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अब इस कंपनी के विज्ञापन में दिखेंगी कैटरीना कैफ...

बॉलिवुड अभिनेत्री कैटरीना कैफ इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ की शूटिंग में व्यस्त हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 11 October, 2017
Last Modified:
Wednesday, 11 October, 2017


समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

बॉलिवुड अभिनेत्री कैटरीना कैफ इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ की शूटिंग में व्यस्त हैं, लेकिन जल्द ही वे एक नए विज्ञापन में नजर आने वाली हैं और ये विज्ञापन होगा आईवियर कंपनी लेंसकार्ट का। दरअसल, लेंसकार्ट ने कैटरीना कैफ को अपना ब्रैंड एंबेसडर बनाया है।

 कैटरीना अगले 2 वर्षो के लिए लेंसकार्ट का चेहरा होंगी। इस मौके पर कैटरीना ने कहा, ‘मुझे लेंसकार्ट के साथ जुड़ने में खुशी है। लेंसकार्ट भारतीय युवाओं का पसंदीदा ब्रैंड है और यह फैशन प्रेमी भारतीयों से जुड़ने का एक प्रयास है।’

कंपनी के संस्थापक और सीईओ पीयूष बंसल ने इस संबंध में कहा, हम किसी ऐसे चेहरे को तलाश रहे थे जो लेंसकार्ट ब्रैंड की छवि से स्वाभाविक तौर पर जुड़ जाए।

आपको बता दे की लेंसकार्ट कंपनी की शुरुआत 2010 में हुई थी और अभी देश के 80 से ज्यादा शहरों में तकरीबन 350 से अधिक स्टोर हैं।


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‘फर्जी खबर’ या ‘गलत रिपोर्टिंग’ पर सरकार सख्त, लेगी ये एक्शन...

समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अब ‘सुनी-सुनाई’ या फिर ‘फर्जी खबरें’ छापने से पहले सोच विचार करना होगा...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Friday, 03 November, 2017
Last Modified:
Friday, 03 November, 2017
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

 

समाचार पत्र-पत्रिकाओं को अब ‘सुनी-सुनाई’ या फिर ‘फर्जी खबरें’ छापने से पहले सोच विचार करना होगा, क्योंकि यदि कोई फेक न्यूज पाई गई तो उस समाचार संगठन का विज्ञापन रोक दिया जाएगा। दरअसल, केंद्र सरकार ‘फर्जी खबर’ छापने या ‘गलत रिपोर्टिंग’ करने वाले मीडिया संगठनों को विज्ञापन न देने पर विचार कर रही है।

 

केंद्र सरकार डीएवीपी की विज्ञापन नीति-2016 में फेरबदल करने वाली है। यह फेरबदल मीडिया में शुचिता लाने के लिए किया जा रहा है। वैसे तो, सामान्य तौर पर प्रतिष्ठित अखबार ‘फर्जी खबर’ नहीं छापते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ मीडिया संस्थानों की तरफ से ब्लैकमेल करने या  बदनाम करने की मंशा से झूठी खबरें छापने या खबरों को तोड़-मरोड़कर छापने की शिकायतें मिलती रही हैं।

 

हिंदी न्यूज पोर्टल ‘सहारा लाइव’ की एक खबर के मुताबिक, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फेक न्यूज से निपटने को विज्ञापन नीति में फेरदबदल का प्रस्ताव दिया है। इसके मुताबिक, विज्ञापन नीति-2016 के अनुबंध-25 में परिवर्तन कर उसे फिर से परिभाषित किया जा रहा है। इसमें अनैतिक व गलत धारणा से प्रकाशित या फर्जी खबर पाए जाने को भी जोड़ा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, डीएवीपी इस काम में प्रेस कौंसिल और पीआईबी की मदद ले सकता है।

 

इससे पहले डीएवीपी ने गलत और पत्रकारिता के मूल्यों का उल्लंघन करने वाले कुछ अखबारों का विज्ञापन दो महीने के लिए रोका था, लेकिन यह प्रेस काउंसिल की सिफारिश पर किया गया था। अब सरकार विज्ञापन नीति में ही प्रावधान करने जा रही है ताकि फर्जी और ब्लैकमेल करने वाली खबर छापने से पहले बार-बार सोचें।

 


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जानिए, आखिर क्यों विराट कोहली ने ठुकरा दिया करोड़ो का ये विज्ञापन...

टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली एक मिसाल पेशकर फिर से सुर्खियों में आ गए हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 19 September, 2017
Last Modified:
Tuesday, 19 September, 2017
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली एक मिसाल पेशकर फिर से सुर्खियों में आ गए हैं। दरअसल, इस बार उनके सुर्खियों में आने की वजह है उनके द्वारा करोड़ो रुपए विज्ञापन ऑफर ठुकरा देना।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कोहली ने एक सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी की करोड़ों की डील यह कहते हुए ठुकरा दी कि जब वे खुद ही यह नहीं पीते तो वो दूसरों को कैसे कहें। माना जा रहा है कि विज्ञापन के लिए कोहली को 20 करोड़ रुपए का ऑफर दिया गया था।

विराट कोहली अपनी फिटनेस को लेकर काफी सजग रहते हैं और उन्हें, दुनिया के सबसे फिट क्रिकेटरों में शुमार किया जाता है। हाल ही में बीसीसीआई ने उनकी फिटनेस का विडियो शेयर किया था, जिससे पता चलता है कि वह खुद को फिट रखने के लिए कितनी मेहनत करते हैं।

 

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नवरात्र पर जारी हुए विज्ञापन पर मचा बवाल...

बॉलिवुड एक्ट्रेस सनी लियोनी एकबार फिर अपने एक ऐड को लेकर विवादों में आ गईं हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 19 September, 2017
Last Modified:
Tuesday, 19 September, 2017
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

बॉलिवुड एक्ट्रेस सनी लियोनी एक बार फिर अपने एक ऐड को लेकर विवादों में आ गईं हैं। गुजरात में सनी लियोनी के एक ऐड का चौतरफा विरोध हो रहा है। दरअसल, नवरात्र पर होने वाले गरबा से जोड़कर इस ऐड को दिखाया गया है।

गुजरात के सूरत शहर में मैनफोर्स की ओर से नवरात्रि की शुभकामना संदेश के होर्डिंग्स लगाए गए हैं। इस होर्डिंग्स में सनी लियोन की तस्वीर दिखाई दे रही है, हालांकि, होर्डिंग में कहीं भी ‘कंडोम’ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। इसमें मैनफोर्स की ब्रैंड एम्बेसडर सनी लियोनी के साथ मैनफोर्स का लोगो और 'खेलो मगर प्यार से' की टैगलाइन दिख रही है।

सोशल मीडिया पर इस ऐड की फोटो वायरल हो गई। नवरात्र के आस-पास इस ऐड के जारी होने पर सोशल मीडिया यूजर्स और शहर के संगठनों ने ऐतराज जताया। उनका कहना था कि सनी लियोनी के कंडोम का ऐड धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रहा है। इसे तत्काल हटाया जाए। मामला इतना गर्म हो गया कि जल्द ही ये सारे पोस्टर शहर से हटा लिए गए।

एमएस यूनिवर्सिटी के एक फैकल्टी मेंबर अतित पटेल ने इस पोस्टर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कर एक बहस की शुरुआत की थी। उनका कहना था कि भले ही ये पोस्टर जागरुकता फैलाने के लिए था, लेकिन इसे ज्यादा सावधानी से प्लान किया जाना चाहिए था, ताकि लोगों की भावनाएं आहत ना हों।

बता दें कि गुजरात में नवरात्र सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जिसमें 9 दिनों के लिए माता देवी के 9 रूपों की पूजा की जाती है। इन दिनों गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और नवरात्र में गरबा नृत्योत्सव के रूप में मनाया जाता है।


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'हिन्दी को न तो अंग्रेजी और न ही अन्य भारतीय भाषाओं से चुनौती है'

‘हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा…’ ये पंक्तियां प्रसिद्ध साहित्यकार अल्लामा इक़बाल की उर्दू में लिखी गई ख़्यातनाम गज़ल...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 14 September, 2017
Last Modified:
Thursday, 14 September, 2017
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-अनिल कुमार पाण्डेय ।।

