और जिसके पास पीड़ित मानवता को राह दिखाने का स्वाभाविक दायित्व सदियों से आता रहा है। एक बार फिर यह दायित्व क्या हम नहीं निभाएंगें?

 

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एसपी की मौत के बारे में मुद्राराक्षस ने बताया था ये राज

एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह को शायद पत्रकारों की नई पीढ़ी नहीं जानती हो लेकिन मुझे गर्व है कि...

Last Modified:
Sunday, 27 June, 2021
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कुमार पंकज, वरिष्ठ पत्रकार ।।

एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह को शायद पत्रकारों की नई पीढ़ी नहीं जानती हो लेकिन मुझे गर्व है कि मैं एसपी के गृह जनपद गाजीपुर के जिले का हूं। भले ही उनकी शिक्षा पश्चिम बंगाल में हुई हो लेकिन गाजीपुर की धरती से भी उनका जुड़ाव बराबर बना रहा। इसे महज संयोग ही कहेंगे कि जब मेरी रुचि पत्रकारिता के क्षेत्र में हुई तो सबसे पहले मुझे एसपी सिंह के ही बारे में पता चला कि वे गाजीपुर के रहने वाले हैं।

एसपी का जो मूल गांव गाजीपुर जिले के करीमुद्दीनपुर के पास पातेपुर था। उस इलाके में मेरे चचेरे भाई संग्रह अमीन के पद पर कार्यरत थे। जैसे ही मेरी रुचि के बारे में उनको पता चला तो उन्होंने तुरंत कहा कि अरे जानते हो एसपी सिंह को, मैंने कहा, ‘हां नाम सुना है’, तो कहने लगे कि अरे मेरे इलाके में ही उनका गांव है। तो मैंने तपाक से कहा, ‘तब तो गांव आते होंगे उनसे मुझे मिलना है।’ उस समय मैं इंटरमीडिएट की पढ़ाई गाजीपुर से कर रहा था और स्‍थानीय अखबारों में कुछ-कुछ लिखता रहता था। उन्होंने सहर्ष कहा कि हां मैं पता करुंगा कि वे कब आने वाले हैं। मेरी उनके बारे में उत्सुकता और बढ़ गई। गाजीपुर के कई पत्रकारों से जो उनके बारे में जानते थे पूछने लगा। कई लोगों ने बताया कि वे बहुत बड़े पत्रकार हैं। अब गाजीपुर कम आते हैं लेकिन दिल्ली जाना तो जरूर मिलना।

उस समय दैनिक आज से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार जो कि बलिया के मूल निवासी थे उनका नाम याद नहीं है संयोगवश उनसे मिलना हुआ तब उन्होंने कहा कि मैं बहुत अच्छी तरह से उनको जानता हूं और मेरा नाम लेकर मिल सकते हो उन्होंने उनका नंबर भी मुझे उपलब्‍ध कराया। बात 1995 की है जब मेरे चचेरे भाई ने बताया कि एसपी सिंह गाजीपुर आने वाले हैं उनके परिवार में कोई शादी है तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सोचा कि अबकी बार तो मुलाकात होगी ही। लेकिन शायद ऐन वक्त पर उनका आने का कार्यक्रम टल गया। फिर भी उनसे मिलने की उम्मीद मैंने बरकरार रखी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान गांधी भवन से जुड़ने का मौका मिला जहां पत्रकारिता की कार्यशाला में देश के तमाम दिग्गज पत्रकारों प्रभाष जोशी, अच्युतानंदन मिश्र, विभांशु दिव्याल सहित कई लोगों से मिलने का अवसर मिला। गांधी भवन के आयोजकों से भी इस बात की चर्चा हुई कि एसपी सिंह को बुलाया जाए। तब तक एसपी सिंह टीवी की दुनिया के लिए एक ब्रैंड बन गए थे। ‘आजतक’ की चर्चा हर जगह होने लगी थी। भले ही वह आधे घंटे का बुलेटिन था लेकिन हम जैसे युवाओं के लिए वह उत्सुकता वाला कार्यक्रम बन गया था कि उस आधे घंटे में क्या-क्या दिखाते हैं। उस समय टीवी के सेट कम ही देखने को मिलते थे। चूंकि हम लोग छात्र थे तो वैसे भी टीवी उपलब्‍ध नहीं था। फिर भी जब मौका मिलता था तो उनका कार्यक्रम जरूर देखते थे।

