राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं। मालवा के साधारण परिवार में जन्मे राजेंद्र बाबू...
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं। मालवा के साधारण परिवार में जन्में राजेंद्र बाबू ने हिंदी पत्रकारिता जगत में असाधारण प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनका जन्म 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा धार, मंदसौर एवं उज्जैन में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे इंदौर आए जहां उन्होंने अपने पत्रकार जीवन के महत्वपूर्ण समय को जिया।
राजेंद्र माथुर उन बिरले लोगों में से थे जो उद्देश्य के लिए जीते हैं। पत्रकार जीवन की शुरुआत उन्होंने स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही कर दी थी, जिस समय हिंदी पत्रकारिता मुख्य धारा में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी, उसी समय राजेंद्र बाबू भी पत्रकारिता में अपना स्थान बनाने के लिए आए थे। पत्रकारिता जगत में उन्होंने अपना स्थान ही नहीं बनाया बल्कि हिंदी पत्रकारिता को भी मुख्य धारा में लाए। अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकार राजेंद्र माथुर चाहते तो अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे। लेकिन तब शायद भारत के अंतर्मन को समझने का उचित मौका न मिलता।
भारतीय भाषा में भारत के सरोकारों को समझने के लिए उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को अपने माध्यम के रूप में चुना। पत्रकारिता की दुनिया में उन्होंने 'नईदुनिया' दैनिक पत्र के माध्यम से दस्तक दी। नईदुनिया के संपादक राहुल बारपुते से उनकी मुलाकात शरद जोशी ने करवाई थी। बारपुते जी से अपनी पहली मुलाकात में उन्होंने पत्र के लिए कुछ लिखने की इच्छा जताई। राहुल जी ने उनकी लेखन प्रतिभा को जांचने-परखने के लिए उनसे उनके लिखे को देखने की बात कही। उसके बाद अगली मुलाकात में राजेंद्र माथुर अपने लेखों का बंडल लेकर ही बारपुते जी से मिले।
अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहन अध्ययन एवं जानकारी को देखकर राहुल जी बड़े प्रभावित हुए। उसके बाद समस्या थी कि राजेंद्र माथुर के लेखों को पत्र में किस स्थान पर समायोजित किया जाए। इसका समाधान भी राजेंद्र जी ने ही दिया। राहुल बारपुते जी का संपादकीय अग्रलेख प्रकाशित होता था, राजेंद्र जी ने अग्रलेख के बाद अनुलेख के रूप में लेख को प्रकाशित करने का सुझाव दिया। अग्रलेख के पश्चात अनुलेख लिखने का सिलसिला लंबे समय तक चला। सन 1955 में नई दुनिया की दुनिया में जुड़ने के बाद वह 27 वर्षों के लंबे अंतराल के दौरान वे नई दुनिया के महत्वपूर्ण सदस्य बने रहे।
राजेंद्र जी ने लगातार दस वर्षों तक अनुलेख लिखना जारी रखा। सन 1965 में बदलाव करते हुए उन्होंने पिछला सप्ताह नामक लेख लिखना प्रारंभ किया, जिसमें बीते सप्ताह के महत्वपूर्ण घटनाक्रम की जानकारी एवं विश्लेषण प्रकाशित होता था। सन 1969 में किसी मनुष्य ने चंद्रमा पर पहला कदम रखकर अप्रत्याशित कामयाबी पाई थी। मनुष्य के चंद्रमा तक के सफर पर नई दुनिया ने 16 पृष्ठों का परिशिष्ट प्रकाशित किया था। यह कार्य राजेंद्र माथुर के नेतृत्व में ही हुआ था। वे गुजराती कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे, 1969 में वे अध्यापकी छोड़ पूरी तन्मयता के साथ नईदुनिया की दुनिया में रम गए।
'पिछला सप्ताह' स्तंभ लिखना उन्होंने आपातकाल तक जारी रखा। आपातकाल के दौरान सरकार ने जब प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। तब राजेंद्र जी ने ‘शीर्षक’ के नाम से सरकारी प्रतिक्रिया की परवाह किए बिना धारदार आलेख लिखे। सन 1980 से उन्होंने कल ‘आज और कल’ शीर्षक से स्तंभ लिखना शुरू किया। 14 जून, 1980 को वे प्रेस आयोग के सदस्य चुने गए। जिसके बाद सन 1981 में उन्होंने नई दुनिया के प्रधान संपादक के रूप में पदभार संभाला। प्रेस आयोग का सदस्य बनने के पश्चात वे टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन के संपर्क में आए।
गिरिलाल जैन ने राजेंद्र माथुर को दिल्ली आने का सुझाव दिया। उनका मानना था कि राजेंद्र जी जैसे मेधावान पत्रकार को दिल्ली में रहकर पत्रकारिता करनी चाहिए। लंबे अरसे तक सोच-विचार करने के पश्चात राजेंद्र जी ने दिल्ली का रुख किया। सन 1982 में नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन कर वे दिल्ली आए। नवभारत टाइम्स की ओर से अमेरिकी सरकार के आमंत्रण पर उन्हें अमेरिका जाने का अवसर प्राप्त हुआ। अमेरिका में गए हिंदी पत्रकार ने अपनी अंग्रेजी की विद्वता से परिचय कराया। उनकी अंग्रेजी सुनकर अंग्रेज पत्रकार भी हतप्रभ रह गए। ऐसे समय में जब अंग्रेजी प्रतिष्ठा का सवाल हो हिंदी पत्रकारिता में योगदान देना प्रेरणादायी है।
दिल्ली आने के पश्चात राजेंद्र माथुर ने 'नवभारत टाइम्स' को दिल्ली, मुंबई से निकालकर प्रादेशिक राजधानियों तक पहुंचाने का कार्य किया। 'नवभारत टाइम्स' को उन्होंने हिंदी पट्टी के पाठकों तक पहुंचाते हुए लखनऊ, पटना एवं जयपुर संस्करण प्रकाशित किए। यही समय था जब राजेंद्र माथुर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वे एडिटर्स गिल्ड के प्रधान सचिव भी रहे। उनके लेखन को संजोने का प्रयास करते हुए उनके लेखों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं- गांधी जी की जेल यात्रा, राजेंद्र माथुर संचयन- दो खण्डों में, नब्ज पर हाथ, भारत एक अंतहीन यात्रा, सपनों में बनता देश, राम नाम से प्रजातंत्र।
राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता निरपेक्ष पत्रकारिता थी। पूर्वाग्रह ग्रसित पत्रकारिता से तो वे कोसों दूर थे। उनके निरपेक्ष लेखन का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने अपनी किताब 'सपनों में बनता देश' में लिखा है-
‘1985-86 के दौरान भारत की एक महत्वपूर्ण गुप्तचर एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी ने मुलाकात के दौरान सवाल किया- ‘आखिर माथुर जी हैं क्या? लेखन से कभी वे कांग्रेसी लगते हैं, कभी हिंदूवादी संघी, तो कभी समाजवादी। आप तो इंदौर से उन्हें जानते हैं क्या रही उनकी पृष्ठभूमि?‘ मुझे जासूस की इस उलझन पर बड़ी प्रसन्नता हुई। मैंने कहा, ‘माथुर साहब हर विचारधारा में डुबकी लगाकर बहुत सहजता से ऊपर आ जाते हैं। उन्हें बहाकर ले जाने की ताकत किसी दल अथवा विचारधारा में नहीं है। वह किसी एक के साथ कभी नहीं जुड़े। वह सच्चे अर्थों में राष्ट्रभक्त हैं, उनके लिए भारत राष्ट्र ही सर्वोपरि है। राष्ट्र के लिए वे कितने ही बड़े बलिदान एवं त्याग के पक्षधर हैं‘‘ (सपनों में बनता देश, आलोक मेहता)
राजेंद्र माथुर ने कभी किसी विचारधारा का अंध समर्थन नहीं किया। उनकी पत्रकारिता विशुद्ध राष्ट्रवाद को समर्पित थी। जड़ता की स्थिति में पहुंचाने वाली विचारधाराओं से उन्होंने सदैव दूरी बनाए रखी। पत्रकार के रूप में विचारधारा एवं पार्टीवाद से ऊपर उठकर वे पत्रकारिता के मिशन में लगे रहे। वर्तमान समय में जब पत्रकार विचारधाराओं के खेमे तलाश रहे हैं, ऐसे वक्त में राजेंद्र माथुर की याद आना स्वाभाविक है।