‘हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा…’ ये पंक्तियां प्रसिद्ध साहित्यकार अल्लामा इक़बाल की उर्दू में लिखी गई ख़्यातनाम गज़ल ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ की है जो आजादी के समर के दौरान लिखी गई थी। इक़बाल तत्कालीन भारत के लाहौर में रहते थे। पेशे से सरकारी कॉलेज में व्याख्याता थे। इक़बाल की मजहबी भाषा अरबी थी। हालांकि उर्दू भाषा फ़ारसी लिपि के साथ तब तक आकार ले चुकी थी। लाहौर तत्कालीन पंजाब प्रांत का हिस्सा था। जहां की मुख्य भाषा पंजाबी थी। लेकिन इक़बाल साहब ने हिन्दोस्तां की भाषा के लिए हिन्दी की वकालत आखिर क्यों की...? इसे समझने की जरूरत है। आज के दौर में तो बहुत ही जरूरी है। बात चाहे देश के अत्याधुनिक शहर कहे जाने वाले बेंगलुरु की हो, जहां के मेट्रो स्टेशनों में कन्नड़, अंग्रेजी के बाद हिन्दी की देवनागरी लिपि में लिखे स्टेशनों के नाम को ढक देने का प्रकरण हो या फिर केन्द्रीय सरकार के परिपत्र के जारी होते ही तमिलनाडु में बवाल हो जाने का हो, जिसमें हिन्दी के उपयोग करने की बात कही गई थी। इन सभी प्रकरणों में एक साझी बात उभरकर सामने आती है कि हिन्दी का विरोध सामाजिक-सांस्कृतिक कम राजनैतिक ज्यादा है। निश्चित तौर पर हिन्दी देश की अघोषित राष्ट्र भाषा है। हालांकि भारत राष्ट्र कम, देश की शक्ल में ज्यादा नज़र आता है। बहुभाषी देश है। भाषाओं की अपनी विरासत है। किसी एक भाषा की छाती पर चढ़कर किसी भी भाषा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर देश के ज्यादातर राज्यों  की स्थापना भाषाई आधार पर हुई है। निश्चित रूप से हर राज्य को अपने यहां प्रचलित बोलियों, भाषाओं की गौरवशाली विरासत को संरक्षित रखने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए। हिन्दी किसी भी भाषा की विरोधी नहीं है। लेकिन देश की भाषा के लिए हिन्दी के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। आपको अमृतसर में मलयालम समझने वाले, रामेश्वरम में गुजराती वहीं गुजरात में तेलुगु समझने वालों को ढ़ूंढ़ने में मशक्कत करनी पड़ सकती है। आठवीं अनुसूची में शामिल हिन्दी भाषा को छोड़कर सभी भाषाओं की स्थिति तकरीबन एक जैसी ही है लेकिन, हिन्दी बोलने, समझने तथा लिखने में सक्षम लोग देश के किसी भी कोने में मिल जायेंगे। हिन्दी भाषा तकरीबन कुछ हिन्दी भाषी राज्यों के लोगों को छोड़कर देश के तकरीबन 20 राज्यों के लिए उनकी द्वितीयक भाषा है। हिन्दी को यदि उसकी बोलियों से अलग कर दिया जाये तो कम ही होंगे जिनकी मातृभाषा हिन्दी होगी। वहीं अगर इस बात की गणना की जाए कि देश में हिन्दी कितने जानते या समझतें है तो, शायद ही देश की कोई भाषा हिन्दी के आस-पास भी फटके, अंग्रेजी तो दूर-दूर नहीं। अब अगर किसी से पूछा जाए की देश की भाषा क्या होनी चाहिए तो इसके लिए अंतर्मन और अपने पुराने अनुभवों को टटोलना होगा। सभवत: उत्तर सभी का एक ही होगा। हिन्दी हमेशा से ही राजनीति का शिकार होती रही है। वर्तमान में कई भाषा-बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखने के लिए लोग हो-हल्ला मचा रहें हैं।

ज्ञात हो कि क्षेत्रफल और जनसंख्या के मामले में विशाल होने के साथ ही देश में तकरीबन 1652 विकसित एवं समृद्ध बोलियां प्रचलित हैं। इन बोलियों को बोलने वाले हर व्यक्ति-समुदाय के जीवन में ये महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। हर व्यक्ति अपनी बोली को भाषा के रूप में देखता है। उन्हें लगता है कि उनकी बोली में वे सारे गुण हैं जो किसी भी सबल भाषा में होने चाहिए। लेकिन देश का हर शख़्स जानता है कि देश की आत्मा हिन्दी में बसती है। वर्तमान में भोजपुरी बुद्धिजीवी वर्ग भोजपुरी को इस सूची में शामिल करने के लिए प्रयास कर रहा है। निश्चित तौर पर इसे उस सूची का हिस्सा बना देना चाहिए। वर्तमान में इस अनुसूची में 22 भाषाएं सम्मिलित हैं और हिन्दी भी इसी अनुसूची का हिस्सा है। हालांकि शुरुआत में केवल 14 भाषाएं इसमें शामिल की गई थीं। निश्चित रूप में देश में प्रचलित बोलियों और भाषाओं का संरक्षण होना चाहिए। बोलियों-भाषाओं के संरक्षण से भला किसे तकलीफ होगी? आज भी कई देशों की भाषाएं लिपि के नाम पर केवल चित्रमयी है, बावजूद इसके वे विश्व में अत्यंत ही सम्मानित भाषाएं मानी जाती हैं।