बात फरवरी 1998  की है उस समय एसपी इस दुनिया से विदा हो चुके थे। गांधी भवन में पत्रकारिता पर एक और कार्यशाला का आयोजन हुआ जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार मुद्रा राक्षस जी से मिलने का मौका मिला। उन्होंने कार्यशाला के दौरान एसपी की पत्रकारिता का उल्लेख किया था। इसलिए मेरी दिलचस्पी उनसे मिलने को लेकर और बढ़ गई। कार्यशाला के बाद मैं उनसे मिला और पूछने लगा तब मुद्रा जी से मैंने कहा कि मैं भी गाजीपुर का हूं। दुर्भाग्यवश उनसे नहीं मिल पाया लेकिन मैं उनके बारे में जानना चाहता हूं। कम उम्र में ही उनका देहान्त हो गया लेकिन उन्होंने अपने काम के बल पर पत्रकारिता जगत में अपनी अलग मुकाम बना ली। तब मुद्रा राक्षस ने बताया कि एसपी एक ब्रैंड थे और उस ब्रैंड को भी उनकी मौत के बाद भी भुनाया गया।

 मैंने पूछा वो कैसे तो कहने लगे कि उनकी मौत कई दिन पहले होने के बावजूद यह नहीं बताया गया कि एसपी की मौत हो गई है। मैने पूछा क्यों? तब उनका जवाब था कि जिस कार्यक्रम को वे प्रस्तुत करते थे, उसको जितना विज्ञापन मिला था वो एसपी के नाम पर मिला ‌था अगर यह पता चल जाता कि एसपी की मौत हो गई तो विज्ञापन कंपनिया विज्ञापन रोक देती, क्योंकि उस कार्यक्रम को लोग इसलिए देखते थे क्योंकि उसे एसपी प्रस्तुत करते थे। मुद्रा जी ने मीडिया के बाजारीकरण पर बहुत बातें बताई। जो अक्षरशः सच साबित हो रही हैं। बहरहाल आज एसपी की जगह कोई और नहीं ले सका और न कोई उनकी तरह ब्रैंड बन सका। एसपी को शत-शत नमन।

(यहां व्यक्त विचार लेखक के निजी है)

 

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अतुल माहेश्वरी: विशाल व्यक्तित्व को नवीं पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि

आज अतुल माहेश्वरी की नवीं पुण्यतिथि है। आज ही के दिन, साल 2011 को वह हम सबको अचानक छोड़कर चले गए थे। यह आलेख उनकी यादों को समर्पित करते हुए, 2011 में लिखा गया था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 03 January, 2019
Last Modified:
Thursday, 03 January, 2019
Samachar4media

आज अतुल माहेश्वरी की नवीं पुण्यतिथि है। आज ही के दिन, साल 2011 को वह हम सबको अचानक छोड़कर चले गए थे। यह आलेख उनकी यादों को समर्पित करते हुए, 2011 में लिखा गया था। उनकी याद में  2011 में अनुराग बत्रा, चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया समूह द्वारा लिखा गया यह संस्मरण आपके साथ शेयर कर रहे हैं...