राजेंद्र माथुर ने बड़े ही जीवट से मूल्यपरक पत्रकारिता की थी, परंतु एक वक्त ऐसा भी आया जब वे बाजार के झंझावतों से निराश हुए। उन्होंने नवभारत टाइम्स को पूर्ण अखबार बनाने का स्वप्न देखा था। उनका यह स्वप्न तब तक रूप लेता रहा जब तक प्रबंधन अशोक जैन के हाथ था, किंतु जब प्रबंधन का जिम्मा समीर जैन पर आया तो यह स्वप्न बिखरने लगा था। समीर जैन नवभारत टाइम्स को ब्रांड बनाना चाहते थे जो बाजार से पूंजी खींचने में सक्षम हो। माथुर साहब ने अखबार को मुकम्मल बनाया था, लेकिन बाजार की अपेक्षाएं शायद कुछ और ही थीं। यही उनकी निराशा का कारण था। संभवतः पत्रकारिता के शीर्ष पुरूष की मृत्यु का कारण भी यही था। इस घटना के बारे में अनेको वर्षों तक उनके सहयोगी रहे रामबहादुर राय जी बताते हैं-
‘जब उन्हें लगा कि संपादक को संपादकीय के अलावा प्रबंधन के क्षेत्र का काम भी करना होगा, तो वह द्वंद में पड़ गए। इससे उन्हें शारीरिक कष्ट हुआ। अपने सपने को टूटते बिखरते हुए वे नहीं देख पाए। मृत्यु के कुछ दिनों पहले मेरी उनसे लंबी बातचीत हुई थी। एक दिन उन्हें फोन कर मैं उनके घर गया। माथुर साहब अकेले ही थे। वह मेरे लिए चाय बनाने किचन की ओर गए तो मैं भी गया। मैंने महसूस किया था कि वे परेशान हैं। मैंने पूछा क्या अड़चन है? उन्होंने कहा- देखो, अशोक जैन नवभारत टाइम्स पढ़ते थे। उनको मैं बता सकता हूं कि अखबार कैसे बेहतर बनाया जाए। समीर जैन अखबार पढ़ता ही नहीं है। वह टाइम्स आफ इंडिया और इकानामिक टाइम्स को प्रियारिटी पर रखता है। उससे संवाद नहीं होता। उसका हुकुम मानने की स्थिति हो गई है। यही माथुर साहब का द्वंद था।’ (मीडिया विमर्श, मार्च 2012)
राजेंद्र माथुर ने मानों शब्दों की सेवा का ही प्रण लिया था। यही कारण था कि अनेकों बार अवसर प्राप्त होने पर भी वे सत्ता शिखर से दूर ही रहे। श्री माथुर के सहयोगी रहे विष्णु खरे ने सन 1991 में उनके अवसान के पश्चात नवभारत टाइम्स में प्रकाशित लेख ‘बुझना एक प्रकाश-स्तंभ का‘ में लिखा था-
‘नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन जाने के बाद वे भविष्य में क्या बनेंगे, इसको लेकर उनके मित्रों में दिलचस्प अटकलबाजियां होती थीं और बात राष्ट्रसंघ एवं केन्द्रीय मंत्रिमंडल तक पहुंचती थी। लेकिन अपने अंतिम दिनों तक राजेंद्र माथुर ‘एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया‘ जैसी पेशेवर संस्था के काम में ही स्वयं को होमते रहे। राजेंद्र माथुर जैसे प्रत्येक व्यक्ति के चले जाने के पश्चात ऐसा कहा जाता है कि अब ऐसा शख्स दुबारा दिखाई नहीं देगा। लेकिन आज जब हिंदी तथा भारतीय पत्रकारिता पर निगाह डालते हैं और इस देश के बुद्धिजीवियों के नाम गिनने बैठते हैं तो राजेंद्र माथुर का स्थान लेता कोई दूसरा नजर नहीं आता। बड़े और चर्चित पत्रकार बहुतेरे हैं, लेकिन राजेंद्र माथुर जैसी ईमानदारी, प्रतिभा, जानकारी और लेखन किसी और में दिखाई नहीं दी।’ (पत्रकारिता के युग निर्माता,शिव अनुराग पटैरया)
पत्रकारिता में स्थान बनाने के बाद पत्रकार सत्ता के केंद्रों से नजदीक आने को लालायित हैं। सत्ता केन्द्र से नजदीकी को कैरियर का शिखर मानने की वर्तमान समय में परिपाटी बन गई है। ऐसे में सत्ता केन्द्रों से समानांतर दूरी रखने वाले राजेंद्र माथुर का पत्रकार जीवन अनुकरणीय है।
(साभार: अवधभूमि)
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सुप्रीम कोर्ट ने भी 42 बार कहा है कि इवीएम को हैक नहीं किया जा सकता। पोलिंग अधिकारी ईवीएम सील करते हैं, तब सब पार्टी के एजेंट होते हैं। ऐसे में गलती नहीं हो सकती है।
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Samachar4media Bureau
चुनाव आयोग ने दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। एक प्रेस वार्ता में मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने ईवीएम को लेकर उठ रहे सवालों का खुलकर जवाब दिया। राजीव कुमार ने कहा कि ईवीएम को लेकर गलत नैरेटिव पेश किया जाता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने साफ तौर पर कह दिया है कि ईवीएम में अविश्वसनीयता या किसी खामी का कोई सबूत नहीं है। इसी मामले पर वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने अपने सोशल मीडिया से एक पोस्ट की और कहा कि अब ईवीएम पर सवाल उठाने बंद कर देने चाहिए।
उन्होंने एक्स पर लिखा, चुनावी प्रक्रिया, ईवीएम, चुनाव प्रतिशत पर हर बार चुनाव हारने वालों से द्वारा उठाये गए सवालों पर मुख्य चुनाव आयुक्त का ठोस, तार्किक और मुंहतोड़ जवाब, देखकर मज़ा आ गया। 2009 से 2024 तक लगभग हर पार्टी ने ईवीएम पर सवाल उठाये हैं।
उम्मीद है, अब सारे के सारे, अपनी जबान पर ताला लगा लेंगे। हद हो चुकी है, हर संवैधानिक संस्था पर ये जो सवाल उठाने का ये जो ट्रेंड चल रहा है, अब इसका अंत होना चाहिए। आपको बता दें, मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने भी 42 बार कहा है कि इवीएम को हैक नहीं किया जा सकता। पोलिंग अधिकारी ईवीएम सील करते हैं, तब सब पार्टी के एजेंट होते हैं। ऐसे में किसी गलती होने की संभावना असंभव है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'टिकटॉक' (TikTok) के उत्तरी अमेरिका (North America) में ऐड सेल्स के हेड समीर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
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Samachar4media Bureau
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'टिकटॉक' (TikTok) के उत्तरी अमेरिका (North America) में ऐड सेल्स के हेड समीर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वह कंपनी के साथ फरवरी के अंत तक बने रहेंगे।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब 19 जनवरी से अमेरिका में 'टिकटॉक' पर प्रतिबंध लागू होने जा रहा है।
समीर सिंह ने 2019 में ByteDance में शामिल होकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र (APAC) के लिए ग्लोबल बिजनेस सॉल्यूशंस के हेड के रूप में कार्यभार संभाला था।
TikTok से पहले, समीर सिंह GroupM के दक्षिण एशिया के सीईओ के रूप में कार्य कर चुके हैं।
अपने करियर में, उन्होंने Google, MullenLowe Lintas Group और Procter & Gamble जैसी कंपनियों में भी काम किया है।
एमेजॉन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) में ग्रोथ व बिजनेस मैनेजमेंट के पूर्व हेड विवेक श्रीवास्तव 'जियो सिनेमा' में शामिल हो गए हैं।
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Samachar4media Bureau
एमेजॉन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) में ग्रोथ व बिजनेस मैनेजमेंट के पूर्व हेड विवेक श्रीवास्तव 'जियो सिनेमा' में शामिल हो गए हैं।
विवेक श्रीवास्तव फरवरी 2022 में पार्टनरशिप्स के हेड के तौर पर एमेजॉन प्राइम वीडियो में शामिल हुए थे और 2023 में उन्हें प्राइम वीडियो चैनल इंडिया के हेड के तौर पर प्रमोट किया गया।
प्राइम वीडियो में शामिल होने से पहले, वह सात साल से ज्यादा समय तक टाइम्स नेटवर्क के साथ थे। उन्हें डिजिटल और ब्रॉडकास्ट का प्रेजिडेंट नियुक्त किया गया था। विवेक श्रीवास्तव ने छह साल से ज्यादा समय तक 'वायकॉम18' के साथ 'कलर्स' के लिए डिजिटल और कमर्शियल हेड के तौर पर काम किया है।
वहीं, इसके पहले, उन्होंने TAM और Kantar जैसी कंपनियों के साथ भी काम किया है।
उन दिनों को याद करिए जब देश में केबल चैनल उपलब्ध नहीं था और टीवी पर मात्र दूरदर्शन का ही बोलबाला था...