वहीं 70 करोड़ से अधिक हिन्दी भाषी होने के बाद भी हिन्दी भाषा को वह सम्मान प्राप्त नहीं है जिसकी वह हकदार है। हालांकि, वर्तमान में हिन्दी फिल्मों तथा अप्रवासी भारतीयों ने हिन्दी को विश्व के कोने-कोने में पहुंचा दिया है। भारत विश्व का सबसे बड़ा उभरता बाजार है। ऐसे में व्यापार से जुड़ी हर छोटी-मोटी कंपनियों में हिन्दी के उपयोग जरूरी बन गया है। हालांकि हिन्दीतर भाषाओं के माध्यम से भी वे अपनी पैठ भारतीय समाज में पुख्ता करना चाहते हैं। जिसमें शायद ही किसी को कोई गुरेज हो। हिन्दी भाषा की पहचान आज वैश्विक हो चली है। आज स्थिति यह है की भारतीय हिन्दी फिल्मों के दर्शक पूरे विश्व में मिल जायेंगे।

प्रमाणित तथ्य है कि विश्व में वही देश विकसित है जिसने अपनी भाषा को सहेजा है, संवारा है तथा उसे अपनाया है। रूस, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देश विकसित देशों की श्रेणी में आते हैं लेकिन शायद ही आपने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे तथा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अपनी देश की राष्ट्रीय भाषा से इतर अन्य भाषा में सार्वजनिक रूप से बोलते हुए सुना हो। शायद नहीं, इजरायल को कौन भूल सकता है। क्षेत्रफल में हरियाणा जितना इजरायल है पर मजाल है कि कोई दुश्मन देश उसकी तरफ आंखे तरेरे।

इजरायल के निर्माण के जितना योगदान यहूदी मजहब का है संभवत: उतना ही उनकी अपनी हिब्रू भाषा का। हिब्रू एक विलुप्तप्राय भाषा थी जिसे, आज लोग दुनिया की पुरानी जीवित भाषाओं में से एक मानते हैं। इजरायल एक मृतप्राय भाषा को जीवित कर देता है तो क्या हम हिन्दी जैसी वैज्ञानिक भाषा को जीवंत नहीं रख सकते? बात समझ में आती है कि भारत की परिस्थितियां इन देशों से अलग है। भारत बहुभाषीय देश है। भारत में समृद्ध भाषाओं की एक लंबी सूची है। देश की मुख्य भाषाएं किसी भी अन्य देशज भाषा से कमतर नहीं है। देश में कई भाषाएं को क्लासिकल भाषा का दर्जा दिया गया है। इनका साहित्य पुरातन एवम् वैभवशाली है। बावजूद इसके इनका क्षेत्र सीमित है। अंचल विशेष में बोली, लिखी तथा पढ़ी जाती हैं। जबकि हिन्दी का विस्तार राज्यों की सीमाओं से परे अंतरराज्यीय से होते हुए अंतरराष्ट्रीय हो चली है।  