अतुल माहेश्वरी को हिंदी मीडिया में एक भलामानुष ही नहीं, एक ऐसे उद्योगपति के तौर पर जाना जाता रहा, जो हर किसी के सुख-दु:ख में समान तौर पर भागीदार रहा करते थे। वह अपने सहकर्मियों के साथ हमेशा इस तरह से पेश आते थे, जैसे वह परिवार का सदस्य हों। हर किसी के बारे में जानकारी लेना और उसकी समस्याओं को अपने स्तर पर निपटाना उनकी बहुत सारी खूबियों में शामिल था। आज उन्हें याद करते हुए आंखें, एक बार फिर से नम हो रही हैं। जब हम किसी को खो देते हैं, तभी हमें यह महसूस होता है कि उसकी उपस्थिति हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण थी।

मैंने, प्रार्थना सभा के विज्ञापनों में और प्रार्थना सभा की मीटिंग में अतुल जी के चित्र को देखा और मैं अभी तक, विश्वास नहीं कर पा रहा हूं कि वह अब हमारे बीच नहीं रहे। जी.बी.शॉ ने एक बार कहा था, “भद्र पुरुष वह है जो विश्व को बहुत कुछ देकर जाता है और बदले में थोड़ा-सा लेता है।” अतुल जी के बारे में शायद यह सच था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं यह सब लिखूंगा और कम से कम नए वर्ष के आगमन पर तो ऐसा बिल्कुल नहीं सोचा था। मैंने कभी नहीं सोचा कि नया साल मेरे लिए और संपूर्ण मीडिया इंडस्ट्री के लिए इतनी बड़ी क्षति लेकर आएगा। इस सच को महसूस करते हुए, काफी दर्द और पीड़ा का अनुभव हो रहा है कि अतुल जी (जैसा कि मैं उन्हें कहा करता था) जो मेरे बड़े भाई, मित्र, मीडिया के बड़े लीडर और उससे बढ़कर एक दयालु इंसान थे, अब हमारे बीच नहीं रहे।

कभी-कभी हमारे नजदीकी और प्यारे लोग जिनकी हम बहुत इज्जत करते हैं, हमें छोड़कर चले जाते हैं और हम, अपने जीवन के कर्म करने को अकेले रह जाते हैं। सच को स्वीकारना बहुत दुखद है। जिंदगी यूं ही चलती रहती है। मैं, अतुल जी से मेरठ में लगभग 10 साल पहले ‘अमर उजाला’ के पुराने कार्यालय में मिला था। उन दिनों बी.के सिन्हा ‘अमर उजाला’ के ऐडवरटाइजिंग और मार्केटिंग विभाग के प्रमुख हुआ करते थे। ‘अमर उजाला’ उन दिनों तेजी से विकास कर रहा था और सफलता की ओर अग्रसर था। मुझे, पल्लव मोइत्रा और साजल मुखर्जी ने अतुल जी से मिलवाया था। मेरे मन में उस मुलाकात की यादें अभी भी ताजा हैं। उस मुलाकात के बाद, मैं लगभग नियमित रूप से, हर महीने उनसे मिला करता था और मैं कह सकता हूं कि इतना कुछ हासिल करने के बाद भी उन्हें इसका तनिक भी गुमान नहीं था।

अतुल जी ने एक बार मुझसे कहा था कि उनका संघर्ष उस दिन से शुरू हुआ जब श्री डोरी लाल अग्रवाल के बड़े बेटे अनिल अग्रवाल जो उन दिनों ‘अमर उजाला’ को चला रहे थे की अचानक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई, तब उनके अंतिम संस्कार में शामिल लोगों ने चर्चा शुरू कर दी कि अब यह समाचार पत्र खत्म हो जाएगा। अतुल जी तत्काल अपने ऑफिस इस संकल्प के साथ दौड़े गए कि वे इस व्यवसाय को आगे बढ़ाएंगे और हम सभी जानते हैं कि किस तरह से अतुल जी के नेतृत्व में ‘अमर उजाला’ आगे बढ़ा। वह एक ऐसे पुत्र थे जिन्होंने अपने पिता के सपनों को साकार किया। इन वर्षों में, हमने उनका कई बार इंटरव्यू किया। उनके विनम्र और शांत व्यक्तित्व के पीछे उद्देश्य की स्पष्टता थी। व्यवसाय के बारे में उनका नजरिया स्पष्ट था।