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
उन दिनों को याद करिए जब देश में केबल चैनल उपलब्ध नहीं था और टीवी पर मात्र दूरदर्शन का ही बोलबाला था। दूरदर्शन के शुरुआती कार्यक्रमों की लोकप्रियता का मुकाबला आज के किसी चैनल के कार्यक्रम शायद ही कर पाएं। चाहे 'रामायण' हो या 'महाभारत', 'चित्रहार' हो या कोई फिल्म, ‘हम लोग’ हो या ‘बुनियाद’, इनके प्रसारण के समय जिस तरह लोग टीवी से चिपके रहते थे, वह सचमुच अनोखा था।
भारत में टेलिविजन के इतिहास की कहानी दूरदर्शन के इतिहास से ही शुरू होती है। संचार-क्रांति के मौजूदा दौर में भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक 92 प्रतिशत भारतीय घरों तक पहुंचने वाला आकाशवाणी के अलावा यह अकेला माध्यम है। आज भी हर एक भारतीय को इस पर गर्व है कि उसके पास दूरदर्शन के रूप में टेलिविजन का गौरवशाली इतिहास मौजूद है। आज भी दूरदर्शन का नाम सुनते ही अतीत के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद आ जाते है। टीवी चैनलों में निजी घरानों की बाढ़ के बीच दूरदर्शन सबसे बड़ा, सबसे सक्षम और सबसे अधिक उत्तरदायी चैनल समूह के रूप में स्थापित है।
दूरदर्शन का सफर
भारत के सबसे पुराने टीवी नेटवर्क दूरदर्शन को आज 15 सितंबर के दिन 63 साल पूरे हो गए हैं। 15 सितंबर 1959 को दूरदर्शन की शुरुआत हुई थी। शुरू में कई वर्षों तक दूरदर्शन भारत में शिक्षा, सूचना और मनोरंजन का प्रमुख स्रोत रहा। 1959 में जब सरकारी चैनल दूरदर्शन का प्रसारण शुरु हुआ तो वह किसी अजूबे से कम नहीं था तभी यह लोगों के बीच बुद्धू बक्से के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन उस बुद्धू बक्से का सफर आज 2021 में घर घर तक पहुंच गया। दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को परीक्षण के तौर पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया। उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में सिर्फ तीन दिन आधा-आधा घंटे होता था, तब इसको ‘टेलिविजन इंडिया’ नाम दिया गया था। बाद में 1975 में इसका हिंदी नामकरण ‘दूरदर्शन’ नाम से किया गया। यह दूरदर्शन नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि टीवी का हिंदी पर्याय बन गया।
शुरुआती दिनों में दिल्ली भर में 18 टेलिविजन सेट लगे थे और एक बड़ा ट्रांसमीटर लगा था, तब दिल्ली में लोग इसको आश्चर्य के साथ देखते थे। इसके बाद दूरदर्शन ने धीरे-धीरे अपने पैर पसारे और दिल्ली (1965), मुंबई (1972), कोलकाता (1975), चेन्नई (1975) में इसके प्रसारण की शुरुआत हुई। शुरुआत में तो दूरदर्शन दिल्ली और आस-पास के कुछ क्षेत्रों में ही देखा जाता था। दूरदर्शन को देश भर के शहरों में पहुंचाने की शुरुआत 80 के दशक में हुई। दरअसल इसकी वजह 1982 में दिल्ली में आयोजित होने वाले एशियाई खेल थे। एशियाई खेलों के दिल्ली में होने का एक लाभ यह भी मिला कि ब्लैकएंडव्हाइट दिखने वाला दूरदर्शन रंगीन हो गया था। फिर दूरदर्शन पर शुरू हुआ पारिवारिक कार्यक्रम ‘हम लोग’ जिसने लोकप्रियता के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए।
1984 में देश के गांव-गांव में दूरदर्शन पहुंचाने के लिए देश में लगभग हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया। इसके बाद आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी पर बना ‘बुनियाद’ कार्यक्रम, जिसने विभाजन की त्रासदी को उस दौर की पीढ़ी से परिचित कराया। इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ (मास्टर जी), अनीता कंवर (लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ घर-घर में लोकप्रिय हो चुके थे। फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारवाहिकों ने दूरदर्शन को घर-घर में पहचान दे दी। दूरदर्शन पर 1980 के दशक में प्रसारित होने वाले ‘मालगुडी डेज’, ‘ये जो है जिंदगी’, ‘रजनी’, ‘ही मैन’, ‘वाहः जनाब’, ‘तमस’, बुधवार और शुक्रवार को 8 बजे दिखाया जाने वाला फिल्मी गानों पर आधारित ‘चित्रहार’, ‘भारत एक खोज’, ‘व्योमकेश बक्शी’, ‘विक्रम बेताल’, ‘टर्निंग पॉइंट, ‘अलिफ लैला’, ‘फौजी’, ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘देख भाई देख’ ने देश भर में अपना एक खास दर्शक वर्ग ही नहीं तैयार कर लिया था बल्कि गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी इन धारवाहिकों को जबर्दस्त लोकप्रियता मिली।
‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे धार्मिक धारावाहिकों ने तो सफलता के तमाम कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे, 1986 में शुरू हुए ‘रामायण’ और इसके बाद शुरू हुए ‘महाभारत’ के प्रसारण के दौरान रविवार को सुबह देश भर की सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसर जाता था और लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रमों से लेकर अपनी यात्रा तक इस समय पर नहीं करते थे। वहीं अगर विज्ञापनों की बात करें तो ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ जहां लोगों को एकता का संदेश देने में कामयाब रहा वहीं ‘बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर-हमारा बजाज’ से अपनी व्यावसायिक क्षमता का लोहा भी मनवाया।
ग्रामीण भारत के विकास में भी दूरदर्शन के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। सन् 1966 में कृषि दर्शन कार्यक्रम के द्वारा दूरदर्शन देश में हरित क्रांति लाने का सूत्रधार बना। सही मायने में अर्थपूर्ण कार्यक्रमों और भारतीय संस्कृति को बचाए रखते हुए देश की भावनाओं को स्वर देने का काम दूरदर्शन ने किया है।
एसपी ने अपनी ढाई दशक की पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता को नए तेवर, नए आयाम दिए। सच तो यह है कि उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की दिशा भी बदली और दशा भी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
डॉ. वीरेन्द्र आजम ।।
'ये थी खबरें आज तक-इंतजार कीजिए कल तक’ यही वो वाक्य है जिसने हिंदी पत्रकारिता में क्रांति का सूत्रपात किया। यही वो वाक्य है जो टीवी समाचार सुनने वालों के दिल में कहीं गहरे तक उतर गया था। यही वो वाक्य है जिसने टीवी समाचारों के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा किया। यही वो वाक्य है जिसने इलेक्ट्रिानिक मीडिया को लोकप्रियता दी। इस वाक्य के जन्मदाता थे, हिंदी पत्रकारिता के नायक सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एसपी। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी अमिट छाप छोड़ने और हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले इस मनीषी ने अपनी सशक्त लेखनी और प्रखर प्रतिभा के बल पर बहुत जल्द पत्रकारिता जगत में अपनी पहचान बना ली थी। व्यवहार से शिष्ट, कार्य से विशिष्ट।
