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नौकरी जाने पर पत्रकारों को भी बेरोजगारी भत्ता मिलना चाहिए: केजी सुरेश, DG, IIMC

आईआईएमसी के डायरेक्टर जनरल केजी सुरेश खुद जमीन से जुड़े पत्रकार रहे हैं। आज पत्रकारिता के प्रमुख संस्थान...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 26 August, 2017
Last Modified:
Saturday, 26 August, 2017


आईआईएमसी के डायरेक्टर जनरल केजी सुरेश खुद जमीन से जुड़े पत्रकार रहे हैं। आज पत्रकारिता के प्रमुख संस्थान के डीजी हैं जहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर पत्रकार देशभर के मीडिया हाउसेस में काम कर रहे हैं। आज देश में मीडिया और पत्रकारिता किस दिशा में जा रहे हैं, क्या रंगरूप ले रहे हैं? मीडिया, पत्रकारिता और पत्रकारों से जुड़े कुछ करंट इश्यूज पर उनसे बातचीत कर जानने का प्रयास किया सीनियर जर्नलिस्ट नरेश तनेजा ने- 

आज पत्रकारिता की दिशा और दशा के बारे में क्या कहेंगे?

भारत में पत्रकारिता की यात्रा स्वतंत्रता-संग्राम से शुरू हुई थी। आज उसमें अनेक कमियां आ गई हैं। एक तरफ पेड-न्यूज है तो दूसरी तरफ राडिया-टेप-कांड जैसी घटनायें, जिनमें मीडियाकर्मी शामिल पाये जाते हैं। आज मीडिया पर तलवार लटकी हुई है। मीडिया का कॉर्पोरेटीकरण हो गया है। कुछ ही कंपनियों ने वेजबोर्ड का पालन किया है। कॉन्ट्रैक्ट-सिस्टम के कारण मीडिया के लोग मजबूर हैं, तनख्वाहें कम हैं। कई जगह मीडियाकर्मियों को विज्ञापन लाने और डील तक करवाने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे पत्रकारिता की तटस्थता पर खतरा आ गया है। इसका एक कारण है कि पत्रकार खुद अपने हितों को लेकर एकजुट नहीं हैं। बंटे हुए हैं। खेमेबाजी व लामबंदी का शिकार हो रहे हैं। पहले वे सबसे समान दूरी बनाए रखते थे। पर, आज वे कुछ बिजनेस और राजनीतिक हितों को पूरा करते दिखाई देते हैं। राह भटक गए हैं। कुछ अच्छे लोग भी हैं पर, अपवादस्वरूप।

क्या इससे खबरों व मीडिया कंपनियों की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठता ?

पहले लोग अखबार में छपे को वेदवाक्य मानते थे। पर, आज आम लोग मीडिया की खबरों पर सवाल उठाते हैं, आरोप लगाते हैं। पहले लोग देखते थे कि पत्रकार क्या लिख रहा है। अब देखते हैं कि क्यों लिख रहा है। शक करते हैं। यह ट्रस्ट-डेफिसिट है।

टीवी की न्यूज में इतना हो-हल्ला, शोर-शराबा। नेताओं की बाइट के पीछे भागना, फिर लड़वाना। विदेशी चैनलों में तो ऐसा देखने में नहीं आता। क्या यही न्यूज की प्रेजेंटेशन है?

शो बिजनेस की वजह से आज न्यूज एक तमाशा बन गई है जिसका मकसद है पब्लिक का एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट। टीवी वाले पॉलिटिक्स से ऑब्सेस्ड हैं। शाम छह बजते ही टीवी पर सूचना नहीं मनोरंजन की नौटंकी शुरू हो जाती है। देश-दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है। पर, ग्रासरूट लेवल की पत्रकारिता हो कहां रही है। राष्ट्रीय मुद्दों को दरकिनार करके किसी एक ट्वीट या टिप्पणी को दिनभर चलाया जाता है। बयानबाजी की न्यूज ज्यादा है। हो-हल्ला करके आकर्षित करने की नीति होती है एंकर की। समाचारों के साथ चुपके से विचारों का मिश्रण कर दिया जाता है। कुछ लोग आज पत्रकार कम और एक्टिविस्ट ज्यादा नजर आने लगे हैं। लोग भी ऐसे प्रोग्रामों को गंभीरता से नहीं लेते। टाइमपास करने के लिए देख लेते हैं। मीडिया कंपनियों का अपना मकसद होता है। स्टूडियो में कुछेक गेस्ट को बुलाया चर्चा निपटा दी जाती है। रिपोर्टिंग में खर्च ज्यादा आता है, पैनल डिस्कशन सस्ते मे हो जाता है। विदेशी चैनलों पर आज भी ग्राउंड रिपोर्टिंग होती है।

रिपोर्टिंग के स्तर व उनकी भाषा का अक्सर लोग या फिर कॉमेडी सीरियलों में मजाक उड़ाया जा रहा है। खासकर किसी भी मौके पर पूछना- कैसा महसूस कर रहे हैं, जैसे जुमलों का...

यह प्रशिक्षण व तजुर्बेकार पत्रकारों की कमी की स्पष्ट निशानी है। गैर-तजुर्बेकार पत्रकार भेजकर मीडिया हाउस अपना मजाक उड़वा रहे हैं। जिम्मेदारी उन्हें दी जा रही है जिन्हें इतना तजुर्बा ही नहीं है। बड़ी जिम्मेदारियां तक ऐसे लोगों को मिल रही हैं।

आईआईएमसी के जरिये ज्यादा रिक्रूटमेंट नहीं हो पाती?

मैं इससे सहमत नहीं हूं। 2015-16 के दौरान ज्यादातर छात्रों का रिक्रूटमेंट हुआ। हां, 2016-17 कुछ कम हुआ। इसकी वजह आईआईएमसी की गुणवत्ता में कमी नहीं बल्कि इंडस्ट्री में अवसरों की संख्या में कमी होना है।

संस्थान के परिसर में हवन वगैरह आयोजित हुआ, आप पर आरोप लगे कि राइटिस्ट हैं?

मैंने संस्थान में हवन नहीं कराया। 20 मई, 2017 के लिए मीडियाकर्मियों की संस्था मीडिया स्कैन ने राष्ट्रीय पत्रकारिता पर सेमीनार के लिए जगह मांगी थी। हमने तो उन्हें बस जगह दी थी। वह भी तब जब संस्थान का सत्र समाप्त हो चुका था। कार्यक्रम में कुछ लोग दीप प्रज्जवलित करते हैं, कुछ सरस्वती पूजा। इस कार्यक्रम के आयोजकों ने इसकी जगह हवन करने का कार्यक्रम रखा था। मैं तो वहां गया ही नहीं। तो मुझ पर ये आरोप सही नहीं हैं।  

आज डिजिटल युग में प्रिंट अखबारों की संभावनाएं सिकुड़ नहीं गईं?

बेशक! पर, बावजूद इसके आज इंटरनेट देखने वाले हैं कितने। 30 प्रतिशत, बस। वह भी शहरों में। गांव-देहात में कितने लोग बोबाइल में अखबार देखते हैं। विश्व में चाहे अखबारों का सर्कुलेशन घटा हो पर, भारत में बढ़ रहा है। हो सकता है 10-15 साल बाद लोग इंटरनेट के जरिये अखबार पढ़ें पर, अखबार खत्म होने वाला नहीं है क्योंकि अखबार नवशिक्षितों के लिए सशक्तीकरण का एक प्रतीक है। अखबारों व टीवी को कॉन्टेंट के नए पहलुओं को सामने लाना होगा तभी लोगों की रूचि पैदा होगी।

पहले लोग फ्रंट-पेज शौक से पढ़ते थे। आज फ्रंट-पेज पर जैकेट और विज्ञापन ही विज्ञापन होते हैं तो फ्रंट-पेज की अहमियत इससे कम नहीं हो जाती?

आज सबको पता है कि बिजनेस चलाने के लिए यह करना पड़ता है। आज के दौर में अब विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल व टीवी ले जा रहे हैं तो ऐसे में प्रतियोगिता तो है पर, आपको अपना कॉन्टेंट जोरदार रखना होगा क्योंकि कॉन्टेंट इज द किंग। सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपके कॉन्टेंट की क्वॉलिटी क्या है। आपकी न्यूज में है क्या?

आज ट्रेंड मीडियाकर्मियों की संख्या बढ़ रही है, पर नौकरियां कम हो रही हैं, क्या करें?

आज प्रशिक्षण के नाम पर दुकानें खुल गई हैं। बेहतर उम्मीदवार कम हैं। मार्केट बेस्ट मांगती है। उन्हें ही जॉब मिलेगी। फिर, जरूरी नहीं कि सभी को न्यूज क्षेत्र में ही जॉब मिले। एनिमेशन, विजुअल इफैक्ट्स, कॉमिक्स, गेमिंग आदि भी मीडिया की ही फील्ड हैं जहां बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत है। तो मीडिया के नए आयाम भी खुल रहे हैं जहां जॉब के अवसर हैं।

इसी को देखते हुए आईआईएमसी मुम्बई के फिल्म सिटी, गोरेगांव में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में नेशनल सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग एंड कॉमिक्स स्थापित करने जा रही है।

जिस तरह मीडिया हाउस से लोग निकाले जा रहे हैं खासकर, एक्सपीरियंस्ड लोग, उससे नये लोग हतोत्साहित भी होते हैं और खबरों की विश्वसनीयता भी कम हो रही है?

उससे भी बड़ा खतरा है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। इन चैनलों या मीडिया हाउसेस के मालिकों पर जब सरकारी एजेंसियां शिकंजा कसती हैं तो मालिक अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर तो हो-हल्ला मचाते हैं। पर, जब कॉन्ट्रेक्ट सिस्टम को आधार बनाकर अपने पत्रकारों व कर्मचारियों को रातोरात निकाल देते हैं तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां खो जाती है। आज पत्रकारों की नौकरियां सुरक्षित नहीं हैं।

हर सरकार चुनाव में मीडिया के कंधों पर बैठकर आती है। पर, किसी ने भी कोई मीडिया सहायता कोष या फंड नहीं बनाया, जहां मुसीबत पड़ने पर मीडियाकर्मियों की सहायता की जा सके?

दो पहलू हैं। हम सरकार से लाभ लें, उस पर निर्भर रहें और यह भी चाहें कि हम स्वतंत्र बने रहें तो दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं। आप फिर सरकार के खिलाफ कलम कैसे उठा सकेंगे?

मीडिया वेल्फेयर को लेकर लगभग हर सरकार उदासीन दिखाई देती है, ऐसा क्यों?