सब जानते हैं कि हिन्दी के बिना देश का उत्थान संभव नहीं है। समझ से परे है कि सहिष्णुता जिस देश के अंत:करण में बसती हो, वहां के अहिन्दी भाषियों में हिन्दी के प्रति इतनी असहिष्णुता क्यों है? तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के लोगों को देवनागरी लिपि में लिखा ‘तमिलनाडु’ और ‘पश्चिम बंगाल’ भी गुस्से के भाव से भर देता है। वैसे हिन्दी भाषियों ने हिन्दी की कम दुर्गति नहीं की है। हिन्दी भाषी व्यक्ति जानबूझकर अंग्रेजी का चोला ओढ़ता है ताकि समाज उसे विद्वान समझे। यहां पर अंग्रेजी को उसकी विरोधी भाषा की दृष्टि से देखने की जरूरत नहीं है। लेकिन समाज में कई ऐसे हैं जो हिन्दी आते हुए भी हिन्दी भाषी व्यक्ति से जान-बूझकर अंग्रेजी में बात करते हैं। अब इसे क्या कहें? आप ही तय कर लें। आज हिन्दी के प्रति लोगों में सोच बदलने की जरूरत है। राजभाषा नियम-1976 के अनुसार सूचना बोर्ड में त्रिभाषा का सिद्धांत बेहतर है, जिसमें हिन्दी के साथ ही सहायक राजभाषा अंग्रेजी सहित स्थानीय भाषा को न केवल स्थान मिलता है बल्कि दोनों भाषाओं से ऊपर उसे तरज़ीह मिलती है। मैनें कितने ही स्टेशन देखें है जहां उर्दू में स्टेशन का नाम लिखा होता है। दो चार के अलावा शायद ही कोई वहां हो जो इसे लिखना और लिखे हुए को पढ़ना जानता हो पर, इसे शायद ही किसी ने पोता हो। भ्रम है कि हिन्दी या किसी हिन्दीतर भाषा का आपस में संघर्ष है, जबकि ऐसा नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी का साहित्य हिन्दीतर भाषाओं के साहित्य जितना ही समृद्ध है। लेकिन हिन्दी देश की प्रतिनिधि भाषा होने के साथ ही अत्यंत सबल और वैज्ञानिक भाषा भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद गुजराती भाषी महात्मा गांधी तथा तमिल भाषी सी. राजगोपालाचारी तथा सीमांत गांधी के नाम से प्रसिद्ध खान अब्दुल गफ्फार खां हिन्दी को देश की भाषा बनाने की वकालत नहीं करते। बावजूद इसके आज भी हिन्दी को लेकर राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता नहीं बन पायी है। वर्तमान में हिन्दी के विस्तारए बाजार में धमक और भाषाई सबलता के आधार पर हिन्दी देश की अघोषित रूप से देश की भाषा है। लेकिन देश में हिन्दी को लेकर इतना राजनीतिक कुचक्र फैला है जिसे आधार बनाकर लोग सच को भी झूठा साबित करने में तुले हुए हैं।

सही मायनों में हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं या फिर अंग्रेजी से किसी तरह की कोई चुनौती नहीं है, सभी भाषाओं की अपनी महत्ता है। हिन्दी के सबसे बड़े दुश्मन कोई विदेशी नहीं बल्कि अंग्रेजी मानसिकता वाले भारतीय ही हैं। कहा जाता है कि दुनिया को ठीक तरह से जानने तथा लोगों से संबंध बनाने के लिए रशियन, चाइनीज, जापानी, स्पेनिश, जर्मन, अंग्रेजी, अरबी, फ्रांसीसी, हिन्दी जैसी भाषाओं की जानकारी होना आवश्यक है। वहीं भारत को जानना हो तो हिन्दी भाषा ही पर्याप्त है। इक़बाल साहब को 1905 में ये बात समझ आ गई थी। तब से लेकर अब तक न जाने कितना पानी गंगा में बह गया, पूरी शताब्दी गुज़र गई लेकिन हम नहीं समझे। ईश्वर जाने इस देश और इसके लोगों को यह बात समझने में ना जाने कितना वक्त और लगेगा।

(लेखक राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पंचकूला में पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)


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दूरदर्शन ने ऐड एजेंसियों के लिए खोले दरवाजे...

दूरदर्शन जल्द ही अब ऐसी ऐड एजेंसियों को अंतरिम मान्यता देगी जो रजिस्टर्ड हैं और उसकी शर्तों को पूरा करती हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 13 September, 2017
Last Modified:
Wednesday, 13 September, 2017
doordarshan-final

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

दूरदर्शन जल्द ही अब ऐसी ऐड एजेंसियों को अंतरिम मान्यता देगी जो रजिस्टर्ड हैं और उसकी शर्तों को पूरा करती हैं।

हालांकि, यह मान्यता 27 जून, 2017 को ऐडवर्टाइजिंग एजेंसियों के लिए लागू की गई नई (संशोधित) रजिस्ट्रेशन एंड एक्रिडिएशन पॉलिसी (Registration and Accreditation Policy) के तहत दी जाएंगी, जोकि तीन महीने के लिए होगी।

पॉलिसी में दिए गए नियम व शर्तों के तहत ये एजेंसियां नई दिल्ली स्थित डीडी कमर्शियल सर्विसेज में मान्यता के लिए आवेदन कर सकती हैं। हालांकि पॉलिसी की सभी शर्तें दूरदर्शन की वेबसाइट पर देखी जा सकती है और यहां से आवेदन का प्रारूप भी प्राप्त कर सकती हैं।


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गणपति के इस अजीब विज्ञापन का जरूर कीजिए विरोध...