एसपी ने अपनी करीब ढाई दशक की पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता को नए तेवर, नए आयाम दिए। सच तो यह है कि उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की दिशा भी बदली और दशा भी। भला ‘रविवार’ को कोई कैसे भूल सकता है? उनके सम्पादन में ‘रविवार’ ने हिंदी पत्रकारिता का उस समय जो इतिहास लिखा, वह आज भी गौरवपूर्ण है। 'स्कूप' और 'रिर्पोटिंग' में उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता को बार-बार आईना दिखाया। ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर महिलाओं व दलित अत्याचारों को ‘रविवार’ ने तथ्यों सहित प्रमुखता से प्रकाशित करके न केवल समाज का वास्तविक चेहरा देश के सामने रखा बल्कि लोकतंत्र के इस चतुर्थ स्तम्भ की शक्ति का भी अहसास कराया। बागपत का माया त्यागी काण्ड हो या देहुली हत्याकाण्ड, बीहड़ों की दस्यु सुंदरी फूलनदेवी का प्रथम साक्षात्कार हो या तराई के आदिवासियों का शोषण, सभी में ‘रविवार’ ने अंग्रेजी पत्रकारिता को पीछे छोड़ते हुए बाजी मारी।
साम्प्रदायिक दंगों की रिपोर्टिंग में तो ‘रविवार’ ने हिंदी पत्रकारिता का ट्रेंड ही बदल दिया था। उस समय के मेरठ, संभल, मुरादाबाद, अलीगढ़, वाराणसी, रांची और हैदराबाद दंगों की रिपोर्टिंग इसके प्रमाण हैं। दरअसल, एसपी अपने देहात और छोटे शहरों के रिपोर्टर्स पर पूरा भरोसा करते थे। अपने प्रशिक्षण काल में डॉ. धर्मवीर भारती, खुशवंत सिंह और कमलेश्वर जैसे दिग्गजों से जो दिशा, स्नेह, सहयोग और विश्वास उन्हें मिला, वह उन्होंने आगे बांटा भी। वह युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए न केवल उन्हें प्रोत्साहित करते, बल्कि उनके साथ अपने अनुभव भी बांटते थे।
मुझे याद है वर्ष 1989 का लोकसभा चुनाव। मैं सहारनपुर जिला मुख्यालय पर 'नवभारत टाइम्स' का संवाददाता था। एक दिन नवभारत टाइम्स के तत्कालीन उत्तर प्रदेश संस्करण प्रभारी अरुण दीक्षित का मुझे टेलिग्राम मिला-‘तुम्हें कुछ दिन उत्तर प्रदेश डेस्क पर कार्य करना है, तुरन्त दिल्ली आओ, एसपी का निर्देश है।’ यह था उनका भरोसा। एक दिन जब मैं डेस्क पर बैठा एक खबर को एडिट कर रहा था तो न जाने कब मेरे पीछे आकर खड़े हो गए और मुझे कार्य करते देखते रहे, बाद में मेरी पीठ थपथपाई और आगे बढ़ गए। यह था उनका प्रोत्साहन। तब की एक थपकी ने मुझे कितना कुछ दिया, मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता।
3 दिसम्बर 1948 को गाजीपुर जिले के पातेपुर गांव में जन्मे एसपी सिंह को गांव के एक स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद आठ वर्ष की उम्र में कोलकता भेज दिया गया। वहीं उन्होंने बी.ए.किया और फिर वहीं से हिंदी में एम.ए. किया। एसपी सुरेंद्रनाथ कॉलेज में वामपंथी राजनीति में सक्रिय हो भाकपा के संगठन ए.आई.एस.एस से जुड़े और यूनियन की पत्रिका के संपादक बन गए। एम.ए.के बाद फैलोशिप मिला, पी.एच.डी. की और सुरेंद्रनाथ कॉलेज में ही लेक्चरर हो गए। एस.पी.का 1972 में पत्रकारिता में प्रवेश तब हुआ, जब उन्हें मुम्बई के नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षु पत्रकार चुना गया।
‘माधुरी’ में कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद उन्हें ‘धर्मयुग’ का संपादक बनाया गया। अपने लेखन, लगन व पत्रकारिता में प्रतिबद्धता के कारण शीघ्र ही उन्होंने अपनी पहचान कायम कर ली और जब मार्च 1977 में ‘रविवार’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ तो उन्हें उसके सम्पादन का दायित्व सौंपा गया। फरवरी 1985 में नवभारत टाइम्स के बम्बई (अब मुंबई) संस्करण के स्थानीय संपादक बनाए गए। लेकिन एक वर्ष बाद ही 1986 में नवभारत टाइम्स का कार्यकारी संपादक बनाकर दिल्ली बुला लिया गया। दिसम्बर 1991 में नवभारत टाइम्स छोड़कर 1994 तक उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता की।
अक्टूबर 1994 में वे अंग्रेजी दैनिक ‘द टेलिग्राफ’ के राजनीतिक संपादक बने। जुलाई 1995 में वे ‘इंडिया टुडे’ से जुड़े। पहले वह पत्रकारिता के भाषाई संस्करणों के कार्यकारी संपादक और फिर ‘आजतक ’ के प्रारम्भ होने पर उन्हें उसका अस्थाई प्रभार दिया गया। एक वर्ष बाद ही ‘टीवी टुडे’ के कार्यकारी निर्माता बने और ‘आजतक’ का काम स्थाई रूप से देखने लगे।
सामाजिक पहलुओं पर एसपी की गहरी पकड़ थी। वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम दृष्टि से देखते और सम्मान देते थे। उनकी सहजता, सरलता, मृदु व्यवहार और आम आदमी के प्रति उनकी सोच को समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। नवभारत टाइम्स में देहात के एक संवाददाता की खबर पर एक ग्रामीण ने मुकदमा दर्ज कर दिया। कार्यकारी संपादक होने के नाते उन्हें भी सहारनपुर न्यायालय में तारीख पर आना पड़ा। न्यायालय में उपस्थिति के बाद उन्होंने मुझसे उक्त मुकदमे की पूरी जानकारी ली और बोले- ‘मुझे उससे मिलवाओ जिसने मुकदमा किया है।’ नवभारत टाइम्स के वकील ने कहा- ‘अरे सर! वह तो गांव का साधारण सा ग्रामीण है।’ एसपी बात काट कर बीच में ही बोल पड़े, ‘आदमी साधारण हो या असाधारण, ग्रामीण हो या शहरी, सब की इज्जत और सम्मान होता है, यदि मेरे संवाददाता ने गलती की है तो हमें खेद छापना चाहिए था।’ बाद में जब वह उस ग्रामीण से मिले तो उन्होंने कहा- ‘भाई मुझे खेद है कि मेरे रिपोर्टर ने तुम्हें कष्ट पहुंचाया।’ यह सुनकर वह ग्रामीण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बाद में उसने अपना मुकदमा वापस ले लिया। यह थी एसपी के व्यक्तित्व की विशालता।
एसपी ने सिद्धांतों से भी समझौता नहीं किया और अपने पेशे के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहे। उन्होंने एक साक्षात्कार में एक अखबार से कहा भी था- ‘मैंने कभी किसी मिशन के तहत पत्रकारिता नहीं की, मेरी प्रतिबद्धता पत्रकारिता के प्रति है।’ लेकिन साथ ही बाजार की सच्चाई को भी समझा और उस पर कभी मुंह नहीं बिचकाया। हिंदी पत्रकारिता का अवसान मान उस पर रुदन करने वालों के तर्क से वह कभी सहमत नहीं हुए। वह यह मानने को तैयार नहीं थे कि हिंदी अखबार संकट के दौर से गुजर रहे हैं।
‘जनसत्ता’ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा भी था-‘ऐसा मानना घोर अज्ञान की अभिव्यक्ति है, यह तो हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग है। हिंदी और भाषाई अखबारों की पाठक संख्या पूंजी विज्ञापन और मुनाफा लगातार बढ़ रहा है।’ शायद काल के कपाल पर लिखा हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उन्होंने पढ़ लिया था और सचमुच आज हिंदी पत्रकारिता का विस्तार बहुत तीव्रता से हो रहा है। निरंतर नए भाषाई अखबारों का प्रकाशन हो रहा है और जो पहले से स्थापित हैं उनके नये संस्करण भी निकल रहे हैं।