जर्नलिस्ट वेल्फेयर फंड अटलजी की सरकार के समय उस दौरान बनाया गया था जब सुषमा स्वराज सूचना व प्रसारण मंत्री थीं। आज उसकी क्या स्थिति है इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है।

वैसे तो हर सरकार रोजगार देने को चिंतित दिखाई देती है। पर, इतने मीडिया वालों की नौकरी चली जाती है, लेकिन उनके रोजगार के कोई इंतजाम नहीं किए जाते हैं। उनके भी परिवार और जीवनयापन के खर्च हैं।

मेरा मानना है कि अगर ऐसा कोई फंड बने तो उसमें मीडिया इंडस्ट्री या मीडिया हाउसेस का योगदान भी होना चाहिए। सरकार को मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर ऐसा करना चाहिए। जर्नलिस्ट वेल्फेयर फंड में कंपनी एक्ट में सीएसआर फंड का कानून लागू होना चाहिए। हां, एक बात और अगर बेरोजगारी भत्ता अन्य लोगों को मिलता है तो पत्रकारों को भी मिलना चाहिए। हमारे देश में बहुत से ऐसे मीडियाकर्मी हैं जिनकी नौकरी एकाएक किसी न किसी कारण से चली जाती है।


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हिंदी का जलवा: पाक पढ़ा रहा है चीन को

क्या आप ये मानेंगे कि पाकिस्तान से हिंदी सीख रहे हैं चीनी और खाड़ी देशों के बहुत से राजनयिक और रक्षा विशेषज्ञ? पर ये सच

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 07 January, 2025
Last Modified:
Tuesday, 07 January, 2025
Exclusive:Sheveeta Hegde on Shaping the Future of Music Advertising & Brand Engagement, Times Music

2024 की पहली तीन तिमाहियों में रेडियो विज्ञापनों में लगातार वृद्धि देखी गई। जनवरी से सितंबर 2024 के दौरान, टॉप 10 सेक्टर्स ने सामूहिक रूप से कुल विज्ञापन का 89% हिस्सा दर्ज किया। इन सेक्टर्स में सर्विसेज (30%), ऑटो (10%), बैंकिंग/फाइनेंस/इन्वेस्टमेंट (9%), रिटेल (9%), फूड व बेवरेजेस (8%), एजुकेशन (8%), पर्सनल ऐसेसीरीज (7%), बिल्डिंग, इंडस्ट्रियल व लैंड मैटेरियल/इक्वीपमेंट्स (3%), पर्सनल हेल्थकेयर (3%) और ड्यूरेबल्स (2%) शामिल हैं।

सर्विसेज और ऑटो अपनी टॉप कैटेगरीज की सूची में अपनी स्थिति बनाए हुए हैं, जबकि BFSI (बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा) जनवरी-सितंबर 2023 में 5वें स्थान से उछलकर 2024 में तीसरे स्थान पर पहुंच गया।

रेडियो विज्ञापन में टॉप 10 कैटेगरीज का 51% विज्ञापन हिस्सेदारी पर कब्जा है। इनमें शामिल हैं: प्रॉपर्टीज/रियल एस्टेट (16%), हॉस्पिटल/क्लीनिक्स (7%), कारें (7%), रीटेल आउटलेट्स- ज्वैलर्स (6%), रीटेल आउटलेट- इलेक्ट्रॉनिक्स/ड्यूरेबल्स (3%), रीटेल आउटलेट - क्लॉथ/टेक्सटाइल/फैशन (3%), लाइफ इंश्योरेंस (3%), मल्टीपल कोर्सेज (3%), स्कूल्स (1%) और कोचिंग/कम्पटैटिव एग्जाम सेंटर (1%),  जैसा कि इन सेक्टर्स में देखा गया, टॉप 2 कैटेगरीज ने जनवरी-सितंबर 2023 की तुलना में जनवरी-सितंबर 2024 में अपनी स्थिति बनाए रखी।

जनवरी से सितंबर 2024 के दौरान रेडियो विज्ञापन में टॉप 10 विज्ञापनदाताओं ने कुल ऐड वॉल्यूम का 12% हिस्सा लिया। इन विज्ञापनदाताओं में LIC ऑफ इंडिया ने अपनी शीर्ष स्थिति बनाए रखी। गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन, हुंडई मोटर इंडिया, और रेनॉल्ट इंडिया नए नाम थे, जो जनवरी-सितंबर 2023 की सूची में नहीं थे। अन्य प्रमुख विज्ञापनदाताओं में मारुति सुजुकी इंडिया, एसबीएस बायोटेक, LIC हाउसिंग फाइनेंस, टाटा मोटर्स, रिलायंस रिटेल और विष्णु पैकेजिंग शामिल हैं। इस अवधि में रेडियो पर 5000 से अधिक विशेष विज्ञापनदाता भी मौजूद थे, जो 2023 की तुलना में उल्लेखनीय है।

जनवरी-सितंबर 2024 में रेडियो पर टॉप 10 ब्रैंड्स में LIC हाउसिंग फाइनेंस, विमल पान मसाला, LIC जीवन उत्सव, मारुति सुजुकी एरीना, मणप्पुरम लोन अगेंस्ट गोल्ड, Acco जनरल ऑटो इंश्योरेंस, मलाबार गोल्ड एंड डायमंड्स, अलीशान, LIC और निसान मैग्नाइट शामिल थे। इन टॉप 10 ब्रैंड्स में से 3 ब्रैंड्स LIC ऑफ इंडिया से संबंधित थे, और 2023 की इसी अवधि की तुलना में 5 ब्रैंड्स इस सूची में नए शामिल हुए।

जनवरी से सितंबर 2024 के दौरान कारों की कैटेगरी में विज्ञापन सेकंडेज (ad second

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वरिष्‍ठ पत्रकार करण थापर ने बताई ‘INDIA TODAY’ से अलग होने की ये वजह...

वरिष्‍ठ पत्रकार और टेलिविजन एंकर करन थापर इंटरव्‍यू लेनी की अपनी विशिष्‍ट शैली के लिए जाने जाते हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 04 November, 2017
Last Modified:
Saturday, 04 November, 2017
Samachar4media


रुहैल अमीन ।।

वरिष्‍ठ पत्रकार और टेलिविजन एंकर करण थापर इंटरव्‍यू लेनी की अपनी विशिष्‍ट शैली के लिए जाने जाते हैं। वह सीधे-सीधे बिना लाग लपेट के बात करते हैं और सामने वाले को कई बार अपने तीखे सवालों से असहज भी कर देते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्‍यमंत्री थे, उस दौरान एक इंटरव्‍यू में करण थापर के सवालों से परेशान होकर वह उठ खड़े हुए थे। 

हाल ही में दिल्‍ली-एनसीआर में एक कार्यक्रम के दौरान हमें उनसे बात करने का मौका मिला, जहां हमने उनसे कई मुद्दों पर बातचीत की। जब हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस फेमस इंटरव्‍यू के बारे में पूछा तो उन्‍होंने बताया कि सवालों को दूसरे तरह से पूछकर इस तरह की स्थिति से बचा जा सकता था।  

थापर ने कहा, ‘मोदीजी बहुत भले व्‍यक्ति हैं। मुझे लगता है कि वह शायद इस बात से अपसेट थे, क्‍योंकि उन्‍होंने नहीं सोचा था कि मैं सवालों की शुरुआत ही वर्ष 2001-02 के बारे में करूंगा। मुझे लगता है कि चीजों पर घुमा-फिराकर भी बात की जा सकती है।’

अब तक कई राजनेताओं का इंटरव्‍यू कर चुके थापर से जब हमने उनके अनुभव का सार पूछा तो उनका कहना था, ‘मैं राजनेताओं की इस बारे में प्रशंसा करना चाहता हूं कि वे लगातार किसी भी विषय पर बोल सकते हैं और आप नहीं समझ सकते हैं कि वे कब चुप होंगे।’

थापर ने अपने उस इंटरव्‍यू के बारे में भी बात की जब मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी कपिल देव फूट-फूटकर रोने लगे थे। करण ने बताया, ‘यह 25 मिनट का इंटरव्‍यू था जिसे बिना ब्रेक के रिकॉर्ड किया गया था। कपिल ने 11वें मिनट में ही रोना शुरू कर दिया था और मेरे लिए यह काफी अजीब बात थी। पर मैंने उन्हें रोने से नहीं रोका क्योंकि कोई भी बड़े सेलिब्रिटी का इस तरह का व्यवहार होगा तो इंटरव्यू करने वाले को लगेगा कि ये चलता रहे । मैंने सोचा कि मुझे अपनी आवाज को और सौम्‍य करना चाहिए लेकिन कड़े सवाल पूछना जारी रखना चाहिए। इस दौरान कपिल देव करीब 15 मिनट तक रोते रहे।’

‘टू द प्वाइंट' नामक चर्चित शो होस्ट करने वाले करण थापर का अप्रैल में इंडिया टुडे चैनल पर आने वाला ये शो खत्म होने के बाद से अफवाह उड़ी हुई हैं कि उन्‍हें विभिन्‍न विषयों पर अपने राजनीतिक रुख को छोड़ने के लिए कहा गया था, जिसके चलते उनका शो ऑफएयर हो गया।

इन सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए करण ने बताया कि उनके और इंडिया टुडे प्रबंधन के बीच आखिर ऐसा क्‍या हुआ जिस वजह उन्‍हें अलग होना पड़ा।

करण थापर का कहना था, ‘यह शो ऑफ एयर नहीं किया गया है। इंडिया टुडे के साथ मेरा करार अप्रैल में खत्‍म हो गया था और हम दोनों ने ही आपसी सहमति से एक-दूसरे से अलग होने का फैसला किया था। मेरा करार टर्मिनेट नहीं किया गया था। इसमें कोई छिपाने वाली बात नहीं है कि विभिन्‍न विषयों पर हमारी अलग सोच थी।’

 

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जर्नलिज्म के कुछ सिद्धांत डिजिटल में लागू नहीं होते: कली पुरी, इंडिया टुडे ग्रुप

‘इंडिया टुडे समूह’ (ITG) में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (ब्रॉडकास्ट एंड न्यू मीडिया) कली पुरी की जिम्मेदारी...

Last Modified:
Monday, 30 October, 2017
Samachar4media

 रुहैल अमीन ।।

‘इंडिया टुडे समूह’ (ITG) में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (ब्रॉडकास्ट एंड न्यू मीडिया) कली पुरी की जिम्मेदारी बढ़ाकर हाल ही में उन्‍हें समूह का वाइस चेयरपर्सन नियुक्त किया गया है। नई जिम्‍मेदारी संभालने के साथ ही अब कली पुरी ‘आज तक’ (Aaj Tak) और ‘इंडिया टुडे’ (India Today) ब्रैंड को डिजिटल की दुनिया में नई पहचान देने में जुट गई हैं।  

इसके लिए तमाम तरह की कवायद की जा रही है। सात नए मोबाइल चैनलों की लॉन्चिंग से इस परिवर्तन की शुरुआत भी हो गई है। कली पुरी का मानना है कि आज के समय में नई-नई तकनीक मीडिया घरानों के लिए प्रासंगिक बने रहने के लिए आकर्षक अवसर बन गई हैं। उनका मानना है कि ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ इस बदलाव का नेतृत्‍व कर रहा है।

एक बातचीत के दौरान कली पुरी ने मोबाइल जर्नलिज्‍म की प्रासंगिता के साथ ही सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म्‍स से मिल रही टक्‍कर और फर्जी न्‍यूज (fake news) समेत ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के लिए अपने विजन के बारे में काफी विस्‍तार से जानकारी दी। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

‘मोबाइल जर्नलिज्‍म’ (Mojo) प्‍लेटफॉर्म तैयार करने के लिए निवेश करने और इस समय सात नए मोबाइल चैनल लॉन्‍च करने के लिए आपको किसने प्रेरित किया ?

आजकल स्‍मार्टफोन का जमाना है। इन दिनों अधिकांश लोग ऐंटरटेनमेंट और इंनफोर्मेशन के लिए स्‍मार्टफोन का ही इस्‍तेमाल ज्‍यादा कर रहे हैं। मेरा मानना है कि इस प्‍लेटफॉर्म के लिए कंटेंट तैयार न करना  ठीक नहीं है।

मीडिया के क्षेत्र में होने के नाते हमें अहसास हुआ कि यह आज के समय की जरूरत थी और हमें ये भी लगा कि लाखों लोग कंटेंट से जुड़ रहे हैं लेकिन उनकी पहली पसंद फोन प्‍लेटफॉर्म है। इसलिए हमारे लिए यह भी जरूरी था कि यदि हम इन ऑडियंस को अपने साथ बनाए रखना चाहते हैं तो हमें उनके पसंदीदा प्‍लेटफार्म पर जाकर उनसे जुड़ना होगा।

मीडिया की बात करें तो कई पारंपरिक माध्‍यम आज भी लोगों के लिए प्रासंगिक बने हुए है। ऐसे में क्‍या आपको लगता है कि भारतीय मार्केट मोबाइल जर्नलिज्‍म को अपनाने लायक परिपक्‍व हो गया है ?