‘अमर उजाला’ शुरुआत में चार पेज का समाचार पत्र था और इसका प्रकाशन आगरा से शुरू हुआ था। यह आज देश का प्रमुख दैनिक समाचार पत्र है। ‘अमर उजाला’ के विस्तार में काफी उतार-चढ़ाव आए। अतुल जी के बारे में उल्लेखनीय है कि मीडिया के कारोबार में होते हुए उन्होंने कभी अपना विनम्र रवैया नहीं छोड़ा और मूल्यों के साथ जुड़े रहे। मैं, उनके शांत आचरण को काफी पसंद करता था। कोई उनके पास मदद के लिए संपर्क करने आता था तो वह उसके प्रति चिंतित और संवेदनशील होते थे और उसका सम्मान करते थे। अतुल जी जैसे व्यक्ति के लिए सफलता का अर्थ सिर्फ पैसा नहीं था। सफलता का मतलब मूल्य और नैतिकता से था। और जब समाज ऐसे व्यक्ति को खो देता है तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का नुकसान नहीं है। यह एक नेतृत्वकर्ता का अवसान है जो कई की जिंदगी और करियर को बना सकता था। अतुल जी के जाने से न सिर्फ बड़े भाई या प्रिय मित्र का अवसान हुआ है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का निधन हुआ है जिनके पास स्पष्ट दृष्टिकोण और क्षमता थी जो न्यूज इंडस्ट्री को एक आकार देने में सक्षम थे। आने वाले वर्षों में, वह न्यूज इंडस्ट्री में एक बड़े बदलाव के वाहक थे।

मुझे, अब भी याद है कि अतुल जी के बड़े भाई के निधन पर दो साल पहले जब मैं उनसे मिला था तो उन्होंने चुटकी ली थी कि हमारे यहां तो लोग जल्दी चले जाते हैं। उस समय, मैंने नहीं सोचा था कि मैं इस अद्भुत व्यक्ति को इतनी जल्दी खो दूंगा। मैंने अतुल जी और उनके पुराने सहयोगियों से जिनके साथ उनका भावनात्मक संबंध था, साझा बातचीत की है। राजीव सिंह जिन्होंने ‘अमर उजाला’ में सेल्स और मार्केटिंग के प्रमुख के रूप में कार्य किया था, अतुल जी के साथ बिताए पलों के बारे में प्यार से बात करते हैं। ‘अमर उजाला’ के अनुभवी संपादक और पत्रकार शशि शेखर जो सात वर्षों तक ‘अमर उजाला’ के संपादक रह चुके हैं और अब ‘हिन्दुस्तान’ के एडिटर-इन-चीफ हैं, बड़ी दुविधा में थे जब उन्होंने ‘अमर उजाला’ से ‘हिन्दुस्तान’ में जाने का निर्णय किया क्योंकि अतुल जी के साथ उनका आत्मीय व्यवहार था। अतुल जी के अचानक निधन से उन्हें सदमा पहुंचा। शशि जी ने शोक व्यक्त करते हुए कहा, “मेरा तो फ्यूज उड़ गया है।”

वरुण कोहली जो ‘अमर उजाला’ में कई वर्षों तक ऐड सेल्स के प्रमुख के तौर पर थे, अतुल जी को बॉस की अपेक्षा पिता-तुल्य मानते थे। गोपीनाथ मेनन, पी. वी नारायणमूर्ति सभी अतुल जी को विनम्र व्यक्तित्व का धनी मानते थे। सुनील मुतरेजा जो ‘अमर उजाला’ के सेल्स और मार्केटिंग प्रेसिडेंट रहे हैं मेरे साथ निजी बातचीत में अतुल जी के नेतृत्व की सराहना करते थे और कहा करते थे कि वह ऐसे बॉस हैं जिनके साथ डील करने में आसानी होती है। अतुल जी प्रगतिशील और आगे की सोच रखने वाले लोगों में से थे। अतुल जी ने मेरे सलाह देने के बाद एक शैक्षिक उद्यम में भागीदारी की और जब उम्मीद के अनुसार, संयुक्त उद्यम नहीं चला तो अतुल जी ने इसे एक दार्शनिक की तरह स्वीकार किया और कहा कि अब शिक्षा, बौद्धिक मॉडल बिजनेस न होकर रियल एस्टेट बिजनेस मॉडल हो गया है।