‘आजतक’ की शुरुआत हुई तो वह हिंदी पत्रकारिता के एक नए नायक के रूप में उभरे। एसपी ने उस समय ‘आजतक’ में भाषा के स्तर पर सहज, सरल और मुहावरेदार हिंदी का प्रयोग किया, जिसे हर किसी ने न केवल स्वीकार किया बल्कि सराहा भी। यही वह भाषा थी, जिससे लोगों का टीवी की खबरों के प्रति रुझान बढ़ा। समाचारों के चयन में भी उन्होंने एहतियात बरती और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों को प्राथमिकता दी। ‘आजतक’ के उस समय के समाचारों को सुनना सुखद होता था। एसपी का समाचार वाचन और प्रस्तुतिकरण टीवी समाचारों के इतिहास में आज भी मील का पत्थर है।
16 जून 1997 को एसपी ब्रेन हेमरेज के कारण अस्पताल में भर्ती हुए और 27 जून 1997 की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से हिंदी पत्रकारिता में जो स्थान रिक्त हुआ उसकी भरपाई आज भी नहीं हुई है। एसपी एक सशक्त लेखक, एक प्रखर पत्रकार, एक दमदार वाचक, एक मंजे हुए संचालक और एक कुशल संपादक के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ इंसान थे।
(लेखक सहारनपुर से प्रकाशित होने वाली हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका 'शीतलवाणी' के संपादक हैं )
किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता...
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार ।।
किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेंद्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 9 अप्रैल को राजेंद्र माथुर का पुण्यतिथि है किन्तु उनके नहीं रहने के इकत्तीस बरस की रिक्तता आज भी हिंदी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेंद्र माथुर ने हिंदी पत्रकारिता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह हौसला फिर देखने में नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि उनके बाद हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में किसी ने कमी रखी लेकिन हिंदी पत्रकारिता में एक संपादक की जो भूमिका उन्होंने गढ़ी, उसका सानी दूसरा कोई नहीं मिलता है। राजेंद्र माथुर के हिस्से में यह कामयाबी इसलिए भी आती है कि वे अंग्रेजी के विद्वान थे और जिस काल-परिस्थिति में थे, आसानी से अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे लेकिन हिंदी के प्रति उनकी समर्पण भावना ने हिंदी पत्रकारिता को इस सदी का श्रेष्ठ संपादक दिया। इस दुनिया से फना हो जाने के 31 बरस बाद भी राजेंद्र माथुर दीपक की तरह हिंदी पत्रकारिता की हर पीढ़ी को रोशनी देने का काम कर रहे हैं।
राजेंद्र माथुर की ख्याति हिंदी के यशस्वी पत्रकार के रूप में रही है। शायद यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता की चर्चा हो और राजेंद्र माथुर का उल्लेख न हो, यह शायद कभी नहीं होने वाला है।राजेंद्र माथुर अपने जीवनकाल में हिंदी पत्रकारिता के लिए जितना जरूरी थे, अब हमारे साथ नहीं रहने के बाद और भी जरूरी हो गए हैं। स्वाधीन भारत में हिंदी पत्रकारिता के बरक्स राजेंद्र माथुर की उपस्थिति हिंदी की श्रेष्ठ पत्रकारिता को गौरव प्रदान करता है। पराधीन भारत में जिनके हाथों में हिंदी पत्रकारिता की कमान थी उनमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी थे। इन महामनाओं के प्रयासों के कारण ही भारत वर्ष अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो सका। इस मुक्ति में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत वर्ष के स्वाधीन हो जाने के बाद एकाएक अंग्रेजी ने ऐसी धाक जमायी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत की छाया से भारतीय समाज मुक्त नहीं हो पाया था।
स्वाधीनता के बाद ऐसे में हिंदी पत्रकारिता पर संकट स्वाभाविक था किन्तु इस संकट के दौर में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभाई और मालवा अंचल से राजेंद्र माथुर नाम के एक ऐसे नौजवान को कॉलम राइटर के रूप में स्थापित किया जिसने बाद के वर्षों में हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी बल्कि यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता भी उनसे रश्क करने लगी थी। यह गैरअस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि अखबारों की प्रकाशन सामग्री से लेकर प्रसार संख्या की द्ष्टि से हिंदी के प्रकाशन लगातार विस्तार पा रहे थे। सीमित संचार सुविधायें और आवागमन की भी बहुत बड़ी सुविधा न होने के बावजूद हिंदी प्रकाशनों की प्रसार संख्या लाखों तक पहुंच रही थी। अंग्रेजी पत्रकारिता इस हालात से रश्क भी कर रही थी और भय भी खा रही थी क्योंकि अंग्रेजी पत्रकारिता के पास एक खासवर्ग था जबकि हिंदी के प्रकाशन आम आदमी की आवाज बन चुके थे। हिंदी पत्रकारिता की इस कामयाबी का सेहरा किसी एक व्यक्ति के सिर बंधता है तो वह हैं राजेंद्र माथुर।
बेशक राजेंद्र माथुर अंग्रेजी के ज्ञाता थे, जानकार थे लेकिन उनका रिश्ता मालवा की माटी से था, मध्यप्रदेश से था और वे अवाम की जरूरत और आवाज को समझते थे लिहाजा हिंदी पत्रकारिता के रूप और स्वरूप को आम आदमी की जरूरत के लिहाज से ढाला। उनके प्रयासों से हिंदी पत्रकारिता ने जो ऊंचाई पायी थी, उसका उल्लेख किए बिना हिंदी पत्रकारिता की चर्चा अधूरी रह जाती है। राजेंद्र माथुर के बाद की हिंदी पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो गर्व का भाव तो कतई नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि राजेंद्र माथुर के बाद हिंदी पत्रकारिता की श्रेष्ठता को कायम रखने में संपादकों का योगदान नहीं रहा लेकिन संपादकों ने पाठकों के भीतर अखबार के जज्बे को कायम नहीं रख पाये। उन्हें एक खबर की ताकत का अहसास कराने के बजाय प्रबंधन की लोक-लुभावन खबरों की तरफ पाठकों को धकेल दिया। अधिक लाभ कमाने की लालच ने अखबारों को प्रॉडक्ट बना दिया। संपादक मुंहबायें खड़े रहे, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है। हालांकि इस संकट के दौर में प्रभाष जोशी जैसे एकाध संपादक भी थे जिन्होंने ऐसा करने में साथ नहीं दिया और जनसत्ता जैसा अवाम का अखबार पाठकों के साथ खड़ा रहा।
ज्यादातर अखबारों बल्कि यूं कहें कि हिंदी के प्रकाशन फैशन, सिनेमा, कुकिंग और इमेज गढ़ने वाली पत्रकारिता करते रहे। इनका पाठक वर्ग भी अलग किस्म का था और इन विषयों के पत्रकार भी अलहदा। सामाजिक सरोकार की खबरें अखबारों से गायब थीं क्योंकि ये खबरें राजस्व नहीं देती हैं। इसी के साथ हिंदी पत्रकारिता में पनपा पेडन्यूज का रोग। पत्रकारिता के स्वाभिमान को दांव पर रखकर की जाने वाली बिकी हुई पत्रकारिता। यह स्थिति समाज को झकझोरने वाली थी लेकिन जिन लोगों को राजेंद्र माथुर का स्मरण है और जो लोग जानते हैं कि जिलेवार अखबारों के संस्करणों का आरंभ राजेंद्र माथुर ने किया था, वे राहत महसूस कर सकते हैं कि इस बुरे समय में भी उनके द्वारा बोये गए बीज मरे नहीं बल्कि आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव बनाये रखे। अपने अस्तित्व को कायम रखा और इसे आप आंचलिक पत्रकारिता के रूप में महसूस कर सकते हैं, देख और समझ सकते हैं।