मोबाइल जर्नलिज्‍म को लेकर मैं बहुत उत्‍साहित हूं। हमने अपने चैनलों में से एक चैनल ‘दिल्‍ली आज तक’ को पूरी तरह मोजो बनाने के लिए प्रयास किया था। हालांकि इसमें हमें सबसे बड़ी इस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है कि जब भी आप 45 मिनट के लिए लाइव होने का प्रयास करते हैं तो फोन काफी गर्म हो जाता है। इसमें बस यही सबसे बड़ी समस्‍या आ रही है। मुझे लगता है कि आने वाले समय में जो फोन आएंगे वे इससे बेहतर होंगे और हमें उस पर ज्‍यादा काम करने का मौका मिलेगा।

नई-नई डिवाइसें और टेक्‍नोलॉजी आने के बाद क्‍या न्‍यूज प्राप्‍त करने के तरीकों में कोई खास बदलाव दिखाई दिया है ?

आपकी बात सही है। इन दिनों जर्नलिज्‍म को देखने का तरीका पूरी तरह बदल रहा है। यह ऐसा नहीं है, जैसा हमने शुरुआत में अंदाजा लगाया था। जर्नलिज्‍म के कुछ सिद्धांत अथवा रूल्‍स  डिजिटल में अप्‍लाई नहीं होते हैं। लोग आपसे काफी कैजुअल होने की अपेक्षा रखते हैं। वे अपेक्षा करते हैं कि आप उनसे ज्‍यादा जुड़ेंगे और ज्‍यादा औपचारिक नहीं होंगे। मैं भी मानती हूं कि वे उम्‍मीद करते हैं कि चीजें सच्‍ची होंगी और उनमें ज्‍यादा बनावट नहीं होगी। इसके अलावा लोग यह भी अपेक्षा रखते हैं कि आप उन्‍हें तेजी से चीजों को ज्‍यों का त्‍यों दिखाएं।

सोशल मीडिया विभिन्‍न प्‍लेटफॉर्म्‍स को न्‍यूज उपलब्‍ध करा रही है । ऐसे में स्‍वतंत्र प्रकाशक किस प्रकार इसका लाभ उठा रहे हैं ?

यह सही है कि सोशल मीडिया पर न्‍यूज की खोज की जाती है लेकिन उसे किसी न किसी के द्वारा वहां पर डाला जाता है। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया खुद कोई न्‍यूज तैयार कर रही है। ज्‍यादातर ऐसा होता नहीं है कि सोशल मीडिया हैंडल्‍स पर आई एसी न्‍यूज जिसकी पुष्टि नहीं हुई हो उसे दोबारा से मुख्‍य न्‍यूज वेबसाइट्स पर चेक करने के लिए भेजा जाता हो कि क्‍या यह सही है। मुझे लगता है कि सोशल मीडिया आपकी जर्नलिज्‍म में एक और एलीमेंट जोड़ देता है और ऐसा प्‍लेटफॉर्म तैयार हो जाता है, जिसे आप इस्‍तेमाल कर सकते हैं। मुझे यह भी लगता है कि सोशल मीडिया ने हमें काफी सिखाया है और बदले में उसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला है।

‘फेसबुक’ को भी यह समझ आ गया है कि वे गणित (algorithms) पर न्‍यूजरूम नहीं चला सकते हैं और उन्‍हें एडिटर्स की भर्ती करनी पड़ी। हमने चुनाव के दौरान उनके साथ काम किया था और तब उन्‍हें महसूस हुआ कि वे कितनी सारी चीजों के बारे में नहीं जानते थे।    

मुझे लगता है कि हम लोग एंगेजमेंट लेवल को जानने के लिए डाटा पर बहुत भरोसा करते हैं। यह तो सिर्फ उन ‘algorithms’ पर काम करने के बारे में है जिससे चीजें अच्‍छी हो सकें और हमने इस पर काम कर काफी कुछ सीख लिया है। हम फेसबुक के बीटा पार्टनर्स में से एक हैं और समय के साथ हमने उनके प्लेटफार्म पर काम करने के बारे में बहुत कुछ सीख लिया है।

 मीडिया में डाटा का इस्‍तेमाल किस तरह किया जाता है ?

डाटा से हमें कई तरह की जानकारी मिल जाती है। जैसे कि लोग क्‍या पढ़ अथवा देख रहे हैं और उनकी संख्‍या कितनी है। इसके अलावा वेबसाइट पर कितने पेज व्‍यूज हैं। इसके द्वारा ऐडवर्टाइजर्स भी काफी प्रभावित होते हैं और इन डाटा के आधार पर निर्णय लेते हैं। हमारा काम ये सुनिश्चित करना है कि हम डाटा का इस्‍तेमाल एक इंडिकेटर के रूप में करें लेकिन उस पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। इसके साथ ही यह भी बहुत जरूरी है कि हम इसके लिए अपनी तरफ से भी कोई व्‍यवस्‍था अपनाएं।

 न्यूज में तेजी (need for speed) और न्‍यूज की क्रेडिबिलिटी पर काफी बहस हो चुकी है। आप अपने न्‍यूजरूम में इन दोनों में कैसे तालमेल बिठा रही हैं ?

हम बहुत ही पत्रकारितावादी संस्‍थान हैं और हम अपनी पत्रकारिता को काफी गंभीरता से लेते हैं। पत्रकारिता को मुक्‍त ओर निष्‍पक्ष रहने की जरूरत है। हमारे संस्‍थान में प्रत्‍येक न्‍यूज एसाइनमेंट डेस्‍क के हाथ में होती है। प्रसारण से पूर्व एसाइनमेंट डेस्‍क इस न्‍यूज की काफी जांच पड़ताल करती है। एक बार उस खबर की पुष्टि हो जाने के बाद ही हम उसे प्रसारित करते हैं। यहां तक कि हमारी डिजिटल साइट पर भी कोई भी न्‍यूज बिना असाइनमेंट डेस्‍क से पास हुए नहीं लगती है। हमारे लिए स्‍पीड से ज्‍यादा क्रेडिबिलिटी म‍हत्‍वपूर्ण है। आज के समाचार जगत में यह बहुत जरूरी है कि आप सही न्‍यूज दिखाएं और आपकी क्रेडिबिलिटी बनी रहे।

आपको ‘इंडिया टुडे’ ग्रुप का नया वाइस चेयरपर्सन बनाया गया है। ऐसे में आपकी प्राथमिकताएं क्‍या हैं ?  

मेरी सबसे पहली प्राथमिकता ये सुनिश्चित करना है कि हमें जो भी नई संभावनाएं और नए अवसर मिल रहे हैं, हम उन सभी को अपनाने के लिए तैयार हैं। मुझे लगता है कि हम चीजों को एक जगह एकत्रित करने की प्रक्रिया को पूरा कर चुके हैं और अब हम स्थिर जगह पर हैं। यहां से हम आगे के लिए छलांग लगा सकते हैं। सात नए डिजिटल चैनलों की लॉन्चिंग इस दिशा में उठाया गया पहला कदम है। हम ‘आज तक’ और ‘इंडिया टुडे’ ब्रैंड को डिजिटल की ओर ले जा रहे हैं।

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डिजिटल मीडिया तूफान है, सबको उड़ा देगा, इसका अंत विनाशकारी होगा: परेश नाथ

‘दिल्‍ली प्रेस’ (Delhi Press) के पब्लिशर परेश नाथ ने डिजिटाइजेशन के दौर में सामने आ रहीं चुनौतियों के साथ-साथ प्रिंट और डिजिटल के भविष्‍य को लेकर भी विस्‍तार से चर्चा की...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 28 October, 2017
Last Modified:
Saturday, 28 October, 2017
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निशांत सक्‍सेना ।।

इन दिनों डिजिटल मीडिया का प्रभाव जोरों पर है और यह लगातार बढ़ता ही जा रहा है। किसी भी तरह का कंटेंट यहां आसानी से उपलब्‍ध है। ऐसे में प्रिंट मीडिया के समक्ष चुनौती बनी हुई है। इस बारे में ‘दिल्‍ली प्रेस’ (Delhi Press) के पब्लिशर परेश नाथ ने डिजिटाइजेशन के दौर में सामने आ रहीं चुनौतियों के साथ-साथ प्रिंट और डिजिटल के भविष्‍य को लेकर भी विस्‍तार से चर्चा की। इसके अलावा उन्‍होंने दिल्‍ली प्रेस में अपने चार दशक से ज्‍यादा के अनुभवों को भी हमसे साझा किया। प्रस्‍तु‍त हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने बचपन से ही प्रेस की कार्यप्रणाली देखी है, तब से लेकर अब तक कितना बदलाव आया है?

मैंने दिल्‍ली प्रेस के साथ वर्ष 1970 से काम शुरू कर दिया था। इसके बाद धीरे-धीरे मैंने एडिटोरियल डिपार्टमेंट का जिम्‍मा संभाल लिया। 70 के दशक में हम बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उस दौरान कुछ समय के लिए मार्केट की स्थिति ज्‍यादा अच्‍छी नहीं थी, जब कवर प्राइस बढ़ गया था। हालांकि उस दौरान ग्रोथ में थोड़ी गिरावट आई थी, अन्‍यथा सर्कुलेशन लगातार बढ़ रहा था। जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी घोषित की थी, तब सेंसर डिपार्टमेंट को भेजने से पहले मैं खुद अंतिम प्रिंट पढ़ता था। मैगजीन में ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन दिनों प्रतिबंधित था।  इमरजेंसी के दौरान हमने ‘इंदिरा गांधी’ शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं किया था। हम उस दौरान इंदिरा गांधी के पक्ष में अथवा विरोध में कुछ भी नहीं कहते थे। हम उनके बारे में कुछ भी नहीं कहते थे। इस तरह हमने अपना विरोध दर्ज कराया था। हालांकि यह काफी कम था लेकिन हम इतना ही कर सकते थे। इमरजेंसी के दौरान भी हमारा बिजनेस कम नहीं हुआ था और इससे सर्कुलेशन पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। कॉमर्शियल ऐडवर्टाइजमेंट भी ठीक-ठाक थे और हम सरकारी ऐडवर्टाइजमेंट पर ज्‍यादा निर्भर नहीं थे।  

सरिता काफी लोकप्रिय मैगजीन थी, दिल्‍ली प्रेस के लिए यह किस तरह फायदेमंद साबित हुई ?

सरित मैगजीन वर्ष 1945 में शुरू हुई थी। हमें सरिता में विज्ञापन मिलने शुरू हो गए थे और यह पूरी तरह सफल मैगजीन थी। वर्ष 1952-53 या शायद उससे पहले की बात है जब हमें हिन्‍दुस्‍तान यूनिलीवर से विज्ञापन मिले थे। 1962 के कुछ इश्‍यू में तो सरिता के हिन्‍दी एडिशन में करीब 100 पेज के विज्ञापन मिले थे। यह उस समय की महंगी मैगजीन में से एक थी। वर्ष 1945 में जब यह लॉन्‍च हुई थी तब इसकी कॉपी की कीमत एक रुपये थी और इसने इसी कवर प्राइस पर काफी समय तक बिक्री की।

यदि मैगजीन के फ्यूचर की बात करें तो यह काफी बहस वाला टॉपिक है। दिल्‍ली प्रेस के लिए यह कैसे चल रहा है ?

तीन-चार साल पहले तक हम लगातार आगे बढ़ रहे थे लेकिन इसके बाद से सर्कुलेशन में स्थि‍रता आने लगी। डिजिटाइजेशन ने दुनियाभर के पब्लिकेशंस के लिए और परेशानियां पैदा कर दीं और यह काफी चिंता का कारण है लेकिन मैंने प्रिंट पर अपना भरोसा बनाए रखा है। हम किसी रेत पर नहीं लिख रहे हैं, हम ऐसी चीज पर सामग्री छापते हैं जो सॉलिड है और इसे सौ साल बाद भी पढ़ा जा सकता है। यदि डिजिटल मीडिया की बात करें तो यह एक तूफान की तरह है, यह सब चीजों को उड़ा देगा और इसका अंत विनाशकारी होगा।

बदलते समय में दिल्‍ली प्रेस खुद को कैसे बदलेगी?