मैं एक बार भाग्य से अतुल जी के साथ सुभाष चंद्रा से मिला और कह सकता हूं कि इस मीटिंग से मुझे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। दो उद्यमियों से मिलना, मीडिया महारथियों की बातचीत और अंतर्दृष्टि साझा करना जिंदगी का एक अद्वितीय क्षण था। अतुल जी के साथ हमने उनकी आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं को खो दिया है। ‘अमर उजाला’ विकास के दौर से गुजर रहा था और संस्थान बड़ा एवं बेहतर हो रहा था। मैं अतुल जी के परिवार में उनके पुत्र तन्मय, पत्नी नेहाजी और पुत्री अदिति से मिला हूं। उनके भाई राजुल माहेश्वरी अतुल जी की छाया में कार्य करते थे और उनकी दूरदृष्टि को कार्यान्वित करते थे। उन्हें अपने भाई से काफी कुछ सीखने का मौका मिला जो उनकी विरासत को आगे ले जाने में सहायक होगा। मैंने उनके पुत्र तन्मय को काफी करीब से जाना और देखा है। तन्मय, ‘फुलक्रम माइंडशेयर’ में कार्य करते थे। फेसबुक पर उनका पसंदीदा बोल “ग्रेटेस्ट जर्नी ऑफ द लाइफ इज़ द वन विच ब्रिंग्स यू बैक टू द होम” (जीवन की सबसे बड़ी यात्रा वह है जो तुम्हें अपने घर वापस लाती है) है।

भगवान से मेरी प्रार्थना है कि वे राजुल और तन्मय को शक्ति प्रदान करें जिससे कि वे अपने पिता के सपनों को साकार करें और संस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएं। 

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ये हिंदी का विकास नहीं तो क्या है...

हिंदी दिवस पर हम समीक्षा करते हैं कि हिंदी का कितना विकास हुआ...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 14 September, 2018
Last Modified:
Friday, 14 September, 2018
hindi diwas

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

हिंदी दिवस पर हम समीक्षा करते हैं कि हिंदी का कितना विकास हुआ। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिले करीब 68 साल हो गए। इतने सालों से इसके विकास के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। वास्तविकता क्या है। क्या ये सिर्फ गोष्ठी-संगोष्ठी तक तो सिमट कर नहीं रह गई है। ये सवाल जब वरिष्ठ पत्रकार व व्यंग्यकार आलोक पुराणिक से किया गया तो उनका जवाब था कि ये तो आपका देखने का नजरिया है। हिंदी का विकास बिल्कुल हुआ है।

आलोक पुराणिक का मानना है कि हिंदी का लगातार विस्तार हुआ है। हिंदी की पहुंच अब देश के अलावा विदेशों तक हो गई है। विश्व के कई देशों में हिंदी की पढ़ाई शुरू हो गई है। चीन और दक्षिण कोरिया के विश्वविद्यालयों में भी हिंदी की पढ़ाई होती है। देश में हिंदी के अखबारों की संख्या और अंक लगातार बढ़ रहे हैं। हिंदी अखबारों के पाठकों की संख्या बढ़ रही है। हिंदी भाषा में कई चैनलों का प्रसारण हो रहा है। आज देश में विदेशी कंपनियां आ रही हैं। वे अपने कर्मचारियों को हिंदी सिखा रही है। विदेशी कंपनियों में भी कर्मचारी हिंदी में बोल रहे हैं। हिंदी का बाजार बड़ा है इसलिए गूगल और माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनियां भी हिंदी में अपने काम का विस्तार करने जा रही है। ये हिंदी का विकास नहीं तो क्या है।