हिंदी के स्वनाम-धन्य अखबार जब लाखों और करोड़ों पाठक होने का दावा ठोंक रहे हों। जब उनके दावे का आधार एबीसी की रिपोर्ट हो और तब उनके पास चार ऐसी खबरें भी न हो जो अखबार को अलग से प्रतिष्ठित करती दिखती हों तब राजेंद्र माथुर का स्मरण स्वाभाविक है। राजेंद्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे लेकिन समय की नब्ज पर उनकी पकड़ थी। शायद उन्होंने आज की स्थिति को कल ही समझ लिया था और जिलेवार संस्करण के प्रकाशन की योजना को मूर्तरूप दिया था। उनकी इस पहल ने हिंदी पत्रकारिता को अकाल मौत से बचा लिया। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा हो या बताया जा रहा हो कि यह अखबार बदले जमाने का अखबार है किन्तु सच यही है कि जिस तरह महात्मा गांधी की पत्रकारिता क्षेत्रीय अखबारों में जीवित है उसी तरह हिंदी पत्रकारिता को बचाने में राजेंद्र माथुर की सोच और सपना इन्हीं क्षेत्रीय अखबारों में है।
हिंदी पत्रकारिता को बहुत शिद्दत से सोचना होगा, उनके शीर्षस्थ संपादकों को सोचना होगा कि वे हिंदी पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं? पत्रकारिता के ध्वजवाहकों द्वारा तय दिशा और दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता भटक गई है। हां, आधुनिक टेक्रालॉजी का भरपूर उपयोग हो रहा है और संपादक मोहक तस्वीरों के साथ मौजूद हैं। आज के पत्रकार राजेंद्र माथुर थोड़े ही हैं जिनकी तस्वीर भी ढूंढ़े से ना मिले। यकिन नहीं होगा, किन्तु सच यही है कि जब आप हिंदी के यशस्वी संपादक राजेंद्र माथुर की तस्वीर ढूंढने जाएंगे तो दुर्लभ किस्म की एक ही तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढना चाहेंगे तो एक उम्र की जरूरत होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)
राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण...
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
संजय द्विवेदी ।।
राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया एकाएक नहीं पाया। संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया, अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया।
राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है। हमारे समय के प्रश्नों के जबाव तलाशने और नए सवाल खड़े की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही है वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं। वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आते है जिसने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया। हिंदी को एक ऐसी भाषा और विराट अनुभव संसार दिया जिसकी प्रतीक्षा में वह सालों से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है।
श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक- ‘माथुर साहब जैसा बोलते थे वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।’
श्री बाली लिखते हैं कि ‘वह एक ऐसा संपादक है जिसके मन-समुद्र में विचारों की लहरें एक के बाद एक लगातार, अनवरत उठती हैं, कोई लहर किसी दूसरी लहर को नष्टकर आगे बढ़ने के अहंकार का शिकार नहीं है। और पूनम की कोई ऐसी भली रात हर महीने आती है जब ये लहरें किसी विराट-सर्वोच्च को छू लेने को बेताब हो उठती हैं।’ ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आर्कषण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होता है।
वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि– ‘राजेंद्र माथुर हिंदी पत्रकारिता के उस संधिकाल में संपादक के रूप में सामने आए थे, जब हिंदी अखबार अपने पुरखों के पुण्य के संचित कोष को बढ़ा नहीं पा रहे थे। यह जमा पूंजी इतनी नहीं थी कि हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं व्यावसायिकता की बढ़ती हुयी चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे बाजार के दबाव से बचा सकें। राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान बना सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य से प्रकाशित उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगें।’
राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थित ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुयी जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। नवभारत टाइम्स में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि- ‘राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई शैली या लहजा नहीं था वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकी आदेशों या हुकमों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती थी। वे एक आणविक ताप या विद्युत संयत्र की तरह बेहद चुपचाप काम करते थे, जो अपने प्रभाव से लगभग उदासीन रहता है। लेकिन वे बेहद परिश्रमी संपादक थे और शायद एक या दो उपसंपादकों की मदद से एक दस पेज का अखबार रोज निकाल सकते थे। वे अजातशत्रु और धर्मराज युधिष्ठिर जैसे थे लेकिन जरूरत पड़ने पर वज्र की तरह कठोर भी हो सकते थे।’
राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराईयों से उनका व्यक्तित्व बेहद अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गयी हैं श्री माथुर उसमें फिट बैठते हैं। उनका व्यक्तित्व बौद्धिक ऊचाइयां लिए हुए था। अपनी पत्रकारिता को कुछ पाने और लाभ लेने की सीढ़ी बनाना उन्हें नहीं आता था। उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में वे जिस समय दिल्ली में नवभारत टाइम्स जैसे बड़े अखबार के संपादक थे तो वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं।
सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह उंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं।
विष्णु खरे उनके इन्हीं व्यक्तित्व की खूबियों को रेखांकित करते हुए कहते हैं- ‘राजेंद्र माथुर का जीवन और उनके कार्य एक खुली पुस्तक की तरह थे। कानाफूसी, चुगलखोरी, षड्यंत्र, झूठ-फरेब, मक्कारी, उनके स्वभाव में थे ही नहीं। वे किसी चीज को गोपनीय रखना ही नहीं चाहते थे और अक्सर कई ऐसी सूचनाएं निहायत मामूली ढंग से देते थे, जिनपर दूसरे लोग कारोबार कर लेते हैं। इसलिए उनसे बातें करना बेहद असुविधाजनक स्थितियां पैदा कर देता, क्योंकि वे कभी भी किसी के द्वारा कही गयी बात को जगजाहिर कर देते थे और वह व्यक्ति अपना मुंह छिपाता फिरता था। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी और भारतीय तथा विश्व राजनीति में सतही और चालू दिलचस्पी न रखने के बावजूद राष्ट्रीय व विदेशी घटनाक्रम तथा इतिहास में उनकी पैठ आश्चर्यजनक थी। एक सच्चे पत्रकार की तरह उनमें जमाने भर के विषयों के बारे में जानकारी थी और वे घंटों अपने प्रबुद्ध श्रोताओं को मंत्रमुग्ध रख सकते थे। नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन जाने के बाद वे भविष्य में क्या बनेंगें इसको लेकर उनके मित्रों में दिलचस्प अटकलबाजियां होती थीं और बात राष्ट्रसंघ और मंत्रिमंडल तक पहुंचती थी। लेकिन अपने अंतिम दिनों में तक राजेंद्र माथुर एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया जैसी पेशेवर संस्था के काम में ही स्वयं को होमते रहे।’
उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे जो लगातार यह सोचता रहा कि हिंदी पत्रकारिता का विचार दारिद्रय कैसे दूर किया जाए। कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले और उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके।
नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक रहे स्व.सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था और वे लिखते हैं- ‘माथुर साहब का गहन इतिहासबोध, शुद्ध श्रध्दा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवी स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।’
उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती है। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे।
इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत प्रेम, भारत बोध और हिंदी प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे।
श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं- ‘माथुर साहब ने अंग्रेजी में एमए किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद नवभारत टाइम्स को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सार्मथ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे। शब्दों का कारोबार करने वाले हमारे जैसे अनपढ़ों और बौद्धिक संस्कारहीनों के साथ तो नियति ने सचमुच अन्याय किया है। उनके लेखन से हम जैसे लोगों को एक दृष्टि तो मिलती ही थी, ज्ञान का वह विपुल भंडार भी कभी बातचीत से तो कभी उनके लेखन से टुकड़ों-टुकड़ों में मिल जाता था, जो प्रायः अंग्रेजी में ही उपलब्ध है और जिसे पढ़कर पचा लेना प्रायः कठिन होता है।’
पत्रकारीय सहयोगियों और मित्रों की नजर से देखें तो राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय व्यक्तित्व की कुछ खूबियां साफ नजर आती हैं। जैसे वे बेहद अध्ययनशील संपादक एवं पत्रकार हैं। उनका अध्ययन और विषयों के प्रति उनके ज्ञान की गहराई उन्हें अपने सहयोगियों के बीच अलग ही व्यक्तित्व दे देती है। दूसरे उनका लेखन भारतीयता और उसके मूल्यों को समर्पित है। तीसरा है उनके मन में किसी प्रकार की पदलाभ की कामना नहीं है। वे अपने काम के प्रति समर्पित हैं और किसी राजनीति का हिस्सा नहीं हैं। चौथा उनमें मानवीय गुण भरे हुए हैं जिसके चलते वे मानवीय कमजोरियों और पद के अहंकार के शिकार नहीं होते। इसके चलते एक बड़े अखबार के संपादक का पद, रूतबा और अहं उन्हें छू नहीं पाता।
यह उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता है जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली कहते हैं- ‘हमारे प्रधान संपादक को को पांचवा कोई काम आता है, इसमें तो मुझे पूरा शक हैः बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।’
श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ समाने आता है। जिसमें एक बौद्धिक तेज और आर्कषण निरंतर दिखता है। जाहिर तौर पर ऐसे उदाहरण आने वाली पत्रकार पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं कि किस तरह उन्होंने अपने को तैयार किया। असहज और वैश्विक सवालों पर इतनी कम आयु में लेखन शुरू कर अपनी देशव्यापी पहचान बनाई। शायद इसीलिए देश के दो महत्वपूर्ण अखबारों नई दुनिया और नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक पद तक वे पहुंच पाए। यह यात्रा एक ऐसा सफर है जिसमें श्री माथुर ने जो रचा और लिखा वह आज भी पत्रकारिता की पूंजी और धरोहर है। पत्रकारिता का लेखन सामयिक होता है उसकी तात्कालिक पहचान होती है।
श्री माथुर के पत्रकारीय लेखन के बहाने हम लगभग चार दशक की राजनीति, उसकी समस्याओं और चिंताओं से रूबरू होते हैं। यह एक दैनिक इतिहास की तरह का लेखन है जिससे हम अपने विगत में झांक सकते हैं और गलतियों से सबक लेकर नए रास्ते तलाश सकते हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक संपादक के तौर पर सामने आते हैं जो पूर्णकालिक पत्रकार हैं। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। सो उन्होंने हिंदी पत्रकारिता पर साहित्यकार संपादकों द्वारा दी गयी भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अलग पत्रकारीय भाषा का अनुभव हमें दिया। हिंदी को, संवाद को, संचार की, सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं जिसने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव के विषय बनाया जिनपर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था।
उन्होंने भावना से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। जिसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया। इससे हिंदी पत्रकारिता एक आत्मविश्वास हासिल हुआ। उसे एक नई ऊर्जा मिली। आज हिंदी पत्रकारिता में जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गयी है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ रास्ते निकाल पाएं जो हमें इस कठिन समय में लड़ने और मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सके।
(लेखक वर्तमान में भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक के पद पर कार्यरत हैं।)
(साभार: sanjayubach.blogspot.in)
एक जनवरी 1983, ‘नवभारत टाइम्स’ के मुम्बई संस्करण के समाचार संपादक रामसेवक श्रीवास्तव के घर...
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समाचार4मीडिया ब्यूरो
क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार
एक जनवरी 1983, ‘नवभारत टाइम्स’ के मुम्बई संस्करण के समाचार संपादक रामसेवक श्रीवास्तव के घर के फोन की घंटी सुबह-सुबह घनघनाती है। उधर से पूछा गया कि पहले पेज पर यह एक खबर किसने लिखी है, नाम बताइए! फोन राजेंद्र माथुर का था, जिन्होंने दो-ढाई महीने पहले ही दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक का पद सम्भाला था और मुम्बई की अपनी संपादकीय टीम से पहली मुलाकात के लिए पिछली शाम ही मुम्बई पहुंचे थे। श्रीवास्तव जी को लगा कि शायद कुछ भारी गड़बड़ हो गयी है। लेकिन उन्हें समझ में नहीं आया कि इसमें भला क्या गड़बड़ हो सकती है? खबर तो इस बारे में थी कि मुम्बई के लोगों ने पिछली रात नए साल का स्वागत कैसे किया। दफ्तर में कॉपी निकलवा कर देखी गयी और फिर माथुर जी को फोन कर बताया गया कि खबर तो अखबार के सबसे जूनियर रिपोर्टर ने लिखी है। कुल साल भर हुए हैं उसे काम करते हुए। वैसे लड़का काम तो ठीक ही करता है। क्या कोई बड़ी गलती हो गयी है? माथुर जी ने कहा, ‘नहीं, कोई गलती नहीं हुई है। खबर अच्छी लिखी गयी है। उस लड़के से आज मुझे मिलवाइए।’