एक बार जब आपको महसूस हो जाता है कि आप इस तूफान का सामना नहीं कर सकते हैं तो कुछ उपाय अपनाने पड़ते हैं। यही चीजें दुनियाभर में प्रिंट मीडिया कर रहा है। आजकल ‘गूगल’, ‘फेसबुक’ और‍ ‘ट्विटर’ ने सभी लोगों के बीच अपनी पहुंच बना ली है। इस प्‍लेटफॉर्म को बढ़ाने के लिए वे काफी खर्च भी कर रहे हैं। हालांकि कई लोग इस पर फर्जी नाम से भी लिखते हैं, कुछ अपना नाम छिपाकर लिखते हैं, यानी आप उनकी पहचान नहीं कर सकते हैं। लेकिन प्रिंट इस मामले में भरोसेमंद रहता है।

यदि प्रिंट मीडिया की बात करें तो इसमें 140 शब्‍दों की सीमा में कुछ भी नहीं हो सकता है। हमारी तो हेडलाइंस भी काफी ज्‍यादा लंबी होती हैं।

हालांकि, पारंपरिक मीडिया के लिए प्रिंट राजस्व का एक बड़ा स्रोत बना रहता है, आपको क्‍या लगता है, यह स्थिति कब तक चलेगी?

हमें इस बात को समझना होगा कि प्रिंट तभी तक बचा रह पाएगा, जब तक कोई इसमें पैसा लगाएगा। यदि लोग सभी चीजें डिजिटल में चाहने लगेंगे तो प्रिंट जल्‍दी खत्‍म हो जाएगा। तब आप 500 पेज की किताब नहीं पढ़ पाएंगे।

प्रिंट को जीवित रखने में क्‍या ग्रामीण क्षेत्र की आबादी से कुछ मदद मिल सकती है ?

नहीं, हमें शहरी क्षेत्र के लोगों के साथ जाना है। पूरी दुनिया में शहरी आबादी तक आसानी से पहुंच बनाई जा सकती है। आप ग्रामीण क्षेत्रों में प्रिंट को पहुंचा तो सकते हैं लेकिन वहां आप इसे बेच नहीं सकते क्‍योंकि सभी जगह ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की खरीदने की क्षमता इतनी नहीं होती है। लेकिन इंटरनेट के साथ ऐसा नहीं है। इसे कहीं से भी एक्‍सेस किया जा सकता है, यह काम प्रिंट नहीं कर सकता है।

आजकल जब ऑनलाइन पर अधिकांश कंटेंट फ्री है, ऐसे में दिल्‍ली प्रेस के लिए भुगतान के क्‍या मायने हैं?

देखिए, शुरुआत में जब ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्‍यू नहीं था, तब भी मैं ऑनलाइन के पक्ष में नहीं था। जब तक डिजिटल मैगजीन न्‍यूजस्‍टैंड हमारी मैगजीन को बेच रहे हैं, तब कोई समस्‍या नहीं है लेकिन हम ऑनलाइन जाकर फ्री कंटेंट उपलब्‍ध कराने के पक्ष में नहीं हैं।

 विभिन्‍न ऑनलाइन न्‍यूज प्‍लेटफॉर्म्‍स सीरियस कंटेंट का निर्माण कर रहे हैं। क्‍या आपको लगता है कि यह प्रिंट मीडिया का विकल्‍प हो सकता है ?

समाज में कम्‍युनिकेशन के कई तरीके हैं। जैसे हम प्रिंट के द्वारा किसी से संवाद करते हैं। इसके अलावा हम बातचीत के द्वारा भी दूसरों से संवाद करते हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि प्रिंट सिर्फ इसी वजह से डाउन हो जाएगा क्‍योंकि हम वक्‍ताओं को भुगतान कर रहे हैं।

डिजिटल प्‍लेटफॉर्म्‍स सिर्फ सनसनीखेज पत्रकारिता है, यह गंभीर पत्रकारिता नहीं है, लेकिन प्रिंट एक तरह से कछुए की तरह है। यह काफी धीमी तो है लेकिन ज्‍यादा लंबे समय तक चलने वाली है। यदि किसी वेबसाइट पर कोई गंभीर आर्टिकल है भी तो भी उसकी लाइफ ज्‍यादा नहीं है यानी वे ज्‍यादा लंबे समय तक चलने वाला नहीं है।   

‘कारवां’ को चलाना कितना मुश्किल था ?

यह वाकई में बहुत मुश्किल था। लेकिन अब मेरा मानना है कि यह किसी न किसी रूप में मौजूद रहेगी ही। इसलिए इसको लेकर डर वाली कोई बात नहीं है। भारत में जब 1857 की क्रांति हुई थी तो लंदन के अखबारों में यह खबर आठ हफ्ते बाद आई थी। उन दिनों में भी अखबार की 50000 कॉपी बिकी थीं। इसका मतलब लोगों ने खबरें पढने के लिए भुगतान किया था और न्‍यूज आर्गनाइजेशन ने भारत में संवाददाता रखने पर पैसा खर्च किया था। क्‍या कोई डिजिटल साइट इतना खर्च वहन कर सकती है?

 

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इस तरह रेडियो इंडस्‍ट्री को और ऊंचाई तक ले जाना चाहती हैं अनुराधा प्रसाद

प्रिंट, टेलिविजन और रेडियो के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा कर रही ‘बीएजी फिल्‍म्‍स’...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 October, 2017
Last Modified:
Wednesday, 11 October, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

प्रिंट, टेलिविजन और रेडियो के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा कर रही ‘बीएजी फिल्‍म्‍स’ (BAG FILMS) की चेयरपर्सन-मैनेजिंग डायरेक्‍टर और ‘एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया’ (AROI) की प्रेजिडेंट अनुराधा प्रसाद इंडस्‍ट्री से संबंधित मुद्दों के निस्‍तारण के लिए योजना तैयार करने में जुटी हुई हैं।

हमारी सहयोगी मैगजीन ‘इंपैक्‍ट’ (IMPACT) ने उनसे इस विषय पर विस्‍तार से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:    

‘AROI’ के प्रेजिडेंट के रूप में आपकी प्राथमिकताएं क्‍या हैं?

मैं चाहती हूं कि इंडस्‍ट्री से जुड़े जितने भी मुद्दे अथवा समस्‍याएं हैं, उनका निस्‍तारण व्‍यवस्थित तरीके से होना चाहिए। यह भी सुनिश्चित करना है कि छोटे ऑपरेटर्स को भी पर्याप्‍त महत्‍व मिले। इसके अलावा हम इंडस्‍ट्री की ग्रोथ पर भी ध्‍यान देंगे, खासकर छोटे इलाकों पर ज्‍यादा फोकस किया जाएगा। इसके अलावा प्रिंट, टेलिविजन और रेडियो के लिए एक बेहतर मार्केट तैयार करना है।

फिलहाल आपके समक्ष क्‍या चुनौतियां हैं? 

हमें ऐसा कॉपीराइट बोर्ड स्थापित करना है, जिससे कि कॉपीराइट संशोधन अधिनियम के अनुसार म्‍यूजिक के लिए वैधानिक लाइसेंस जारी किया जा सके। इसके द्वारा म्‍यूजिक और रेडियो इंडस्‍ट्री के बीच लंबे समय से चली आ रही मुकदमेबाजी और विवादों को खत्‍म किया जाएगा। खासकर रॉयल्‍टी के माध्‍यम से छोटे रेडियो स्‍टेशनों की मदद की जाएगी।

हमारे समक्ष एक और बड़ी चुनौती है कि ‘डीएवीपी’ और निजी ऐडवर्टाइजर्स द्वारा रेडियो स्‍टेशनों को समय से भुगतान किया जाना सुनिश्चित करना है। इसके अलावा फेज-तीन की नीलामी की सफलता सुनिश्चित करने के लिए हम सरकार से न्‍यूनतम रिजर्व प्राइज ज्‍यादा रखने की नीति पर पुनर्विचार करने के लिए भी कहेंगे। एक और चुनौती है कि हमें स्‍पोर्ट्स, न्‍यूज और करेंट अफेयर्स की अनुमति देकर निजी रेडियो पर कंटेंट की बैंडविथ को और बढ़ाना है।

रेडियो को और कमाऊ बनाने के लिए आपके पास क्‍या योजना है?   

हम चाहते हैं कि सरकारी निकायों ‘BECIL’ आदि की तरह ‍सरकारी निकायों द्वारा रेडियो स्‍टेशन लगाने की दिशा में तेजी आए। आमतौर पर इस तरह के कामों में जितनी देरी होती है, लागत बढ़ती जाती है। इसके अलावा रेडियो के लिए एक विश्‍वसनीय ‘Listnership measurement systems’ भी तैयार किए जाने की जरूरत है। वहीं, रेडियो के पास इसके टेलिकॉम ऑपरेटर्स के लिए भुगतान के लिए ‘वनटाइम एंट्री फीस’ (OTEF) का ऑप्‍शन भी होना चाहिए। इस समय जो सिस्‍टम है उससे ज्‍यादा आर्थिक दबाव बढ़ जाता है और ब्‍याज भी लगती है।    

फेज-3 की पॉलिसी के अनुसार देश में किसी भी ऑपरेटर के लिए स्‍टेशनों की सीमा 15 प्रतिशत तय की गई है। हालांकि किसी शहर के लिए यह 40 प्रतिशत है। ऐसे में ऑपरेटर्स छोटे शहरों अथवा कस्‍बों में निवेश करने से बचते हैं। क्‍योंकि वे बड़े शहरों में ज्‍यादा स्‍टेशन लगाना चाहेंगे क्‍योंकि वहां 15 प्रतिशत की सीमा है। ऐसे में यह सीमा एकसमान होनी चाहिए। ऐसे में नीलामी में ज्‍यादा प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ेगी और सरकार को ज्‍यादा रेवेन्‍यू मिलेगा।

 

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किस तरह 18 महीनों में ‘Network18 Digital’ ले सका अपना स्वरूप, पढ़ें यहां...

'नेटवर्क18 डिजिटल’ (Network18 Digital) के सीईओ...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 October, 2017
Last Modified:
Wednesday, 11 October, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।


'नेटवर्क18 डिजिटल’ (Network18 Digital) के सीईओ मनीष माहेश्‍वरी का कहना है कि एडिटोरियल इनोवेशन और बिजनेस को ध्‍यान में रखते हुए समूह के फ्लैगशिप प्रॉडक्‍ट जैसे- ‘News18.com’, ‘Firstpost’ और ‘Moneycontrol’ के द्वारा ऑनलाइन मीडिया जगत में हलचल मचा दी है।


उनका कहना है कि हालांकि ‘वेब18’ (नेटवर्क18 डिजिटल का पुराना नाम) की डिजिटल प्रॉपर्टी लंबे समय से चल रही थीं और काफी ऊपर थीं लेकिन पिछले 18 महीने काफी मुश्किलों भरे रहे। इस दौरान न सिर्फ मैनेजमेंट में बड़ा बदलाव हुआ बल्कि क्षेत्रीय स्‍तर पर ‘नेटवर्क18 डिजिटल’ के विस्‍तार के साथ-साथ विभिन्‍न प्रॉपर्टीज को एक छत के नीचे लाने को लेकर भी काफी उथल-पुथल रही।


ऑडियंस, ब्रैंड्स और कंज्‍यूमर बिहेवियर आदि को मापने वाली प्रमुख कंपनी ‘कॉमस्‍कोर’ (comScore) के आंकड़ों का हवाला देते हुए माहेश्‍वरी ने बताया, ‘टाइम्‍स नेटवर्क और एनडीटीवी के बाद नेटवर्क18 डिजिटल देश का तीसरा सबसे ज्‍यादा देखा जाने वाला डिजिटल मीडिया नेटवर्क है। इसके 50 मिलियन से ज्‍यादा यूनिक विजिटर्स हैं। कंपनी की ग्रोथ की कहानी के दो हिस्‍से हैं। इनमें पहला एडिटोरियल और दूसरा बिजनेस है जो एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी कि हम खुद को फ्यूचर ओरिएंटेड कंपनी के रूप में स्‍थापित करें और इसी के बाद हमने इसे ‘वेब18’ से ‘नेटवर्क18 डिजिटल’ के रूप में रीब्रैंड किया। इन दिनों डिजिटल का मतलब सिर्फ वेब से नहीं है बल्कि इसमें कई तरह की डिजिटल सेवाएं शामिल हैं।