जब पूरे देश भर में गणपति विसर्जन का पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा था...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 07 September, 2017
Last Modified:
Thursday, 07 September, 2017
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

पूरे देश में जब गणपति विसर्जन का पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा था, तभी दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया में कुछ ऐसा हुआ जिसने भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम किया। ऑस्ट्रेलिया की एक मीट बेचने वाली कंपनी का विवादित विज्ञापन जारी हुआ, जिसमें भगवान श्री गणेश को दिखाया गया। इस विज्ञापन में गणेश के अलावा यीशु, बुद्ध, थॉर को टेबल के चारों ओर बैठकर मेमने (लैंब) के मांस पर चर्चा करते हुए दिखाया गया। विज्ञापन में कहा गया है, ‘टू लैंब–द मीट वी कैन ईट ऑल।’

यह विज्ञापन मीट एंड लिवस्टॉक ऑस्ट्रेलिया’ (MLA) नामक कंपनी ने जारी किया है। इस विज्ञापन को सोमवार को जारी किया था। ऑस्ट्रेलिया में इस तरह के ऐड कंटेंट पर नजर रखने वाली एजेंसी ‘ऑस्ट्रेलियन स्टैंडर्ड्स ब्यूरो’ इसकी जांच कर रहा है।

इंडियन सोसाइटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के प्रवक्ता नितिन वशिष्ठ ने विज्ञापन को असंवेदनशील करार देते हुए कहा, गणेश जी को मेमने का मांस खाते हुए और अपने लिए नई मार्केटिंग नीति पर विचार करते हुए दिखाया गया है।’

विज्ञापन में दिखाया गया है कि यह मीट कंपनी हर धर्म को साथ लाती है। आधुनिक बारबीक्यू पर सारे भगवान एकजुट हुए हैं और लैंब मीट का जायका चख रहे हैं। MLA कंपनी ने विज्ञापन बनाते समय यह नहीं सोचा कि इस से कितने लोगों की भावनाओं को दुख पहुंच सकता है। भगवान श्री गणेश को मोदक पंसद है और विज्ञापन में मीट पर चर्चा करते दिखाना सच में शर्मनाक है। ऑस्ट्रेलिया में हिंदू समुदाए इसका जमकर विरोध कर रहा है। वहीं भारत में भी इस विज्ञापन की कड़ी निंदा हो रही है। भारतीयों का इस विज्ञापन पर गुस्सा बढ़ता जा रहा है और इसे जल्द से जल्द सोशल साइटस से हटाने के लिए कंपनी से बात की जा रही है।

यहां देखें विडियो-


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‘BTVi’ ने शुरू किया नया ऐड कैंपेन, ये है खासियत

अंग्रेजी न्‍यूज चैनल ‘बिजनेस टेलिविजन इंडिया’ (BTVi) ने एक नया ब्रैंड कैंपेन शुरू किया है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 30 August, 2017
Last Modified:
Wednesday, 30 August, 2017
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समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

अंग्रेजी न्‍यूज चैनल ‘बिजनेस टेलिविजन इंडिया’ (BTVi) ने एक नया ब्रैंड कैंपेन शुरू किया है। इस कैंपेन में चैनल की एडिटोरियल मजबूती को दिखाया गया है। इसके साथ ही कैंपेन में यह भी दिखाया गया है कि चैनल के एंकर की विशेषज्ञता के कारण व्‍युअर्स को किस तरह से फायदा मिल रहा है।

इस बारे में ‘BTVi’ की सीओओ मेघा टाटा का कहना है, ‘हम विभिन्‍न तरह के कंटेंट पर फोकस कर रहे हैं और इसके साथ ही हम अपने मार्केट शेयर को भी बढ़ा रहे हैं। हालांकि इस लोगो और ब्रैंड कैंपेन का उद्देश्‍य अपने व्‍युअर्स को ज्‍यादा से ज्‍यादा विश्‍वसनीय सूचनाएं उपलब्‍ध कराना है।’  

वहीं, ‘BTVi’ के एग्जिक्‍यूटिव एडिटर सिद्धार्थ जरावी का कहना है, ‘ऐसे समय में जब व्‍युअर्स के पास इनफोर्मेशन की बाढ़ आई हुई है, जिनमें से अधिकांश उससे संबंधित नहीं हैं और व्‍युअर्स का काफी समय खराब करती हैं, ‘BTVi’ अपने दर्शकों को आसान तरीके से विश्‍वसनीय खबरें उपलब्‍ध कराता है।’

उन्‍होंने कहा कि हमने अपनी थीम ‘Keep it simple’ रखी है और हमारी प्रोग्रामिंग ऐसी है कि हर स्‍टोरी दिल को छू लेती है और लोग उसे काफी पसंद करते हैं। इसके अलावा हम समय से और प्रासंगिक जानकारी अपने व्‍युअर्स तक पहुंचाते हैं।

 

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वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा का ‘हिन्दुस्तान’ में छपे इस तरह के विज्ञापन पर करारा वार

आजकल अखबारों में जॉब सेक्टर संबंधी तरह-तरह के आशावादी विज्ञापन छपे दिखाई देते हैं...