वह लड़का मैं था। और ‘नवभारत टाइम्स’ में मैं अकेला ऐसा लड़का नहीं था। माथुर जी ने इसी तरह खोज-खोज कर अनगिनत लोगों को चीन्हा, बरसों के अनुभवी दिग्गजों से लेकर नए ‘बच्चा पत्रकारों’ और दूरदराज इलाकों से लिख रहे ‘फ्रीलांसलरों’ तक को उन्होंने ढूंढा, उन्हें नए-नए प्रयोगों में लगाया, ऐसे नए-नए काम सौंपे, जो उन दिनों के हिंदी अखबारों की कामकाजी शब्दावली में थे ही नहीं।
हालांकि ‘रविवार’ और ‘दिनमान’ जैसी कुछ पत्रिकाएं तब तक हिंदी पत्रकारिता में अपने-अपने क्षेत्र में बहुत प्रतिष्ठा पा चुकी थीं और उस समय के युवा हिंदी पत्रकारों की पीढ़ी के बहुत बड़े हिस्से को गढ़ने में इन दोनों पत्रिकाओं का बहुत ही अहम योगदान है लेकिन इन्दौर के ‘नई दुनिया’ (पहले राजेंद्र माथुर जिसके संपादक थे) जैसे कुछेक अपवादों को छोड़ कर तब के हिंदी के दैनिक अखबारों के लिए पत्रकारिता का मतलब एजेन्सी और स्ट्रिंगरों से मिली खबरें छाप देना भर ही था। उस समय के बड़े मीडिया समूहों के हिंदी अखबार बस चुटकी भर ही बेहतर थे कि कभी-कभार वह अपने समूह के अंग्रेजी दैनिक के विशेषज्ञ पत्रकारों की रिपोर्टें अनुवाद कर छाप दिया करते थे। लेकिन संपादकीय पेज पर मौलिक चिन्तन और विचारोत्तेजक लेखन तो लगभग नहीं के ही बराबर था। आज भी इन सभी मामलों में ज्यादातर हिंदी अखबारों की कमोबेश ऐसी ही दयनीय हालत है। यह अलग बात है कि हिंदी के कुछ अखबार समूह आज शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध हैं और हर साल सैकड़ों करोड़ का मुनाफा दर्ज कर रहे हैं, लेकिन हिंदी पत्रकारों की नई खेप तैयार करने संपादकीय स्तर सुधारने, अपनी टीम को प्रशिक्षित करने, विशेषज्ञ पत्रकारों और लेखकों को विकसित करने और फील्ड रिपोर्टिंग के लिए वे एक कौड़ी भी खर्च नहीं करना चाहते।
माथुर जी दिल्ली इसी सपने को लेकर आये थे कि मध्य प्रदेश में ‘नईदुनिया’ में वह जो कुछ कर रहे थे, उसे राष्ट्रीय स्तर पर करके दिखायें ताकि हिंदी पत्रकारिता अपने अनुवादी और ‘वहां का चेप, यहां छाप’ टाइप ‘कर्मयोग’ से मुक्ति पाने के लिए कुछ तो सोचना शुरू करे। कुछ तो हिंदी में अपनी अलग रिपोर्टिंग हो, साहित्य के अलावा दूसरे और भी विषयों पर भी हिंदी में मौलिक चिन्तन-लेखन हो और ऐसे हिंदी पत्रकार तैयार हों, जिन्हें हिंदी के बाहर भी उनके काम के लिए जाना जाये। उन दिनों की हिंदी की अखबारी पत्रकारिता के हिसाब से यह बहुत महत्त्वाकांक्षी स्वप्न था, लेकिन असम्भव नहीं था, यह माथुर जी ने साबित कर दिखाया।
‘नवभारत टाइम्स’ में नए-नए प्रयोग होने लगे। टीम में से ढूंढ-ढूंढ कर ऐसे रिपोर्टरों को तराशा गया, जो विदेश, रक्षा, आर्थिक विषयों, राजनीति, पर्यावरण, सामाजिक मुद्दों, खेल आदि पर अंग्रेजी का मुंह देखे बगैर बेलाग रिपोर्टिंग कर सकें। राज्यों में लस्टम-पस्टम चल रहे ब्यूरो को चाक-चौबन्द किया गया, जहां ब्यूरो नहीं थे, वहां खोले गये। और तो और, ‘घुमन्तू संवाददाता’ के एक अनूठे प्रयोग को भी शुरू किया गया, जो देश भर में कभी भी कहीं भी घूम कर ज्वलन्त विषयों पर तुरन्त और विस्तार से रिपोर्टिंग करे। भाषा से लेकर खबरों के शीर्षकों और तस्वीरों तक पर ध्यान दिया जाने लगा। और जब ‘नवभारत टाइम्स’ के लखनऊ, पटना और जयपुर के नए संस्करणों के खुलने की शुरुआत हुई तो माथुर जी ने इन सभी जगहों पर ऐसे युवा पत्रकारों की टीम खड़ी की, जो उनकी ही तरह कुछ सपनों को लेकर शिद्दत से जिये। आज की पीढ़ी को यह जान कर शायद बड़ा अटपटा लगे कि तब दूसरे अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर रहे कई युवा पत्रकार यहां केवल उपसंपादक पद पर आने को तैयार हो गये सिर्फ इसलिए कि माथुर जी की ‘ड्रीम टीम’ का हिस्सा बन सकें।
माथुर जी के नए प्रयोगों में बहुत कुछ सफल रहे, तो कुछ नहीं भी रहे। कुछ पर सवाल भी उठे। लेकिन उनका मानना साफ था कि प्रयोगों की रफ्तार कभी रुकनी नहीं चाहिए और उसके लिए हमेशा हौसला बढ़ाया जाना चाहिए। 1983 के क्रिकेट विश्व कप की जीत पर मुम्बई के ‘नवभारत टाइम्स’ के एक प्रयोगधर्मी शीर्षक को अगले दिन के डाक संस्करण में जब बदल कर ‘पुराने ढर्रे’ का कर दिया गया, तो माथुर जी ने साफ कहा कि प्रयोग करते हुए हमारे पत्रकार कुछ ‘ब्लंडर’ भी कर दें, तो वह मुझे खुशी-खुशी मंजूर है, लेकिन प्रयोगों का ऐसा गला घोंटा जाना कतई मंजूर नहीं।
और ‘नवभारत टाइम्स’ के अलग-अलग संस्करणों में हो रहे ऐसे तमाम प्रयोगों पर माथुर जी बड़ी पैनी नजर रखते थे। उन्हें लगातार दफ्तर में ‘डिस्प्ले बोर्ड’ पर दिखाया जाता था ताकि लोग उससे सीख और प्रेरणा ले सकें। दिल्ली के मुकाबले ‘नवभारत टाइम्स’ के क्षेत्रीय संस्करणों में टीम, संसाधन आदि सभी कुछ बहुत सीमित हुआ करता था। लेकिन अकसर उत्साह से लबरेज इन क्षेत्रीय संस्करणों की टीमें बहुत कुछ ऐसा करती थीं, जिसकी अकसर वाहवाही होती थी। इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी जबर्दस्त सहानुभूति लहर के चलते जब 1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी की कांग्रेस ने तमाम विपक्ष का सफाया कर दिया, तो उस दिन ‘नवभारत टाइम्स’, लखनऊ में रामकृपाल का दिया बैनर शीर्षक ‘पूरे देश पर पंजे की छाप’ आज भी कम से कम लखनऊ में तो लोगों को भूला नहीं है। माथुर जी का कमेंट था, ‘ऐसा होना चाहिए शीर्षक और ऐसा होना चाहिए अखबार!’
कवरेज, कंटेंट, प्रस्तुतीकरण और भाषा को लेकर राजेंद्र माथुर कब कहां क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, उनकी टीम के सारे युवा पत्रकारों की इस पर न केवल हमेशा चौकस नजर रहती थी बल्कि उनमें यह ललक और अद्भुत होड़ हर दिन बनी रहती थी कि आज के अंक में क्या कुछ नया कर दिया जाये। मेरी नजर में यही राजेंद्र माथुर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। कोई भी युवा पत्रकार बेखटके उनके कमरे में जा सकता था, दफ्तर में कहीं भी आते-जाते बेहिचक उन्हें रोक कर कुछ भी पूछ सकता था, अपनी शंका समाधान कर सकता था, किसी बात पर खुल कर अपनी आपत्ति जता सकता था बिना रत्ती भर भी डरे कि संपादक को उसकी बात बुरी तो नहीं लग जायेगी! टाइम्स समूह के प्रकाशनों के प्रधान संपादक तो दूर, ज्यादातर सहायक सम्पादक तक अपने को ‘इलीट’ जमात में रखते थे। ऐसे में अकसर माथुर जी का न्यूज रूम में आकर उपसम्पादकों या रिपोर्टरों के बीच बिलकुल सहज हो कर बैठ जाना और गप्पें लगाना हम सबके लिए अविस्मरणीय अनुभव है।
माथुर जी पूरी ईमानदारी के साथ पूरे-पूरे लोकतांत्रिक संपादक थे। संपादकीय नीतियों को लेकर वरिष्ठ सहयोगियों को तो छोड़िये, टीम के कनिष्ठतम सदस्य की असहमति का सम्मान था। और कई बार ऐसे अवसर आये कि माथुर जी के खुद के लिखे को लेकर असहमतियां मुखर भी हुईं, लेकिन जहां तक मैं जानता हूं किसी के निजी करियर पर इन असहमतियों का कोई भी विपरीत असर नहीं पड़ा। वह भाषा के धनी क्या, बल्कि कुबेर थे, हममें से बहुतों ने उनकी भाषा से बहुत कुछ चुराया है, लेकिन ‘नयी’ को ‘नई’ लिखने के उनके तर्क से मैं तब भी सहमत नहीं था और अब भी नहीं हूं।
बहरहाल, आज के संपादकों को माथुर जी से सीखना चाहिए कि संपादक होना क्या होता है!
(आज स्व. राजेंद्र माथुर जी की पुण्यतिथि है)