 

एडिटोरियल पर है खास ध्‍यान (THE BIG EDITORIAL AMBITION)

 

संतोष मेनन ने जब ‘नेटवर्क18 डिजिटल’ के चीफ कंटेंट ऑफिसर का कार्यभार संभाला था, उस समय नेटवर्क के टीवी चैनलों के लिए सिर्फ यही एक ऑनलाइन डेस्टिनेशन था। उस समय सबसे महत्‍वपूर्ण काम कंपनी को डिजिटल की पहचान देनी थी।


मेनन का कहना है, ‘मनीकंट्रोल’ शुरुआत में ‘सीएनबीसी’ (CNBC) के लिए लैंडिंग साइट थी। इसी तरह ‘IBN Live’ और ‘News18’ भी ‘CNN News18’ और बाद में ‘CNN IBN’ के लिए लैंडिंग साइट से ज्‍यादा नहीं थीं। लेकिन आज चीजें पूरी तरह बदल चुकी हैं। टीवी न्‍यूजरूम आदि के लिए भी हम डिजिटल का इस्‍तेमाल कर रहे हैं।’ कंटेंट पर ज्‍यादा फोकस करने के लिए ही कंपनी ने अपने यहां एडिटोरियल के कई धुरंधरों को नियुक्‍त किया है। इनमें ‘Moneycontrol’ के एडिटर संतोष नायर, ‘Firstpost’ के एडिटर बीवी राव और ‘News18.com’ के एडिटर प्रवीण थांपी शामिल हैं। इसके अलावा इसमें राजनीतिक विश्‍लेषक संजय बारू, क्रिकेट जर्नलिस्‍ट प्रेम पनिकर और फिल्‍म आलोचक अन्ना एमएम वेट्टिकैड्स आदि शामिल हैं, जो नियमित रूप से अपना योगदान देते रहते हैं।


मेनन का कहना है, ‘शुरू से ही हमारी योजना थी कि हमारा एडिटोरियल पक्ष काफी मजबूत होना चाहिए। इसके अलावा ब्रेकिंग स्‍टोरीज के लिए डिजिटल प्‍लेटफॉर्म तैयार करना था। आज के समय में हम स्‍टोरी ब्रेक करते हैं और इसके बाद टीवी इसे वहां से उठाकर चलाता हैं। पिछले साल विधानसभा चुनाव के दौरान भी हमने यही किया था। उस समय ‘फेसबुक’ ने अपना लाइव विडियो शुरू किया था और हमने इस पर ‘Decode 2016’ नाम से पांच घंटे का डिजिटल कार्यक्रम Digicast किया था। उस समय इंडस्‍ट्री में ऐसा पहली बार किया गया था।’

 

ब्रैंड को मजबूत बनाना (STRENGTHENING THE BRANDS)


उस समय मनीष माहेश्‍वरी और उनकी नई टीम के पास सबसे बड़ा काम अपनी विशेषज्ञता और रिसोर्स से ब्रैंड को एक नई पहचान दिलाने के साथ ही उसे मार्केट में कंप्‍टीशन के लिए खड़ा करना था।


‘Moneycontrol.com’ को नए लोगो के साथ दोबारा लॉन्‍च किया गया था जबकि ‘Firstpost’ को हिन्‍दी में लॉन्‍च किया गया था और इसे अपना नया इनहाउस स्‍टूडियो भी मिला था। उस समय सबसे बड़ा निर्णय इन सभी न्‍यूज बेवसाइट को ‘News18.com’ के बैनर तले लेकर आना था।


माहेश्‍वरी का कहना है, ‘अपने ब्रैंड को मजबूती प्रदान करने के लिए हमने कुछ खास बदलाव किए थे, इनमें से एक यह भी था कि हम अपनी सभी डिजिटल न्‍यूज प्रॉपर्टीज को एक बैनर के तहत लेकर आए थे। यह कदम आसान नहीं था क्‍योंकि जब कोई भी कंपनी इस तरह का साहसी कदम उठाती है तो इसे एक कमी के रूप में माना जाता है। हमारे साथ ऐसी स्थिति नहीं थी। काफी कठिन मेहनत के बाद हम पहले से बेहतर करने में सक्षम रहे और ‘News18’ को नंबर दो की स्थिति में ले आए। हमने ‘Firstpost’ को भी हिन्‍दी में लॉन्‍च किया और यह अपनी तरह का पहला इनहाउस डिजिटल न्‍यूजरूपम था।


‘Moneycontrol’ को एक नया लोगो दिया गया और इसके कंटेंट में भी बहुत ही परिवर्तन किया गया।’ इसके अलावा बिजनेस को धार देने के लिए कंपनी ने एक साल के भीतर अपने तीनों ब्रैंड्स के लिए बिजनेस हेड की नियुक्ति भी की। इसके तहत राजीव सिंह को ‘फ्लिपकार्ट’ से लोकर ‘News18’ का बिजनेस हेड बनाया गया, वहीं अजीम ललानी को ‘Firstpost’ का बिजनेस हेड बनाने के साथ ही गौतम शेलार को ‘Moneycontrol’ के पूरे बिजनेस की कमान सौंपी गई।      

 

मुद्रीकरण का भी रखा ध्‍यान (KEEPING MONETIZATION IN MIND)


जब नए मैनेजमेंट ने कार्यभार संभाला था तो उस समय रेवेन्‍यू जुटाना सबसे बड़ी चुनौती थी क्‍योंकि उस समय सब चीजें सही नहीं चल रही थीं। ऐसे में ऐडवर्टाइजर्स का ध्‍यान आकर्षित करने के लिए पूरी तरह नई योजना बनाई गई, जो पहले की तुलना में नए मुद्रीकरण के अवसर बनाए। 


माहेश्‍वरी ने बताया, ‘हमने महसूस किया कि साधारण दिखाई देने वाले विज्ञापन ज्‍यादा सही काम नहीं कर रहे थे। हमारे क्‍लाइंट इससे भी ज्‍यादा चाहते थे। इसके लिए हमें ऐसा मॉडल तैयार करना था जो विभिन्‍न प्‍लेटफॉर्म्‍स के द्वारा इन्‍वेंट्री ला सके और ब्रैंडेड कंटेंट सॉल्‍यूशंस भी दे सके। ऐसे में टेक और कंटेंट ने मिलकर काम किया ताकि ऐडवर्टाइजर का ध्‍यान आकृष्‍ट किया जा सके।’


‘Moneycontrol’ के लिए सबस्क्रिप्‍शन मॉडल को शामिल करना बिजनेस के लिए एक मील का पत्‍थर साबित हुआ। इससे एक छोटे प्रीमियन के लिए बिजनेस रिसर्च और स्‍टॉक रिपोर्ट मिलती है। ‘ComScore Data’ के अनुसार, न्‍यूज की बात करें तो रीडरशिप और डाउनलोड में ‘Moneycontrol’ को ‘इकनॉमिक टाइम्‍स’ और ‘याहू फाइनेंस’ से भी आगे रखा गया है।


‘Moneycontrol’ के भविष्‍य के बारे में गौतम शेलार ने कहा, ‘हमारा पोर्टफोलियो और डाटा ऐसा है कि लाखों लोग इस प्‍लेटफॉर्म पर हैं। जून में तो हमने अपने सभी प्रति‍द्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। आने वाले महीनों में, हम अपने पोर्टफोलियो का एडवांस वर्जन तैयार कर रहे हैं। हम म्‍यूचुअल फंड ट्रांजेक्‍शन प्‍लेटफॉर्म ला रहे हैं। इस कवायद का उद्देश्‍य बिजनेस और इनवेस्टिंग कम्‍युनिटी में अपनी लीडरशिप पोजीशन को मजबूत करना है।’


‘News18’ और ‘Firstpost’ की कहानी में अच्‍छा भी रहा है। एक ओर दोनों में से किसी के लिए सबस्क्रिप्‍शन का कोई जिक्र नहीं है, वहीं भाषाओं के मामले में प्रादेशिक को विस्‍तार दिया गया है और कमाई के लिए कई सब-ब्रैंड्स भी शमिल किए गए हैं। सिंगल वेब इन्‍वेंट्री से लेकर अब हम अपने मोबाइल की मौजूदगी को भुनाने के लिए आगे बढ़ चुके हैं। तीन प्रमुख ब्रैंड्स के अलावा हमारे पास ‘Cricket Next’ जैसे सब ब्रैंड भी शामिल हैं। ये अपनी स्‍पॉन्‍सरशिप खुद तैयार करते हैं और इसके बाद ‘News18’ एप से आने वाले ऐड रेवेन्‍यू को उसमें शामिल कर देते हैं। हमारे पास ‘Compare India’ भी है, जहां पर हम  कंज्‍यूमर इलेक्‍ट्रोनिक्‍स का तुलनात्‍मक विश्‍लेषण करते है और इनमें से प्रमुख को ई-कॉमर्स साइट पर भेज देते हैं। ‘फेकिंग न्‍यूज’ और ‘टेक 2’ के पास अपने ऐडवर्टाइजर्स है, जिससे हमें रेवेन्‍यू जुटाने के लिए कई अवसर मिलते हैं।


रीजनल को आगे बढ़ाना और विडियो कंटेंट (REGIONAL EXPANSION & VIDEO CONTENT)


हिन्‍दी और अंग्रेजी के अलावा ‘News18.com’ तीन प्रादेशिक भाषाओं- गुजराती, उर्दू और बंगाली में भी कंटेंट उपलब्‍ध कराती है। आने वाले समय में इसकी योजना 13 भाषाओं में कंटेंट उपलब्‍ध कराने की है।


प्रादेशिक स्‍तर पर अपने विस्‍तार की योजनाओं के बारे में राजीव सिंह का कहना है, ‘हमें इसकी शुरुआत किए अभी एक साल से थोड़ा ही ज्‍यादा समय हुआ है, फिर भी यूनिक विजिटर्स के मामले में हम तीसरे नंबर पर खड़े हुए हैं। समय के साथ यह प्‍लेटफॉर्म पांच भाषाओं में उपलब्‍ध है। जल्‍द ही हम 13 भाषाओं में कंटेंट उपलब्‍ध कराकर ‘News18’ को मल्‍टीलैंग्‍वेज हब बनाने वाले हैं।’ ‍


इसी तरह, ‘फर्स्‍टपोस्‍ट’ हिन्‍दी में पिछली साल लॉन्‍च की गई थी और इसे क्षेत्रीय विस्‍तार दिया जा रहा है। ब्रैंड के लिए वि‍डियो कंटेंट पर भी ध्‍यान दिया जा रहा है। विडियो कंटेंट के महत्‍व के बारे में अजीम ललानी ने कहा, ‘देश के उभरते हुए टॉप 10 डिजिटल न्‍यूज पब्लिशर्स में से एक होने के नाते यह बहुत जरूरी है कि हम अपने दर्शकों की सही नस पर हाथ रख रहे हैं। अपने पोर्टफोलियो को और आगे बढ़ाते हुए हमने इस साल बॉलिवुड कारपूल ‘Caroake’ लॉन्‍च किया था। इसमें बॉलिवुड स्‍टारों ने हमारे पत्रकारों से खरी-खरी बात की जिसका हमारे दर्शकों ने भरपूर आनंद उठाया।’  

 

रिलांयस इंडस्‍ट्रीज की दखलअंदाजी नहीं (THE CHINA WALL WITH RELIANCE INDUSTRIES)


अपनी मूल कंपनी ‘रिलायंस इंडस्‍ट्रीज’ के दखल की बात से इनकार करते हुए मेनन ने कहा कि दोनों कारोबार के बीच एक मजबूत दीवार है। इस तरह की पॉलिसी बनाई गई हैं जिससे पत्रकारों के काम में हस्‍तक्षेप नहीं होता है और उन्‍हें काम करने में किसी भी प्रकार की दिक्‍कत नहीं होती है। इससे रिलायंस के बिजनेस हितों से कोई लेना-देना नहीं है। इन पॉलिसियों के अनुसार, वे हमारे साथ किसी भी अन्‍य मीडिया कंपनी की तरह पेश आएंगे और हम भी उनके साथ किसी कॉरपोरेट घराने की तरह ही व्‍यवहार करेंगे। मीडिया में कॉरपोरेट निवेश ग्‍लोबल स्‍तर पर है, जिसने इसे एक स्तर का खेल बना दिया है और हम इससे अलग नहीं हैं।

 

आगे का सफर (THE WAY AHEAD...)