Last Modified:
Friday, 25 August, 2017
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

 वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा ने अखबार में छप रहे न केवल कुछ विज्ञापनों पर, बल्कि छापने वाले अखबार पर भी सवाल उठाए हैं, जिनमें सर्विस देने की बात की जा रही हैं। अनुरंजन झा ने इसे लेकर अपने फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी है, जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं-   

यह देश के बड़े मीडिया घराने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के हिन्दी अखबार हिन्दुस्तान का क्लासीफाइड विज्ञापन है। कई दिनों से लगातार छप रहा है, कोई भी पाठक समझ सकता है कि यह विज्ञापन कैसी सर्विस की बात करता है। अपने वॉल पर डालने से पहले हमने इनके नंबर ब्लर कर दिए हैं लेकिन इसे मैं यहां इसलिए शेयर कर रहा हूं कि जो मीडिया घराने दिन-रात नैतिकता का ढोल पीट रहे हैं वो महज चंद रुपए के लिए देखिए किस हद तक गिर जाते हैं।

देश के किसी भी छोटे-बड़े शहर में अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए दिन रात जद्दोजहद करने वाले लोगों के मुंह पर थूकने जैसा है जब इस विज्ञापन में लिखा जाता है कि हर रोज मीटिंग करके 10 से 12 हजार रुपए कमाएं। फिर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली को इस पर गौर करना चाहिए। इतनी आसानी से बेरोजगारी दूर हो सकती है। इस देश की अदालतों को ऐसे मामलों पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। जहां सुप्रीम अदालत के मुखिया अहमक तथाकथित स्वामी ओम की अपील पर घंटा-दो घंटा बरबाद कर रहे हैं, ऐसे में इनपर भी उनकी नजर पड़नी चाहिए।

इतना तो तय है कि इस समूह के बड़े अधिकारियों की अनुमति के बिना ऐसे विज्ञापन तो छपते नहीं होंगे और इस पर नजर पड़ने के बाद उनको भी इस पेशे में आना चाहिए क्योंकि जितने पैसे कमाने की बात इस विज्ञापन में कही जा रही है उतनी तो उनकी तनख्वाह भी नहीं होगी। आखिर महीने के तीन-साढ़े तीन लाख की सैलेरी देश में कितनों लोगों को मयस्सर है हमें मालूम ही है। और हां वेश्यावृत्ति का इस किस्म का खुला विज्ञापन इस अखबार में तब छप रहा है जब इसकी मुखिया एक महिला हैं। शर्म है, लेकिन क्या करें शर्म है कि आती नहीं।


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प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्पेस बेचने वाली एजेंसियों पर तय हुआ GST

केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि कमीशन के आधार पर यदि कोई विज्ञापन एजेंसी अखबारों में स्पेस बेचती है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 24 August, 2017
Last Modified:
Thursday, 24 August, 2017
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि कमीशन के आधार पर यदि कोई विज्ञापन एजेंसी अखबारों में स्पेस बेचती है तो उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगेगा।

इस विषय पर वित्त मंत्रालय की ओर से एक स्पष्टीकरण जारी किया गया है, जिसके मुताबिक, प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्पेस बिक्री पर जीएसटी 5 प्रतिशत की दर से लगता है। यदि विज्ञापन एजेंसी प्रिंसिपल से प्रिंसिपल के आधार पर काम करती है, अर्थात वह किसी समाचार-पत्र संस्थान से स्पेस खरीदती है और इस स्पेस को विज्ञापन के लिए ग्राहकों को अपने खाते के अंतर्गत ही यानी एक प्रिंसिपल के रूप में बेचती है, तो वह ग्राहक से विज्ञापन एजेंसी द्वारा वसूली गई पूरी राशि पर 5 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करेगा।