अगर हिंदी का विकास हो रहा है तो आज हम क्यों चाहते हैं कि हमारा बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़े। जब आलोक पुराणिक जी से ये पूछा गया तो उनका कहना था कि अंग्रेजी ग्लोबल भाषा है। वैश्विकरण के बाद पूरी दुनिया एक हो गई है। ऐसे में हर व्यक्ति चाहता है कि उसका बच्चा हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी सीखे ताकि उसका करियर ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित और व्यापक हो। यही कारण है कि हम अंग्रेजी पर जोर देते हैं। हिंदी के बारे में लोगों का देखने का अपना-अपना नजरिया है।


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जाने-माने न्यूज एंकर अनुराग मुस्कान ने अपने पापा को कुछ यूं किया याद...

'फादर्स डे' मौके पर जाने-माने न्यूज एंकर अनुराग मुस्कान ने फेसबुक पर अपने ब्लॉग से एक संस्मरण साझा किया है, जिसे उन्होंने अपने पिता जी की याद में साल 2010 में लिखा था---

Last Modified:
Sunday, 17 June, 2018
Samachar4media

'फादर्स डे' मौके पर जाने-माने न्यूज एंकर अनुराग मुस्कान ने बीते वर्ष फेसबुक पर अपने ब्लॉग से एक संस्मरण साझा किया था, जिसे उन्होंने अपने पिता जी की याद में साल 2010 में लिखा था। उनके इस संस्मरण को आप यहां पढ़ सकते हैं: ME N SIS copy 

इमोश्नल अत्याचार....!

अभी-अभी एक हवाईजहाज सिर के ऊपर से उड़ कर निकला है। साल भर पहले जब पहली बार सचमुच हवाईजहाज में बैठा तो एहसास हुआ कि बचपन में इस हवाईजहाज ने भी कितना इमोशनल अत्याचार किया है हम पर। मन में, पापा से मिलने की कितनी बड़ी उम्मीद जगाई थी इसने, जो आगे चलकर जीवन की उलझनों को सुलझाने में पता नहीं कब और कहां गुम हो गई।

बचपन में स्कूल जाते हुए नन्हीं बहन पूछा करती थी कि ‘भईया, पापा हमारे पास नहीं आ सकते तो क्या हम भी पापा के पास नहीं जा सकते?’

- ‘पापा, भगवान जी के पास चले गए हैं पागल।’

- ‘तो क्या भगवान जी के पास अपन नहीं जा सकते, बोलेंगे हम पापा से मिलने आए हैं, हमारे पापा यहां आ गए हैं। प्लीज मिलवा दीजिए हमारे पापा से।’ वो मासूमियत से पूछती।

- ‘जा सकते हैं शायद, प्लेन में बैठकर जा सकते हैं, लेकिन उसके लिए बहुत सारे पैसे लगते हैं। एक दिन जाएंगे, जरूर।’

- ‘नहीं.... अभी चल ना मुझे मिलना है पापा से।’

और नन्हीं बहना आसमान में उड़ते एरोप्लेन को देखकर रोने लगती। स्कूल पास आते ही मैं उसे टीचर का डर दिला कर चुप करा देता। वो आंसू पोछकर चुप तो हो जाती थी लेकिन उसकी उसकी सुबकियां क्लॉस में दाखिल होने तक जारी रहतीं। ऐसा लगभग रोज ही होता था। क्योंकि स्कूल के पास ही खेरिया हवाईअड्डा था और थोड़े-थोड़े अंतराल पर वहां से हवाईजहाज होकर गुजरते थे। किसी-किसी रोज तो बहन पापा को याद करके रोते-रोते ‘मम्मी के पास जाना है’ की जिद पकड़ बैठती थी। फिर उसे उस रिक्शे में ही वापस भेजना पड़ता था। मैं तब चौथी क्लास में था और बहन पहली क्लास में। हम दोनों भाई-बहन एक साथ साईकिल रिक्शा में स्कूल जाते थे। स्कूल, आगरा का केन्द्रीय विद्यालय न.-1 घर से कोई आठ किलोमीटर दूर।