माहेश्‍वरी का दावा है कि ‘Network18 Digital’ ने विभिन्‍न प्‍लेटफॉर्म्‍स पर तीन अंकों की वृद्धि देखी है और इसके रेवेन्‍यू में भी इजाफा हुआ है। इस समय परिचालन और ब्रैंड वैल्‍यू बढ़ाने के लिए अनुकूल समय है, जो इस समय ‘Network18’ की कुल वैल्‍यू का आठ प्रतिशत है। इसके अलावा कंपनी बड़ी मीडिया एजेंसियों से जुड़ाव पर भी ध्‍यान दे रही है।


इस बारे में माहेश्‍वरी का कहना है, ‘जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है। हम भविष्‍य को देखकर आगे बढ़ने वाले संस्‍थान हैं और अपने इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए हमने कई रेवेन्‍यू लाइन तैयार की हैं। हमने एक सेंट्रल एजेंसी टीम तैयार की है जो देश भर की टॉप 10 मीडिया एजेंसियों से समन्‍वय स्‍थापित करती है जिससे हम एक ही स्‍थान पर अपनी डिजिटल प्रॉपर्टी को उपलब्‍ध करा सकें। आखिर में यही कहना चाहूंगा कि यह साल हमारे लिए काफी अच्‍छा रहा है और नोटबंदी व जीएसटी के बावजूद हमारे रेवेन्‍यू में वृद्धि हुई है। यह हमारी बेहतरीन योजनाओं का ही नतीजा है।’


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डिजिटल के इस दौर में क्यों कम नहीं होगी टीवी की व्‍युअरशिप, बताया ‘Viacom 18’ के सीओओ राज नायक ने...

इन दिनों डिजिटल का जमाना है और इसकी व्‍युअरशिप में भी वृद्धि देखी जा रही है, लेकिन टेलिविजन की भी...

Last Modified:
Friday, 06 October, 2017
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रुहैल अमीन ।।

इन दिनों डिजिटल का जमाना है और इसकी व्‍युअरशिप में भी वृद्धि देखी जा रही है, लेकिन टेलिविजन की भी अपनी अहमियत बनी हुई है और यह अभी भी बड़ी संख्‍या में लोगों से जुड़ने का माध्‍यम बना हुआ है। कई नए जॉनर (genres) शुरू होने के साथ ही बड़े स्‍पॉन्‍सर और सेलिब्रिटी पॉवर होने के कारण टीवी की व्‍युअरशिप पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है।

हमारी सहयोगी बेवसाइट ‘एक्‍सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ खास बातचीत में ‘वायकॉम 18’  (Viacom 18) के सीओओ राज नायक का कहना है कि डिजिटल बूम व नए प्‍लेटफॉर्म्‍स के आने के बावजूद टीवी का क्रेज कभी खत्‍म नहीं होगा। इसके अलावा भी उन्‍होंने विभिन्‍न मुद्दों पर अपनी राय व्‍यक्‍त की। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

टेलिविजन के पीछे खिसकने के कारणों के पीछे आमतौर पर डिजिटल की व्‍युअरशिप में हुए इजाफे को बताया जाता है। आपका इस बारे में क्‍या कहना है?

चाहे हम अमेरिका की बात करें अथवा इंडिया की, टीवी की व्‍युअरशिप बढ़ती जा रही है। इस बारे में जो प्रचारित किया जा रहा है, स्थिति उससे विपरीत है। टीवी ने देश के 180 मिलियन घरों में ‍अपनी पहुंच बना रखी है और उम्‍मीद है कि जल्‍द ही 250 मिलियन और घरों में टीवी की पहुंच बढ़ जाएगी। यही नहीं, यह भी कहा जा रहा है कि लाखों लोग टीवी से दूर होते जा रहे हैं। जबकि सच्‍चाई ये है कि यदि आप अच्‍छा कंटेंट देंगे तो लोग आपकी ओर जरूर ध्‍यान देंगे। यदि उन्‍हें वह कंटेंट पसंद आता है तो वे इसे जरूर देखेंगे। इसलिए यह कहना कि लाखों लोग टीवी से दूर हो रहे हैं, गलत है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि यदि आप लोगों को अच्‍छा कंटेंट देंगे तो वे जरूर उसे देखेंगे अन्‍यथा ये चैनल अब तक बंद हो गए होते। हां, हम ये जरूर कह सकते हैं कि ऑनलाइन टेलिविजन के सहायक के रूप में काम करेगा। यदि आप ध्‍यान दें तो पता चलेगा कि डिजिटल के लिए जो शो तैयार किए गए हैं, वे टीवी पर आ रहे हैं। ‘नेटफ्लिक्‍स’ भी टीवी पर आ रहा है, ‘अमेजन’ भी टीवी पर आ रहा है और यहां तक कि ‘यूट्यूब’ Hभी टीवी पर आ रहा है। आज यदि आप कोई स्‍मार्ट टीवी खरीदकर लाते हैं तो उस पर यूट्यूब भी उपलब्‍ध है। मुझे नहीं लगता टीवी की तुलना किसी भी अन्‍य माध्‍यम से की जा सकती है। यह पहले भी काफी सस्‍ता माध्‍यम था और आज भी है और ऐसा सिर्फ इंडिया में नहीं बल्कि ग्‍लोबल स्‍तर पर ऐसा ही है।   

मैं आपको इसका एक और उदाहरण देता हूं। जैसे कि यदि आप जीवन में सफल और समृद्ध होते हैं तो आप एक बड़ा घर, बड़ी कार के साथ-साथ एक बड़ा टीवी खरीदना चाहते हैं, यही सच्‍चाई है। इसलिए मेरा मानना है कि ऑनलाइन सिर्फ टीवी के सहायक की भूमिका में रहेगा। जो लोग किसी वजह से टीवी पर ‘बिग बॉस’ (Bigg Boss) नहीं देख पाते हैं, वे इसे ‘वूट’ (Voot) पर देख सकते हैं। हमने इस डिजिटल प्‍लेटफॉर्म को इसलिए तैयार किया है ताकि ये दोनों माध्‍यम एक-दूसरे के सहायक बने रहें और हमारा दर्शक वर्ग हमारे साथ जुड़ा रहे।

यदि हम आपके शो ‘बिग बॉस’ (Bigg Boss) की बात करें तो लगता है कि यह पूरी तरह से इसके होस्‍ट सलमान खान का शो है और उनके इर्द-गिर्द ही घूमता है। लंबे समय तक यह स्थिति क्‍या टीवी के लिए अच्‍छी है अथवा बुरी?

‘बिग बॉस’ (Bigg Boss) पर सलमान खान सिर्फ शनिवार और रविवार को ही आते हैं। हफ्ते के बाकी दिनों में वे इस शो पर नहीं दिखाई देते हैं इसके बाद भी शो काफी अच्‍छा चलता है। हालांकि सलमान खान कुछ ही समय में इस शो के पर्याय बन चुके हैं। उन्‍हें यह शो पसंद है और हम सब सलमान को प्‍यार करते हैं। यही दोनों चीजें शो को और बेहतर बनाती हैं।  

क्‍या आपको ऐसा लगता है कि देश में इन दिनों टीवी रियलिटी शो कुछ ज्‍यादा ही हो रहे हैं?

मेरा मानना है कि एक जॉनर के रूप में रियलिटी शो भी फिक्‍शन शो की तरह काम करता है। सभी लोग कह रहे हैं कि कलर्स पर रियलिटी कुछ ज्‍यादा ही दिखाई जा रही है लेकिन सच्‍चाई ये है कि हमारे चैनल पर अन्‍य चैनलों की तुलना में बहुत कम रियलिटी शो दिखाए जा रहे हैं। कुछ चैनल तो वीकेंड पर दो रियलिटी शो दिखा रहे हैं और अब तो लगभग सभी ऐसा कर रहे हैं। ‘स्‍टार’, ‘जी’ और ‘सोनी’ की ही बात करें तो वे भी ऐसा कर रहे हैं। इस स्थिति में हमारी लागत भी काफी बढ़ गई है।

क्‍या टीवी प्‍लेयर्स ऐंटरटेनमेंट चैनलों से दूर होकर स्‍पोर्टिंग जॉनर की ओर जा रहे हैं। मेरा मतलब है कि यदि हम पिछले दिनों की बात करें तो देखेंगे कि विभिन्‍न खेल प्रारूपों में ज्‍यादा बड़ा दाव लगाया जा रहा है। क्‍या यह चिंता का विषय नहीं है?

इसमें नया कुछ भी नहीं है। खेल में शुरू से ही काफी पैसा लगाया जाता रहा है और यह सिलसिला लगातार जारी रहेगा। ‘स्‍टार’ ने हाल ही में जब 16, 347.5  करोड़ रुपये की बोली लगाई तो मुझे जरा भी हैरानी नहीं हुई। मुझे लगा कि उन्‍होंने बहुत सही कीमत पर ये अधिकार हासिल कर लिए हैं। लोगों का कहना है कि ‘स्‍टार’ ने बहुत बड़ी रकम खर्च की है लेकिन मेरा मानना है कि उन्‍होंने बहुत अच्‍छा काम किया है। यदि आप मुझसे पूछें कि क्‍या इतनी बड़ी रकम वे वापस निकाल सकेंगे तो मेरा मानना है कि स्थिति इससे भी जुदा होगी। इंडस्‍ट्री के लिए यह काफी अच्‍छी बात है क्‍योंकि 16 हजार करोड़ रुपये कमाने के लिए वे ज्‍यादा रेट चार्ज करेंगे। ऐसे में पूरी इंडस्‍ट्री के लिए बेंचमार्क काफी ऊंचे हो जाएंगे और आने वाले समय में यही होने जा रहा है।

 

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वरिष्‍ठ पत्रकार रजत शर्मा ने की ‘NBA’ को लेकर विशेष बातचीत

'इंडिया टीवी' (India TV) के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा को पिछले दिनों निजी टेलिविजन न्यूज चैनलों...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 26 September, 2017
Last Modified:
Tuesday, 26 September, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

'इंडिया टीवी' (India TV) के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा को पिछले दिनों निजी टेलिविजन न्यूज चैनलों का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह 'न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन' (एनबीए)  का प्रेजिडेंट नियुक्त किया गया है। उल्‍लेखनीय है कि ‘एनबीए’ भारत में  न्यूज और करेंट अफेयर्स के प्राइवेट चैनलों की संस्था है। एनबीए में देश के 25 बड़े न्यूज चैनल शामिल हैं। ‘एनबीए’ मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े मसलों को सरकार तक पहुंचाता है। रजत शर्मा इससे पहले भी एनबीए के अध्यक्ष रह चुके हैं। न्यूज़ इंडस्ट्री की आवाज़ सरकार तक पहुंचाने का NBA एक सशक्त माध्यम है।

‘एनबीए’ की कमान संभालने के बाद उन्‍होंने अपना कामकाज शुरू कर दिया है। शर्मा अब ‘एनबीए’ की कायापलट कर इसे ऐसी एसोसिएशन बनाना चाहते हैं जो किसी के व्यक्तिगत हित की बजाए न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स इंडस्‍ट्री के हितों पर ध्‍यान दे।

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्‍सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक खास बातचीत में रजत शर्मा ने ‘एनबीए’ को लेकर अपने विजन के बारे में काफी विस्‍तार से जानकारी दी। प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

: ‘एनबीए’ के प्रेजिडेंट के रूप में आपकी प्राथमिकताएं क्‍या हैं?