इसमें उदाहरण देकर समझाया गया है कि यदि कोई समाचार पत्र संस्थान 100 रुपए मूल्य के किसी स्पेस को 85 रुपए में 15 रुपए के कारोबारी डिस्काउंट के बाद, किसी विज्ञापन एजेंसी को बेचता है और वह विज्ञापन एजेंसी उसी स्पेस को 100 रुपए में किसी ग्राहक को बेच देती है तो समाचार पत्र संस्थान को 85 रुपए की राशि पर 5 प्रतिशत जीएसटी की दर से भुगतान 4.25 रुपए करना होगा और विज्ञापन एजेंसी को पूरे मूल्य यानी 100 रुपए पर जीएसटी का भुगतान 5 रुपए करना होगा और वह 4.25 रुपए के आईटीसी इनपुट टैक्स क्रेडिट का उपयोग इस रकम की अदायगी में कर सकती है।

इस स्पष्टीकरण के मुताबिक, यदि कोई विज्ञापन एजेंसी किसी समाचार-पत्र संस्थान के एक एजेंट के रूप में कमीशन के आधार पर विज्ञापन के लिए किसी स्पेस को बेचती है, तो वह समाचार पत्र संस्थान से प्राप्त बिक्री कमीशन पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करेगा। इस तरह के बिक्री कमीशन पर अदा किए गए जीएसटी के आईटीसी का भुगतान समाचार पत्र संस्थान के लिए उपलब्ध होगा।

बयान में कहा गया है कि, यदि कोई विज्ञापन एजेंसी विज्ञापन के लिए स्पेस बेचने करने के अलावा कोई अन्य सेवा प्रदान करती है, जैसे विज्ञापन का डिजाइन या प्रारूप तैयार करना आदि। इस तरह की आपूर्ति यदि किसी भी समग्र आपूर्ति का हिस्सा नहीं होती है, तो उस पर 18 प्रतिशत की दर से टैक्स लगेगा और यदि यह किसी समग्र आपूर्ति का हिस्सा होती है, तो प्रिंसिपल की ओर से आपूर्ति पर लागू टैक्स दर मान्य होगी।


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'मन की बात' में 10 सेकंड के ऐड की कीमत क्या है, जानिए...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जरिए हर महीने देश को संबोंधित करते है। उनकी लोकप्रियता ही है...

Last Modified:
Saturday, 29 July, 2017
Samachar4media

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जरिए हर महीने देश को संबोंधित करते है। शो की लोकप्रियता ही है, जिसने आकाशवाणी को मालामाल कर दिया है। हाल ही में मीडिया में यह जानकारी दी गई थी कि बीते दो वर्षों में आकाशवाणी को करीब 10 करोड़ रुपए की कमाई हुई है, लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि आकाशवाणी इस कार्यक्रम के दौरान प्रसारित किए जाने वाले विज्ञापन देने वाली कंपनियों से कितना चार्ज वसूल करता है।  

यदि नहीं, तो हम बताते हैं कि वह ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान आकाशवाणी दस सेकेंड के विज्ञापन के लिए कंपनियों से दो लाख रुपए चार्ज करता है। दरअसल इस बात की जानकारी संसद में सूचना-प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने एक सवाल के जवाब में दी।

उन्होंने बताया कि यह कीमत ऑल इंडिया रेडियो के अधीन 200 प्राइमरी चैनल/लोकल रेडियो स्टेशंस, 41 विविध भारती स्टेशंस, 30 एफएम रैम्बो और गोल्ड चैनल्स के विज्ञापन बुकिंग लिए है।

उन्होंने यह भी बताया कि जब तक कोई ऐडवरटाइजर पूरे प्रोग्राम को स्पॉन्सर नहीं कर लेता तब तक एपिसोड के दौरान विज्ञापन दर में कोई बदलाव नहीं किया जाता है।

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस प्रोग्राम के लिए 38 ऐडवरटाइजर्स हैं, जिनमें चुनाव आयोग, 11 केंद्रीय मंत्रालय, कुछ स्वायत्त विभाग या सरकारी संगठन और कुछ निजी ऐडवरटाइजर्स शामिल हैं।

राठौर के मुताबिक, संविधान की आठवीं अनुसूची के तहत कार्यक्रम सभी क्षेत्रीय भाषाओं में प्रसारित किया जाता है, जिसका अनुवाद आकाशवाणी के उपलब्ध संसाधनों द्वारा किया जाता है।

बता दें कि कार्यक्रम की शुरुआत 3 अक्टूबर 2014 को हुई थी, जिसके बाद से अब तक इसके कुल 33 एपिसोड प्रसारित किए जा चुके हैं।

 

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