पिता के देहांत के बाद हम नागपुर से आगरा चले आए थे। हालत ही कुछ ऐसे बने कि नाना-नानी मां को उसके ससुराल वालों के साथ नहीं छोड़ सकते थे। उन्होने कभी खुद भी इच्छा जाहिर नहीं की मां को अपने साथ ले जाने की। वजह थी पापा की नौकरी। पापा के बाद किसे मिले उनकी नौकरी। दादी चाहती थीं कि नौकरी मेरे बेरोजगार चाचा को मिले। नाना-नानी चाहते थे कि नौकरी मेरी मां को मिले, जिससे हम भाई-बहन की परवरिश ठीक से हो जाए। हालांकि मां ने पापा के जीते-जी कभी घर से बाहर निकल कर नौकरी के बारे में सोचा तक नहीं था। हालात सब कुछ करवा देते हैं, नौकरी मां को मिली। और मां के ससुराल वाले इस बात से नाराज होकर इस हाल में उसे और अकेला कर गए।

पिता की मृत्यु के बाद मां की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। 28 साल की थी मेरी मां जब पापा इस दुनिया से गए। मेरी बहन को तो पापा का चेहरा तक याद नहीं। उनके साथ बिताया एक पल भी याद नहीं। मेरी यादों में फिर भी पापा के लाड़-प्यार के कुछ धुंधलके जरूर आज भी उमड़ते घुमड़ते हैं। हार्ट अटैक आया था पापा को। रात को सोते समय पलंग से गिर पड़े थे। मां की गोद में आखिरी सांस ली। मां ने पापा के चेहरे पर पानी के छींटे मारे, हाथेलियों और तलवों को रगड़ा, लेकिन पापा फिर नहीं जागे। मुझे नहीं पता था पापा अब नहीं लौटेंगे। बहन को तो इतना भी नहीं पता था। हम दोंनो बस मां को देखकर रोए जा रहे थे। मुझे लगा पापा बीमारी में बेहोश हो गए हैं, हॉस्पिटल से ठीक होकर आ जाएंगे। लेकिन वो ना ठीक हुए ना वापस आए।

उनके दाह संस्कार का वो पल मेरे बालमन के लिए सबसे ज्यादा पीड़ा दायक था। पापा मेरे सामने थे। मौन। चिरनिद्रा में। वो जाग जाते तो सब ठीक हो जाता। लेकिन....। मैंने रोते हुए पता नहीं किससे कहा था कि पापा के ऊपर इतनी भारी लकड़ियां मत रखिए प्लीज! पापा को बहुत चोट लग रही होगी, दर्द हो रहा होगा। मुझे वहां से कुछ देर के लिए हटा दिया गया। फिर कुछ देर बाद पापा को मुखाग्नि देते हुए समझ नहीं पा रहा था कि पापा हमें छोड़कर क्यूं चले गए, जबकि टॉयलेट और ऑफिस जाने के सिवा पापा कभी हमें अकेले नहीं छोड़ते थे।

आजतक नहीं समझ पाया हूं कि पापा क्यूं चले गए। आज भी पग-पग पर पापा की जरूरत महसूस होती है। उनकी कमी खलती है। उम्र और समझ के साथ मेरी और बहन की वो उम्मीद भी कब की टूट चुकी है कि पापा से मिलने हवाईजहाज से जाना मुमकिन है।

कुछ साल पहले जब पहली बार हवाईजहाज में बैठा तो सोचा कि इस हवाईजहाज ने भी कितना इमोश्नल अत्याचार किया है हम भाई-बहन पर। और मुस्कुरा दिया। मैं जमीन से कई हजार फीट की ऊंचाई पर था, लेकिन पापा से फिर भी बहुत दूर.....। आज भी जब कोई हवाईजहाज उड़ता देखता हूं तो बचपन की उन यादों का मेला लग जाता है कुछ देर के लिए।

(साभार: अनुराग मुस्कान की फेसबुक वॉल से)


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