: ‘एनबीए’ के प्रेजिडेंट के रूप में मेरी पहली प्राथमिकता ब्रॉडकास्‍टर्स के बीच आपसी विश्‍वास का माहौल बनाना है। ‘एनबीए’ ऐसा मंच हैं, जहां हम अपने सभी निजी मतभेद भुलाकार ब्रॉडकास्‍ट इंडस्‍ट्री से जुड़े मुद्दों पर एक साथ बैठकर बातचीत कर सकते हैं। इसके अलावा हम ब्रॉडकास्‍ट इंडस्‍ट्री के कल्‍याण के बारे में बातचीत कर सकते हैं।     

: न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स को आजकल किन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, कृपया इसके बारे में कुछ बताएं ?

‘एनबीए’ के सामने तमाम चुनौतियां हैं। इस समय ‘एनबीए’ के सामने कैरिज फीस, ऐडवर्टाइजिंग रेट और विभिन्‍न रेगुलेशंस जैसी चुनौतियां हैं। लेकिन मुझे लगता है कि इनमें सबसे बड़ी चुनौती न्‍यूज चैनलों के बारे में धारणा को लेकर है। आजकल समाचार चैनलों की छवि सही नहीं दिखाई जा रही है और उन्‍हें सिर्फ टीआरपी बटोरेने वाला बताया जा रहा है। चाहे राजनेता हो, न्‍यायपालिका हो अथवा सोशल मीडिया, सभी लोग सिर्फ यही दर्शा रहे हैं कि संपादकगण शोरगुल करने वालों का झुंड हैं। इस स्थिति को स्‍पष्‍ट किया जाना चाहिए।

हमें दुनिया को ये बताना है कि न्‍यूजरूम में बैठे लोग अथवा ब्रॉडकास्‍ट हाउस के मालिक सिर्फ राष्‍ट्रीय हितों की बात करते हैं। वे लोग समाज के भले के लिए काम कर रहे हैं और इसके पीछे उनका मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं है, बल्कि उनके हित इससे कहीं परे हैं।  

: इन दिनों डिजिटल और सोशल मीडिया का काफी जोर है। ऐसे में इस बदलती हुई स्थिति में तालमेल बिठाए रखने के लिए न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र कैसे खुद को तैयार कर रहा है?

: यदि आप आंकड़े देखें तो न्‍यूज चैनल देखने वालों की संख्‍या बहुत ज्‍यादा है। आपका कहना सही है कि सोशल मीडिया का हमारे ऊपर काफी प्रभाव पड़ा है और इस बात को लेकर हम चिंतित भी हैं लेकिन मुझे लगता है कि ब्रॉडकास्‍ट मीडिया की विश्‍वसनीयता ज्‍यादा है और लोगों तक इसकी पहुंच भी ज्‍यादा है।

: ‘एनबीए’ के कुछ सदस्‍यों ने हाल ही में इसको लेकर कई तरह की चिंताएं जताई थीं। कुछ सदस्‍यों का कहना था कि यह एसोसिएशन ताकतविहीन (toothless) है। इस तरह के मुद्दों से निपटने के लिए आपके पास क्‍या योजना है?

: जिन लोगों ने यह मुद्दा उठाया था, मैं उन लोगों से बात कर जानने की कोशिश करूंगा कि आखिर उनके दिमाग में चल क्‍या रहा है। ऐसे लोगों को मैं यह सलाह भी दूंगा कि यदि इंडस्‍ट्री को लेकर उनके मन में किसी तरह की कोई बात है तो इसे ‘एनबीए’ के सामने लाना चाहिए। उन्‍हें सबसे पहले मीडिया अथवा सरकार के पास नहीं जाना चाहिए। सबसे पहले हमें इसे आपस में बैठकर सुलझाना चाहिए। मैं लोगों से बातचीत में विश्‍वास में रखता हूं। यदि आप ‘एनबीए’ का इतिहास उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि सभी तरह के मुद्दे आपस में मिल-बैठकर सुलझाए गए हैं। मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि आगे भी ऐसा ही किया जाएगा।   

: ‘एनबीए’ को और ज्‍यादा प्रभावशाली बनाने के लिए आपके पास क्‍या योजना है?

: बड़ी संख्‍या में रीजनल चैनल भी ‘एनबीए’ के मेंबर हैं। हमने डिजिटल ब्रॉडकास्‍टर्स के लिए भी ‘एनबीए’ के दरवाजे खोल दिए हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि हम ‘एनबीए’ का विस्‍तार करेंगे और इसे काफी ऊंचे लेवल पर ले जाएंगे।     

: पिछले वर्षों में ब्रॉडकास्टिंग सेक्‍टर में मेजरमेंट को लेकर तमाम सवाल उठते रहे हैं। इस तरह के मुद्दों से आप किस प्रकार निपटेंगे?

: जितने भी सवाल उठे हैं, वह ‘बार्क’ (BARC) को लेकर उठे हैं लेकिन यह एक व्‍यक्ति का निर्णय नहीं हो सकता है। इस तरह का निर्णय ‘एनबीए बोर्ड’ में लिया जाना चाहिए। यदि इस तरह का कोई विवाद है तो इस पर हम ‘एनबीए बोर्ड’ में चर्चा करेंगे। लेकिन मेरा मानना है कि ‘एनबीए’ को किसी एक चैनल के बारे में बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे बड़े पैमाने पर इंडस्‍ट्री के हितों को देखते हुए ही काम करना चाहिए।


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‘आईपीएल’ की नीलामी में ‘स्‍टार इंडिया’ के सीईओ उदय शंकर ने उठाया था ये रिस्‍क

‘स्‍टार इंडिया’ (Star India) के चेयरमैन और सीईओ उदय शंकर ने एक बार फिर साबित कर दिखाया है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 13 September, 2017
Last Modified:
Wednesday, 13 September, 2017
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रुहेल अमीन ।।

‘स्‍टार इंडिया’ (Star India) के चेयरमैन और सीईओ उदय शंकर ने एक बार फिर साबित कर दिखाया है कि आखिर क्‍यों उनका नाम बेहद सफल शख्सियतों में गिना जाता है। उनके नेतृत्‍व में हाल ही में करीब 24 बोलीदाताओं को पीछे छोड़कर ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ (IPL)के टेलिविजन और डिजिटल प्रसारण के अधिकार ‘स्‍टार इंडिया’ (Star India)  ने अपने नाम कर लिए हैं। इसके लिए ‘स्‍टार इंडिया’ ने 16347.50 करोड़ रुपये चुकाए हैं।

ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि क्‍या इसके पीछे पैसा कारण रहा अथवा उदय शंकर का परफेक्‍ट गेम प्‍लान, जिसने ‘स्‍टार इंडिया’ को ये सफलता दिलार्इ। इस बारे में हमने उदय शंकर से बातचीत कर जानना चाहा कि आखिर वे इस बारे में क्‍या सोचते हैं और आगे उनकी क्‍या प्‍लानिंग है। इस बातचीत के दौरान उदय शंकर ने यह भी बताया कि नीलामी प्रक्रिया के दौरान उन्‍हें किस बात का सबसे ज्‍यादा डर सता रहा था और इस बड़े प्‍लेटफॉर्म का लाभ वे किस तरह उठाएंगे।

पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

आईपीएल के मीडिया अधिकार हासिल करने के बाद अब आपकी क्‍या प्‍लानिंग है और आप इस प्‍लेटफॉर्म को यहां से कहां लेकर जाएंगे ?

इस बारे में फिलहाल मैं कुछ नहीं कह सकता हूं। इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्‍दबाजी होगी। मैं अभी सभी चीजों को समझने की कोशिश कर रहा हूं। इसलिए सच में इस बारे में आपको फिलहाल मैं कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं हूं। यदि मैं कहूं कि इस बारे में हमने पहले ही सोच लिया है तो यह बिल्‍कुल झूठ होगा। 

नीलामी के दौरान क्‍या कभी ऐसी स्थिति भी आई थी, जब आपको लगा कि चीजें आपके अनुकूल नहीं हो रही हैं ?

हमने इस बारे में कुछ योजना ही नहीं बनाई थी। हमने तो सिर्फ साधारण तरीके से नीलामी प्रक्रिया में हिस्‍सा लिया था। एक बार जब आप सीलबंद टेंडर जमा कर देते हैं तो फिर इस बारे में कुछ पता नहीं रहता। वो तो जब आप नीलामी वाले कमरे में जब जाते हैं और वहां देखते हैं कि भारतीयों के साथ ग्‍लोबल स्‍तर के दिग्‍गज वहां बैठे हैं और इस प्रक्रिया में हिस्‍सा ले रहे हैं तो समझ में आ जाता है कि मुकाबला कड़ा होने जा रहा है। हमारी स्‍ट्रेटजी काफी जोखिम भरी थी क्‍योंकि हमने अपनी नीलामी में सभी कैटेगरी में बोली ऐसी लगाई थी, जिसमें हमें डर लग रहा था। ऐसे में हम काफी चिंतित थे। हमें पता था कि या तो हमें सभी अधिकार मिल जाएंगे अथवा हम सभी अधिकार खो देंगे।

ऐसी भी चर्चाएं हैं कि ‘स्‍टार’ सभी स्‍पोर्टिंग ब्रॉडकास्‍ट अधिकार हासिल कर एक तरह से अपना एकछत्र राज्‍य स्‍थापित कर सकता है, इस बारे में आप क्‍या कहेंगे ?

यह बात सही नहीं है। इस बारे में इससे ज्‍यादा मैं कुछ नहीं कह सकता हूं। जब प्रतिद्वंद्वियों द्वारा इस तरह की बात उठाई जाती हैं, तब कोई कुछ नहीं कहता है। पहली बार यह चिंता उस प्‍लेटफॉर्म के मालिक द्वारा जताई गई थी, जिसका अपना बिजनेस एजेंडा था और उसकी चिंता सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के परिप्रेक्ष्‍य में थी जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय महत्व रखने वाले खेलों की प्राइवेट ब्रॉडकास्टर से साझा की हुई फीड को प्रसार भारती अब सिर्फ टेरेस्ट्रियल नेटवर्क (terrestrial network) या फिर डीडी फ्री डिश पर ही दिखा सकता है। इसलिए, उस आदेश से लाभ उठा रहे लोग जरूर इससे प्रभावित होंगे। इसलिए सबसे पहली बात तो ये हैं कि मुझे इस बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। दूसरी बात ये कि यदि आप क्रिकेट का दायरा देखेंगे तो इस बारे में बात करना फिजूल है। क्‍योंकि हमें सिर्फ ‘ICC’ और ‘IPL’ के अधिकार मिले हैं। इन दोनों में से ‘ICC’ हर साल नहीं होता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2018 में ‘ICC’ टूर्नामेंट नहीं है, सिर्फ ‘IPL’ है। करीब छह साल पहले हमने ‘BCCI’ के अधिकार हासिल किए थे, जो छह महीने से भी कम समय में खत्‍म होने वाले हैं। ऐसे में हमारे लिए यह आखिरी ‘BCCI’ सीजन है, जिसके हमारे पास अधिकार हैं।

ऐसे में मीडिया कंपनियों, टेलिकॉम कंपनियों और ग्‍लोबल टेक्‍नोलॉजी कंपनियों वाले इस प्रतिस्‍पर्द्धी माहौल में ये अधिकार किसे मिलेंगे, कौन जानता है। हमारे पास इंग्लिश क्रिकेट बोर्ड के अधिकार थे, जो खत्‍म हो चुके हैं। इसके अलावा हमारे पास क्रिकेट ऑस्‍ट्रेलिया के अधिकार थे, वे भी खत्‍म हो चुके हैं। हमारे पास साउथ अफ्रीका बोर्ड के अधिकार नहीं है और न ही श्रीलंका के अधिकार हैं। ऐसे में वेस्‍ट इंडीज जैसे अधिकारों को तो मैं गिन भी नहीं रहा हूं। इसलिए बहुत सारा क्रिकेट ऐसा है, जिसके हमारे पास अधिकार नहीं हैं। इसलिए इस तरह की बात करने का कोई आधार नहीं है। फिलहाल हमारे पास जो भी अधिकार हैं, वह सिर्फ कुछ वर्षों के लिए हैं और आईपीएल के अधिकार भी निश्चित समय के लिए हैं। ऐसे में आप कैसे उस चीज पर एकाधिकार जमा सकते हैं जो आपके पास नहीं है अथवा जो हर साल एक जैसी नहीं रहती है।

आईपीएल लीग काफी सफल है और इसकी दर्शक संख्‍या लगातार बढ़ती जा रही है, ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि इसके पीछे क्‍या वजह है?

इसके पीछे एक नहीं बल्कि तीन-चार प्रमुख वजह हैं। इनमें पहली और सबसे खास बात तो यह है कि टी-20 पैटर्न क्रिकेट प्रेमियों को काफी आकर्षित करता है। इसे समझना भी काफी आसान है और इसमें समय भी कम लगता है और तीन-चार घंटे में ही खत्‍म हो जाता है। लेकिन यह अकेला ऐसा फॉर्मेट और टूर्नामेंट है, जिसमें श्रेष्‍ठ भारतीय और विदेश खिलाड़ी मिलकर हिस्‍सा लेते हैं। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में इसने अपनी गहरी पैठ बनाई है। प्रत्‍येक टीम और फ्रेंचाइजी ने स्‍थानीय लोगों से गहरा नाता जोड़ा है। ऐसे में मुंबई के लोग ‘मुंबई इंडियंस’ और दिल्‍ली में लोग ‘दिल्‍ली डेयरडेविल्‍स’ को अपनी टीम के रूप में देखते हैं। ऐसे में लोगों का इन टीमों से गहरा जुड़ाव हो जाता है। आखिर में सबसे बड़ी बात तो यही है कि इसका समय फिक्‍स है। इसे शाम को ही रखा जाता है, जब अधिकांश लोग थके-मांदे अपने काम से घर लौटते हैं और कुछ मनोरंजन चाहते हैं। क्रिकेट में टी-20 फॉर्मेट को सभी लोग साथ में बैठकर देख सकते हैं, फिर चाहे वह महिला हो अथवा पुरुष, जवान हो अथवा बुजुर्ग। यही कारण है कि आज की तारीख में आर्इपीएल इतना सफल है।  

आजकल कई और स्‍पोर्टिंग लीग आ रही हैं और लोकप्रिय भी हो रही हैं। ऐसे में क्‍या आपको लगता है कि आईपीएल इससे किसी तरह प्रभावित होगा। इसके अलावा क्‍या क्रिकेट की ओवरडोज का डर भी बना हुआ है?

सबसे पहली बात जो मुझे लगती है, वो यह है कि क्रिकेट की पॉवर पहले से ज्‍यादा हुई है। हम देख चुके हैं कि पिछली साल के मुकाबले इस साल आईपीएल पहले से काफी विशाल था। ऐसे में कुछ लोगों ने सिर्फ से मिथक बना रखा है कि क्रिकेट कुछ ज्‍यादा हो रहा है। आप भी जानते हैं कि ज्‍यादा क्रिकेट नहीं है। जहां पर ज्‍यादा क्रिकेट की बात हो रही है, वह टेस्‍ट मैच क्रिकेट है, जिसका अपना दर्शक वर्ग है। इसके अलावा कुछ ही ‘ओडीआई’ (ODIs) मैच हैं।   

सिर्फ ‘इंग्लिश प्रीमियर लीग’ (English Premier League) ही ऐसी लीग है, जो साल में थोड़ा ज्‍यादा चलती है। ऐसे में मेरा मानना है कि क्रिकेट बहुत ज्‍यादा नहीं हो रहा है। हमें उम्‍मीद करनी चाहिए कि सभी लीग, सभी स्‍पोर्ट्स और क्रिकेट को फायदा होगा।

आईपीएल के डिजिटल अधिकारों में इस बार भारी वृद्धि देखने को मिली है। क्‍या यह वाकई में आश्‍चर्यजनक नहीं था ?

आप बिल्‍कुल सही कह रहे हैं। यह काफी हैरानी भरा था कि दो टेलिकॉम कंपनियों और एक सोशल मीडिया कंप‍नी ने इसके लिए इतनी बड़ी बोली लगाई। उन्‍होंने टेंडर खरीदे थे इसलिए इतनी बोली लगाई लेकिन ये काफी चकित करने वाली थी। मुझे यह भी लगता है कि लोग बोली के लिए काफी तैयारी से अए थे। बोली में शामिल अधिकांश खिलाडि़यों ने अपनी पसंद के क्षेत्र चुन लिए थे और इसके लिए वे काफी रकम चुकाने को तैयार थे।

‘स्‍टार इंडिया’ द्वार इस रकम को वसूलने को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं और लोग अपने-अपने हिसाब से गणित लगा रहे हैं। ऐसे में आपका गेम प्‍लान किया है?

आपको इस तरह की बयानबाजी से दूर रहकर सिर्फ तथ्‍यों पर ध्‍यान देना चाहिए। आपने आईपीए के लिए क्‍यों उस तरह का बेंचमार्क सेट कर दिया है, जिस कीमत पर ये दस साल पहले बेचे गए थे। तब वो बात नहीं थी, जो अब है। जिन लोगों को उस समय अधिकार हासिल हुए थे, वे काफी भाग्‍यशाली थे। लेकिन अब बीसीसीआई का टी-20 गेम 43 करोड़ रुपये में और टेस्‍ट मैच 43 करोड़ रुपये में होता है, लेकिन ये अधिकार भी छह साल पहले दिए गए थे। यदि आज बीसीसीआई के अधिकारों के लिए बोली लगाई जाए तो निश्चित रूप से यह ज्‍यादा पर छूटेगी। इसलिए आप बेंचमार्क नहीं सेट कर सकते हैं। लोग सिर्फ उसी रकम को देख रहे हैं जो दस साल पहले दी गई थी। लेकिन दस साल बाद तो सभी चीजें महंगी हो जाती हैं।

क्‍या आपको लगता है कि 16,347.5 करोड़ रुपये जादुई आंकड़ा नहीं है ?

नहीं,  यह जादुई आंकड़ा तो हैं। लेकिन इसे असामान्‍य नहीं कहा जा सकता है।

 


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ब्रैंड्स की सफलता में ये बातें रखती हैं बहुत मायने, बोले ‘Times Network’ के एमडी

‘टाइम्‍स नेटवर्क’ (Times Network) के एमडी और सीईओ एमके आनंद का कहना है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 08 September, 2017
Last Modified:
Friday, 08 September, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

‘टाइम्‍स नेटवर्क’ (Times Network) के एमडी और सीईओ एमके आनंद का कहना है कि ब्रैंड्स के लिए स्‍टोरी का बहुत महत्‍व है। मुंबई में आयोजित ‘एक्‍सचेंज4मीडिया’ के ‘कंटेंट जैम कार्यक्रम’ (e4m Content JAM) में उन्‍होंने बताया कि किस तरह से मीडिया और ब्रैंड्स एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते और इसे सिर्फ ऐडवर्टाइजिंग के नजरिये से ही नहीं देखा जा सकता है। उनका कहना था कि ब्रैंड में स्‍टोरी की उपयोगिता कभी कम नहीं हो सकती है, क्‍योंकि ये लोगों को आकर्षित करती हैं।

कार्यक्रम के दौरान उन्‍होंने ‘न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स’ के एक पत्रकार का उदाहरण भी दिया जिसने ई-कॉमर्स वेबसाइट ‘eBay’ से जर्मन ब्रैंड का चश्‍मा खरीदा और फिर उसे एक स्‍टोरी बनाकर दोबारा से बिक्री के लिए रख दिया। इस प्रकार उसने चश्‍मे को बेचकर काफी मोटा मुनाफा कमाया।

आनंद ने कहा, ‘ऐसे में उस पत्रकार ने एक तरह से अपनी स्‍टोरी के द्वारा ही चश्‍मे को बेचा, कहने का मतलब है कि ब्रैंड्स को सफल बनाने में स्‍टोरी का इसी तरह महत्‍व होता है।’

इसके अलावा एमके आनंद ने मीडिया, स्‍टोरीज और ब्रैंड्स की पार्टनरशिप पर भी जोर दिया। उन्‍होंने कहा, ‘ब्रैंड्स स्‍टोरीज से बने होते हैं। मीडिया का काम इन स्‍टोरीज के माध्‍यम से लोगों को ब्रैंड्स से जोड़ना, उन्‍हें सूचनाएं देना और उनका मनोरंजन करना होता है। स्‍टोरीज के बिजनेस में यही होता है। ऐसी स्‍टोरी तथ्‍यात्‍मक के साथ काल्‍पनिक भी होती हैं और कई बार तो ये फेक स्‍टोरी होती हैं लेकिन ये ब्रैंड को सफल बनाने में काफी सहायक होती हैं, क्‍योंकि ब्रैंड्स इन्‍हीं स्‍टोरीज पर निर्भर होते हैं। ऐसे में यह एक बेहतरीन पार्टनरशिप होती है। हालांकि, इस तरह की स्‍टोरीज में आदमी की जरूरतें और इकनॉमिक्‍स काम नहीं करती है, बस स्‍टोरीज होनी चाहिए।’

एमके आनंद ने कहा, ‘मीडिया मालिकों को इस बात को समझने की जरूरत है कि किसी भी स्‍टोरी के लिए मीडिया उतना ही बेहतर होता है, जितना कोई और सोर्स। ब्रैंडेड कंटेंट के साथ इसमें मदद कर रही मीडिया कंपनी अपनी स्‍टोरी खुद तैयार करती है।’  

इसके लिए उन्‍होंने समानता पर जोर देते हुए कहा, ‘मेरे लिए सबसे अच्‍छी समानता स्‍टोरी के लेखक और उसके मालिक की होगी। इसलिए जिस व्‍यक्ति की स्‍टोरी होगी, ब्रैंड भी उसी का होगा। स्‍टोरी के लेखक को स्‍टोरी मालिक को एक पुस्तक बनाने में मदद करने के उद्देश्य से आगे आना होगा। एक सफल स्‍टोरी उसके लेखक और मालिक दोनों के संयुक्त उद्देश्य को पूरा करती है।’  

आनंद ने कहा कि मीडिया मालिकों को भी स्‍टोरी के लेखक की मानसिकता से आगे आना होगा। उन्‍होंने कहा, ‘मीडिया मालिकों को भी यह समझने की जरूरत है कि सभी स्‍टोरी अच्‍छी होती हैं आपको इस दिशा में ईमानदारी से काम करना होगा। एक स्‍टोरी लेखक होने के नाते आपको ये चीजें बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट होनी चाहिए कि आप किस तरह के लेखक हैं और आप किसके बारे में लिखना चाहते हैं।’

एमके आनंद ने बताया कि मीडिया कंपनी के रूप में ‘टाइम्‍स नेटवर्क’ फिलहाल देश के विकास पर फोकस कर रहा है। इसके लिए यह नेटवर्क अपने विभिन्‍न नेटवर्क जैसे ‘मिरर नाउ’, ‘टाइम्‍स नाउ’ और ‘ईटी नाउ’ की मदद ले रहा है। उन्‍होंने कहा, ‘अपने इन तीनों प्‍लेटफॉर्म्‍स के द्वारा हम लोगों को ब्रैंडेंट कंटेंट उपलध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा, ‘इन दिनों स्‍टोरी कहने, उसे लिखने और प्रचार करने के क्षेत्र में लगातार छह से आठ तिमाहियों तक काम करना होगा। ब्रैंडेड कंटेंट और स्‍टोरी यदि वह प्रासंगिक है, तो इसके लिए नि‍यमित गतिविधि होनी चाहिए और इसके बारे में बात की जानी चाहिए।’ 

 

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